Saturday, June 13, 2026
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Mouthpiece Of Prosecution: अदालतें अभियोजन पक्ष का पोस्ट ऑफिस या माउथपीस नहीं हैं, महिला आरोपियों को केस में ऐसा क्यों?

Mouthpiece Of Prosecution: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आपराधिक मामलों में डिस्चार्ज के कानूनी प्रावधानों और पुलिस जांच में बाद में सोच-समझकर जोड़े जाने वाले नामों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने सुल्तानपुर जिले के एक मामले में निचली अदालत और रिविजनल कोर्ट के फैसलों को आंशिक रूप से पलटते हुए 4 महिला आरोपियों को मुकदमे से बरी (Discharge) कर दिया। कोर्ट ने पाया कि मूल शिकायत और चश्मदीद गवाह के बयान में इन महिलाओं का कोई जिक्र नहीं था, बल्कि जांच के दौरान ‘बाद की सोच’ के तहत इन्हें जबरन केस में घसीटा गया था। अदालत ने साफ किया है कि निचली अदालतें पुलिस या अभियोजन पक्ष (Prosecution) के ‘पोस्ट ऑफिस’ या ‘भोंपू’ (Mouthpiece) की तरह काम नहीं कर सकतीं कि चार्जशीट आते ही आंख मूंदकर आरोप तय कर दें।

मामला क्या था? (मकान विवाद और चोरी का आरोप)

यह मामला सुल्तानपुर जिले के बल्दीराय थाने में वर्ष 2019 में दर्ज कांड संख्या 81 से जुड़ा है, जो आईपीसी की धारा 457 (रात में घर में घुसना) और 380 (चोरी) के तहत दर्ज हुआ था:

मूल शिकायत: तेज बहादुर नामक व्यक्ति ने धारा 156(3) CrPC के तहत कोर्ट के जरिए एफआईआर दर्ज कराई थी। उसका आरोप था कि एक मकान के कब्जे को लेकर उनका सिविल कोर्ट में विवाद चल रहा है जहां कोर्ट ने यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया था।

4 लोग थे नामजद: शिकायत के अनुसार, 26 दिसंबर 2018 को जब वह इलाज के लिए बाहर गया था, तब बाबूराम, संतराम, रिंकू और देवेंद्र ने उसके घर और दुकान का ताला तोड़कर जनरेटर, धान, गेहूं, फर्नीचर और गैस सिलेंडर आदि चुरा लिए और पिकअप वैन में लादकर ले गए।

पुलिस की ‘कलाकारी’ और 9 आरोपी: पुलिस जांच के दौरान, शिकायतकर्ता के पिता (जो खुद पुलिस के रिटायर्ड सब-इंस्पेक्टर हैं) ने बयान दिया कि उन्होंने आरोपियों को सामान लादते देखा था। लेकिन, चश्मदीद होने के बावजूद उन्होंने कई लोगों के नाम नहीं लिए। इसके बाद पुलिस ने कुछ कथित ‘स्वतंत्र गवाहों’ के बयान दर्ज किए और मूल रूप से नामजद 4 लोगों के अलावा परिवार की महिलाओं सहित 5 और लोगों के नाम जोड़कर कुल 9 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी।

निचली अदालतों ने खारिज की थी अर्जी

जब इन अतिरिक्त आरोपियों (याचिकाकर्ता संख्या 5, 6, 8 और 9) ने धारा 227 CrPC के तहत खुद को मुकदमे से डिस्चार्ज करने की अर्जी लगाई, तो ट्रायल कोर्ट और रिविजनल कोर्ट ने इसे मैकेनिकल (यांत्रिक) तरीके से यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चार्जशीट में अपराध बनता दिख रहा है। इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।

हाई कोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष और तीखी टिप्पणियां

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों (सज्जन कुमार, गुलाम हसन बेग, तुहिन कुमार बिस्वास) का हवाला देते हुए निचली अदालतों को कानून का पाठ पढ़ाया।

संदेह बनाम गंभीर संदेह (Suspicion vs Grave Suspicion): कोर्ट ने दोहराया कि डिस्चार्ज के चरण में कोर्ट को यह देखना होता है कि क्या सबूतों से आरोपी के खिलाफ ‘गंभीर संदेह’ (Grave Suspicion) पैदा होता है। अगर सामग्री केवल सामान्य संदेह पैदा करती है, तो आरोपी डिस्चार्ज पाने का हकदार है।

अदालतें ‘फर्स्ट फिल्टर’ हैं: हालिया तुहिन कुमार बिस्वास मामले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि आपराधिक अदालतों को ‘पहला फिल्टर’ होना चाहिए ताकि कमजोर और फर्जी मामलों को शुरुआत में ही रोका जा सके। कमजोर मामलों में अंधाधुंध चार्जशीट दाखिल करने से ही अदालतों में मुकदमों का बोझ (Judicial Backlog) बढ़ता है।

आम समझ (Common Sense) के खिलाफ: हाई कोर्ट ने कहा कि यह बात गले नहीं उतरती कि यदि घर की महिलाएं अपराध में शामिल थीं, तो घटना के एक महीने बाद दर्ज कराई गई 156(3) की अर्जी में और चश्मदीद गवाह (शिकायतकर्ता के पिता, जो खुद रिटायर्ड दरोगा थे) के बयान में उनका नाम क्यों नहीं था? बाद के गवाहों के बयानों को ‘अंतिम सत्य’ (Gospel Truth) नहीं माना जा सकता।

जस्टिस विद्यार्थी ने निचली अदालतों की खिंचाई करते हुए टिप्पणी की

ट्रायल कोर्ट और रिविजनल कोर्ट अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों की बुनियादी खामियों और मामले की संभावनाओं का मूल्यांकन करने में पूरी तरह विफल रहे। ऐसा प्रतीत होता है कि निचली अदालतों ने केवल अभियोजन पक्ष के ‘पोस्ट ऑफिस’ या ‘माउथपीस’ के रूप में काम किया है।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश: महिलाओं को राहत, मुख्य आरोपियों का ट्रायल जारी

हाई कोर्ट ने मामले में एक स्पष्ट कानूनी रेखा खींची:

४ महिलाओं को राहत: याचिकाकर्ता संख्या 5, 6, 8 और 9 (जो सभी महिलाएं हैं) को तुरंत डिस्चार्ज कर दिया गया, क्योंकि मूल शिकायत में उनका नाम नहीं था, चश्मदीद ने उन्हें नहीं पहचाना था और उनसे कोई चोरी का सामान भी बरामद नहीं हुआ था। उनका नाम केवल ‘बाद की सोच’ का नतीजा था।

मुख्य आरोपियों को राहत नहीं: कोर्ट ने उन मुख्य 4 आरोपियों (याचिकाकर्ता 1 से 4) को डिस्चार्ज करने से मना कर दिया जो मूल रूप से नामजद थे, साथ ही याचिकाकर्ता संख्या ७ को भी राहत नहीं मिली जिसके पास से चोरी का जनरेटर बरामद होने का दावा किया गया था।

डिजिटल विश्लेषण: ‘सिविल बनाम आपराधिक’ विवाद पर कोर्ट का रुख

इस केस में आरोपियों ने यह दलील भी दी थी कि चूंकि जमीन/मकान का विवाद सिविल कोर्ट में लंबित है, इसलिए आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इस पर हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन बनाम एनईपीसी इंडिया लिमिटेड केस का हवाला देकर स्थिति साफ की

कानूनी स्थितिहाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या
दोनों कानूनी उपाय साथ संभवएक ही घटना से सिविल और क्रिमिनल (आपराधिक) दोनों तरह की देनदारी बन सकती है। केवल इसलिए कि मामला सिविल प्रकृति का है, चोरी या घर में घुसने (House-breaking) के आपराधिक मामले को बंद नहीं किया जा सकता।
डिस्चार्ज का पैमानासिविल विवाद के बावजूद, यदि किसी विशिष्ट आरोपी के खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया (Prima Facie) सबूत नहीं है, तो उसे मुकदमे की प्रताड़ना से बचाना कोर्ट का कर्तव्य है।
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