Monday, June 15, 2026
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Mumbai News: कोर्ट कर्मचारियों को लाभ देने के समय ही सरकारें मांगती हैं तारीख पर तारीख…क्या है शेट्‌टी कमीशन व उनकी सिफारिश, पढ़ें

Mumbai News: बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के जिला एवं सत्र न्यायालयों (District and Sessions Courts) में कार्यरत स्टेनोग्राफरों (आशुलिपिकों) के हक में ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

जस्टिस शेट्टी कमीशन की सिफारिश पर मिलेगा वेतनमान

हाईकोर्ट के जस्टिस किशोर सी. संत और जस्टिस सुशील एम. घोडेस्वर की खंडपीठ ने राज्य सरकार के उस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें सरकार ने लाभ को 2003 के बजाय 2018 से देने की बात कही थी। अदालत ने राज्य सरकार के टालमटोल वाले रवैये पर कड़ी फटकार लगाते हुए निर्देश दिया है कि सभी जिला अदालतों के स्टेनोग्राफरों को 1 अप्रैल 2003 से जस्टिस शेट्टी कमीशन (Shetty Commission) की सिफारिशों के अनुसार बढ़ा हुआ वेतनमान और एरियर (बकाया) दिया जाए।

क्या है पूरा मामला? (सुप्रीम कोर्ट के आदेश और महाराष्ट्र सरकार का यू-टर्न)

यह कानूनी लड़ाई 2015 से चल रही है, जिसमें चंद्रपुर, नागपुर, जालना, पुणे, नासिक, औरंगाबाद, बीड, सोलापुर, सतारा, यवतमाल और सांगली सहित विभिन्न जिला अदालतों के 37 स्टेनोग्राफरों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था:

शेट्टी कमीशन का गठन: देश भर की अदालतों के स्टाफ और न्यायिक अधिकारियों के वेतनमान और सेवा शर्तों में सुधार के लिए जस्टिस के. जगन्नाथ शेट्टी की अध्यक्षता में पहले राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग (National Judicial Pay Commission) का गठन किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: 7 अक्टूबर 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को शेट्टी कमीशन की सिफारिशें लागू करने का आदेश दिया था।

सरकार का पहला कदम (2011 का GR): सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद महाराष्ट्र सरकार ने 20 अक्टूबर 2011 को एक शासनादेश (Government Resolution – GR) जारी कर स्वीकार किया कि यह सिफारिशें 1 अप्रैल 2003 से लागू होंगी।

सरकार का यू-टर्न (2018 का GR): साल 2018 में सरकार ने 2011 के जीआर की कुछ विसंगतियों (Discrepancies) को दूर करने के लिए एक नया जीआर जारी किया, लेकिन इसमें लागू होने की तारीख का जिक्र नहीं किया। इसके बाद सरकार ने कोर्ट में दलील देनी शुरू कर दी कि कर्मचारियों को बढ़ी हुई सैलरी का लाभ 2003 के बजाय 15 सितंबर 2018 (नए जीआर की तारीख) से दिया जाएगा।

हाई कोर्ट की तीखी फटकार: ‘सरकार केवल समय बर्बाद कर रही थी’

  • अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि पिछले कई सालों से राज्य सरकार इस मामले को केवल टालने (Killing Time) और स्थगन (Adjournments) लेने का प्रयास कर रही थी। 29 फरवरी 2024 को भी कोर्ट ने सरकार के इस आचरण को रिकॉर्ड पर लिया था।
  • फैसला सुनाते हुए खंडपीठ ने बेहद तल्ख टिप्पणी की और कहा, यह देखा गया है कि जब भी कर्मचारियों को कोई लाभ देने की बात आती है या उन्हें वेतन देने की बात आती है, तभी सरकार की ओर से समय मांगा जाता है, बार-बार तारीखें ली जाती हैं और मामलों को लटकाया जाता है। हम सरकार के इस आचरण की कड़ी निंदा करते हैं।”
  • सरकार ने कोर्ट में यह अजीबोगरीब दलील भी दी कि कर्मचारी शेट्टी कमीशन के वेतनमान के लिए बेवजह जिद कर रहे हैं, जबकि ५वें वेतन आयोग (5th Pay Commission) का ढांचा उनके लिए अधिक फायदेमंद था। कोर्ट ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह अतार्किक मानकर खारिज कर दिया।

हाई कोर्ट का अंतिम निर्देश: 6 महीने में भुगतान, 2009 से लगेगा ब्याज

खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को निम्नलिखित कड़े निर्देश जारी किए हैं।

2003 से लागू होगा नियम: कोर्ट ने साफ किया कि 2018 का जीआर केवल 2011 के जीआर की कमियों को सुधारने के लिए था, वह कर्मचारियों को मिलने वाले लाभ की मूल तारीख (1 अप्रैल 2003) को बदल नहीं सकता।

6 महीने की समय-सीमा: राज्य सरकार को आदेश दिया गया है कि वह स्टेनोग्राफरों के बकाए (Difference of Salaries) की गणना करे और आज से 6 महीने के भीतर इसका पूरा भुगतान करे।

6% का सालाना ब्याज: सरकार के ढीले रवैये को देखते हुए कोर्ट ने एरियर पर 7 अक्टूबर 2009 (सुप्रीम कोर्ट के मूल आदेश की तारीख) से 6% प्रति वर्ष की दर से वार्षिक ब्याज देने का भी हुक्म सुनाया है।

क्या है शेट्टी कमीशन (Shetty Commission)

शेट्टी कमीशन (Shetty Commission), जिसे आधिकारिक तौर पर प्रथम राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग (First National Judicial Pay Commission) कहा जाता है, भारत की न्यायपालिका के इतिहास में एक मील का पत्थर है। इसका गठन देश की अधीनस्थ अदालतों (Subordinate Courts/District Courts) के जजों और कोर्ट स्टाफ के वेतनमान (Pay Scales), भत्तों और कामकाजी परिस्थितियों में सुधार लाने के उद्देश्य से किया गया था।

शेट्टी कमीशन के नियम, मुख्य सिफारिशें और इससे जुड़ी सभी महत्वपूर्ण बातें नीचे विस्तार से समझाई गई हैं

गठन और पृष्ठभूमि

स्थापना: इस आयोग का गठन भारत सरकार द्वारा 21 मार्च 1996 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश (All India Judges’ Association Case) के बाद किया गया था।

अध्यक्षता: इसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस के. जगन्नाथ शेट्टी (Justice K. Jagannatha Shetty) थे।

रिपोर्ट सौंपना: आयोग ने नवंबर 1999 में अपनी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में लागू करने का आदेश दिया।

मुख्य सिद्धांत (Core Rules & Philosophy)

शेट्टी कमीशन ने न्यायपालिका के लिए कुछ बेहद महत्वपूर्ण नियम और सिद्धांत स्थापित किए, जो आज भी भारतीय कानूनी व्यवस्था का आधार हैं।

प्रशासनिक कार्यपालिका से अलग दर्जा: आयोग ने साफ तौर पर कहा कि अधीनस्थ न्यायपालिका (Subordinate Judiciary) की तुलना आम सरकारी प्रशासनिक सेवाओं (IAS/PCS आदि) से नहीं की जा सकती। जज केवल सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि वे राज्य की संप्रभु न्यायिक शक्ति (Sovereign Power) का प्रयोग करते हैं। इसलिए उनकी सेवा शर्तें और वेतन अलग और बेहतर होने चाहिए।

देशभर में एकसमान वेतन (Uniform Pay Scale): इससे पहले अलग-अलग राज्यों में जजों का वेतन बहुत भिन्न होता था। शेट्टी कमीशन ने पूरे देश की जिला व अधीनस्थ अदालतों के लिए एक समान वेतन संरचना (Uniform Pay Structure) की सिफारिश की।

वित्तीय बोझ का तर्क अमान्य: आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी राज्य सरकार बजट की कमी का बहाना बनाकर जजों के वेतन और सुविधाओं को नहीं रोक सकती।

जजों के लिए मुख्य सिफारिशें और नियम

शेट्टी कमीशन ने निचली अदालतों के जजों के वेतन को हाई कोर्ट के जजों के वेतन के एक निश्चित प्रतिशत से जोड़ दिया। जैसे-जैसे हाई कोर्ट के जजों का वेतन बढ़ेगा, इनका वेतन भी उसी अनुपात में बढ़ेगा।

कैडर आधारित वेतनमान

  • सिविल जज (जूनियर डिवीजन): इनका मूल वेतन हाई कोर्ट जज के वेतन का 42.3% तय किया गया।
  • सिविल जज (सीनियर डिवीजन): इनका वेतन हाई कोर्ट जज के वेतन का 58.5% तय किया गया।
  • जिला जज (District Judge – Entry Level): इनका वेतन हाई कोर्ट जज के वेतन का 71.6% तय किया गया।
  • जिला जज (सुपर टाइम स्केल): इनका वेतन हाई कोर्ट जज के वेतन का 91.7% तक तय किया गया।
  • भत्ते और सुविधाएं (Allowances): कमीशन ने जजों के लिए विभिन्न प्रकार के भत्तों की शुरुआत की, जैसे आवास और सरकारी गाड़ी (या फिक्स्ड कनवेंस अलाउंस), मेडिकल सुविधाएं और फ्री बिजली-पानी की तय सीमा, सम्प्च्युअरी अलाउंस (Sumptuary Allowance): आधिकारिक बैठकों और मेहमाननवाज़ी के लिए विशेष भत्ता, होम ऑर्डरली/डोमेस्टिक हेल्प अलाउंस: घर पर सहायक रखने के लिए भत्ता, जजों के आवास पर एक वर्किंग लाइब्रेरी की सुविधा आदि हैं।

कोर्ट स्टाफ (Non-Judicial Staff) के लिए नियम

शेट्टी कमीशन केवल जजों तक सीमित नहीं था; इसने जिला अदालतों के गैर-न्यायिक कर्मचारियों (जैसे- आशुलिपिक/Stenographers, क्लर्क, पीन, और नाज़िर) की सेवा शर्तों में सुधार के लिए भी ऐतिहासिक सिफारिशें की थीं। इसके तहत कोर्ट स्टाफ के लिए भी पदोन्नति (Promotion) के बेहतर अवसर और एक सम्मानजनक वेतनमान तय किया गया। उत्तर प्रदेश (UP State District Court Service Rules) सहित विभिन्न राज्यों ने कोर्ट स्टाफ के लिए जो सेवा नियमावली बनाई है, उनमें शेट्टी कमीशन की सिफारिशों को ही मुख्य आधार बनाया गया है।

वर्तमान स्थिति (शेट्टी कमीशन से आगे)

  • समय के साथ महंगाई और नए वेतन आयोगों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शेट्टी कमीशन के बाद आगे के आयोग भी गठित किए।
    -पद्मनाभन समिति (Justice Padmanabhan Committee – 2009): शेट्टी कमीशन के फॉर्मूले को आगे बढ़ाते हुए वेतन में और संशोधन किया गया।
  • द्वितीय राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग (2nd NJPC – जस्टिस जे.आर. बेदी आयोग): वर्तमान में जजों और कोर्ट कर्मचारियों को जो नया और तीन गुना तक बढ़ा हुआ वेतनमान और एरियर मिल रहा है, वह इसी दूसरे न्यायिक वेतन आयोग की सिफारिशों के तहत मिल रहा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2016 से लागू करने का आदेश दिया है।

महत्वपूर्ण कानूनी पहलू

शेट्टी कमीशन की सिफारिशें कानूनी रूप से बाध्यकारी हैं। अभी हाल ही में (जून 2026 में) बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाते हुए जिला अदालतों के स्टेनोग्राफर्स को साल 2003 से शेट्टी कमीशन के तहत बकाया वेतन (Arrears) 6% ब्याज के साथ देने का सख्त आदेश दिया है। इससे साबित होता है कि कोर्ट स्टाफ के अधिकारों की सुरक्षा के लिए यह कमीशन आज भी कितना प्रभावी है।

विश्लेषण: अदालती स्टाफ के अधिकारों की सुरक्षा

यह फैसला प्रशासनिक देरी के खिलाफ कर्मचारियों के वित्तीय अधिकारों को सुरक्षित करने वाली एक मजबूत नजीर है।

मामला और पक्षकारकानूनी और वित्तीय स्थिति (The Judgment Grid)
केस का नामराजेंद्र रामजी धवले और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य (2026)
याचिकाकर्ताओं के वकीलअधिवक्ता प्रज्ञा एस. तालेकर और एस.बी. तालेकर (जिन्होंने कर्मचारियों का पक्ष मजबूती से रखा)।
सरकार और कोर्ट का पक्षराज्य सरकार की ओर से सरकारी वकील ए.बी. गिरासे और हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से अधिवक्ता मुकुल कुलकर्णी पेश हुए।
वित्तीय प्रभावसरकार को अब 2003 से लेकर अब तक का पूरा बकाया ब्याज सहित देना होगा, जिससे राज्य के खजाने पर वित्तीय भार पड़ेगा, लेकिन कर्मचारियों को २३ साल पुराना हक मिलेगा।
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