Service News: सरकारी और बैंकिंग सेवाओं में तबादलों (Transfers) की अनदेखी करने और पारिवारिक मजबूरियों का बहाना बनाकर लंबे समय तक दफ्तर से गायब रहने वाले कर्मचारियों को उड़ीसा हाई कोर्ट ने एक बेहद कड़ा और दार्शनिक संदेश दिया है।
लेबनानी-अमेरिकी लेखक खलील जिब्रान की पंक्ति का उल्लेख
उड़ीसा हाईकोर्ट के जस्टिस दीक्षित कृष्ण श्रीपद और जस्टिस चितरंजन दाश की खंडपीठ ने बैंक ऑफ बड़ौदा (या संबंधित सार्वजनिक बैंक) की एक पूर्व महिला कर्मचारी की बर्खास्तगी (Removal from Service) के आदेश के खिलाफ दायर रिट अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने विश्वप्रसिद्ध लेबनानी-अमेरिकी लेखक खलील जिब्रान (Kahlil Gibran) की कालजयी पंक्तियों का हवाला देते हुए साफ किया कि जो लोग अपने काम के प्रति समर्पित नहीं हैं, उन्हें सेवा में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। अदालत ने खलील जिब्रान के विचारों को उद्धृत करते हुए अपने आदेश में लिखा कि “यदि आप प्यार से काम नहीं कर सकते, बल्कि केवल अरुचि और बेमने से करते हैं, तो आपके लिए यह बेहतर होगा कि आप अपना काम छोड़ दें, मंदिर के दरवाजे पर जाकर बैठ जाएं और उन लोगों से भीख (Alms) मांगें जो खुशी और आनंद के साथ अपना काम करते हैं।”
मामला क्या था? (भुवनेश्वर से गोधरा ट्रांसफर, बीमार माता-पिता का बहाना)
तबादला और अनुपस्थिति: यह पूरा विवाद वर्ष 2019 से जुड़ा हुआ है। महिला कर्मचारी का 26 सितंबर 2019 को ओडिशा के भुवनेश्वर क्षेत्र से गुजरात के गोधरा क्षेत्र में ट्रांसफर किया गया था। लेकिन उन्होंने नए स्थान पर अपनी ज्वाइनिंग नहीं दी और बिना किसी आधिकारिक अनुमति के दफ्तर से अनुपस्थित (Unauthorized Absence) रहीं।
कर्मचारी की दलील: महिला का तर्क था कि उनके माता-पिता काफी वृद्ध और बीमार हैं, जिनकी देखभाल करने वाला उनके अलावा कोई नहीं है। इसलिए वे ओडिशा छोड़कर गुजरात नहीं जा सकीं।
बैंक की कार्रवाई: लंबे समय तक ड्यूटी पर न आने के कारण बैंक ने उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक जांच (Disciplinary Inquiry) बैठाई। जांच में उन्हें दुराचार (Misconduct) का दोषी पाया गया और 30 अप्रैल 2021 को उन्हें सेवा से हटा (Remove) दिया गया।
कानूनी लड़ाई: महिला ने इस फैसले को पहले बैंक के अपीलीय प्राधिकारी और फिर हाई कोर्ट की एकल पीठ (Single Bench) के सामने चुनौती दी। दोनों जगहों से झटका लगने के बाद उन्होंने इस खंडपीठ के समक्ष यह ‘इंट्रा-कोर्ट’ अपील (Writ Appeal) दायर की थी।
हाई कोर्ट का कानूनी और नैतिक चाबुक: ‘सच्चाई को छिपाया गया’
खंडपीठ ने मामले के दस्तावेजों को खंगालने के बाद पाया कि महिला कर्मचारी ने सहानुभूति बटोरने के लिए कोर्ट से कई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए थे। कोर्ट ने उनके दावों को खारिज करते हुए टिप्पणियां कीं।
सत्य को छिपाना (Suppressio Veri): कोर्ट ने नोट किया कि महिला ने यह तो कहा कि उसे अपने बीमार माता-पिता की देखभाल करनी है, लेकिन यह सच्चाई छुपा ली कि उसके एक भाई और एक बहन भी हैं, जो माता-पिता की देखभाल करने के लिए सक्षम और उपलब्ध थे। कोर्ट ने कहा, “यह सीधे तौर पर Suppressio Veri (सत्य को दबाने) का मामला है। जो व्यक्ति साफ हाथ, साफ दिल और साफ दिमाग (Clean hands, clean heart and clean head) के साथ अदालत नहीं आता, वह हाई कोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार का लाभ पाने का हकदार नहीं है।”
बैंकिंग सेवा में अराजकता का डर: कोर्ट ने कहा कि बैंक जैसी सार्वजनिक सेवाएं अखिल भारतीय (All India) प्रकृति की होती हैं। यदि कर्मचारी अपने व्यक्तिगत हितों के लिए तबादलों के आदेशों की धज्जियां उड़ाने लगेंगे और एक ही जगह पर चिपके रहने (Cling on) की जिद करेंगे, तो बैंकिंग और सार्वजनिक व्यवस्था चरमरा जाएगी।
हड़बड़ी में जांच के आरोप खारिज: कर्मचारी ने दलील दी थी कि उसे सुनवाई का मौका दिए बिना बैंक ने हड़बड़ी में जांच पूरी कर दी। कोर्ट ने इसे नकारते हुए कहा कि चूंकि मामला केवल ‘बिना बताए अनुपस्थित रहने’ का था, इसलिए जांच को सालों साल नहीं खींचा जा सकता था। रिकॉर्ड बताते हैं कि जांच की कार्यवाही घंटों चली थी, इसलिए इसमें किसी पूर्वाग्रह (Prejudice) की बू नहीं आती।
विश्लेषण: बर्खास्तगी (Dismissal) बनाम सेवा से हटाना (Removal Simpliciter)
अदालत ने बैंक द्वारा दी गई सजा की आनुपातिकता (Proportionality of Punishment) पर भी विचार किया और स्पष्ट किया कि बैंक ने कर्मचारी के प्रति कोई क्रूरता नहीं दिखाई है।
| सजा का प्रकार | कानूनी प्रभाव और भविष्य की स्थिति |
| डिसमिसल (Dismissal from Service) | यह एक कलंक (Stigmatic) की तरह होता है, जिसके बाद व्यक्ति भविष्य में किसी अन्य सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने के अयोग्य हो जाता है। |
| रिमूवल (Removal Simpliciter) | कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बैंक ने महिला को ‘डिसमिस’ नहीं किया है, बल्कि साधारण तौर पर सेवा से हटाया (Removal Simpliciter) है। यह गैर-कलंककारी (Non-Stigmatic) है। यानी उनके भविष्य के करियर पर इसका कोई स्थायी दाग नहीं लगेगा। |
| अदालत का अधिकार क्षेत्र | एक बार जब विभागीय जांच पूरी निष्पक्षता से हो जाती है, तो सजा क्या देनी है, यह पूरी तरह नियोक्ता (Employer) का अधिकार है। रिट कोर्ट इसमें तब तक दखल नहीं देता जब तक कोई असाधारण विसंगति न हो। |

