Saturday, June 13, 2026
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Legal Strike: वकील बनाम डॉक्टर..इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सिटिंग जज की मौत के बाद क्यों भड़का विवाद, हो रहा सड़कों पर प्रदर्शन

Legal Strike: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की न्यायिक और चिकित्सा बिरादरी के बीच उपजे एक बेहद गंभीर और अभूतपूर्व टकराव को देखते हुए कड़ा रुख अपनाया है।

संवेदनशील मामले की निष्पक्ष जांच के लिए हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश नियुक्त

हाईकोर्ट के जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने यह आदेश जारी करते हुए दोनों पक्षों प्रदर्शन कर रहे वकीलों और हड़ताल पर गए डॉक्टरों को कड़ी फटकार लगाई और जनता को परेशान करने वाली गतिविधियों को तत्काल बंद करने का निर्देश दिया। अदालत ने हाई कोर्ट की महिला वकील जाग्रति शुक्ला की सड़क दुर्घटना के बाद अस्पताल में इलाज के दौरान हुई मौत के मामले में न्यायिक जांच (Judicial Inquiry) के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले की निष्पक्ष जांच के लिए हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, जस्टिस अरुण टंडन को नियुक्त किया है।

पूरा मामला क्या है? (सड़क हादसा, सोता हुआ स्टाफ और वकीलों-डॉक्टरों में मारपीट)

विवाद: यह पूरा विवाद 20 मई 2026 की सुबह से शुरू हुआ, जिसके तथ्य बेहद परेशान करने वाले हैं।

हादसा और लापरवाही के आरोप: इलाहाबाद हाई कोर्ट की प्रैक्टिसिंग वकील जाग्रति शुक्ला सुबह क्रिकेट अभ्यास के लिए हाई कोर्ट क्रिकेट ग्राउंड जा रही थीं, तभी वे एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गईं। उनके साथी वकील (जिनमें कई महिला वकील भी शामिल थीं) उन्हें तुरंत स्वरूप रानी नेहरू (SRN) अस्पताल, प्रयागराज ले गए। आरोप है कि उस समय ड्यूटी पर मौजूद आपातकालीन चिकित्सा अधिकारी (EMO) सो रहा था और उसने घायल वकील को तुरंत देखने से मना कर दिया।

अस्पताल में मारपीट और मौत: अस्पताल स्टाफ के इस कथित अड़ियल और अनुचित व्यवहार के कारण वहां मौजूद वकीलों और डॉक्टरों के बीच तीखी बहस हुई, जो देखते ही देखते हाथापाई और मारपीट (Scuffle) में बदल गई। इसके बाद वकील जाग्रति शुक्ला को लखनऊ के एक अस्पताल में रेफर किया गया, जहां 7 जून 2026 को इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

सड़कों पर आमने-सामने दो रसूखदार वर्ग: इस मौत के बाद प्रयागराज में तनाव चरम पर पहुंच गया। हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पदाधिकारी और वकील निष्पक्ष जांच और डॉक्टरों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए और चक्काजाम किया। दूसरी ओर, SRN अस्पताल के डॉक्टरों ने वकीलों पर गुंडागर्दी का आरोप लगाते हुए काम बंद कर हड़ताल (Strike) शुरू कर दी।

हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘जिला प्रशासन की जांच केवल एक दिखावा होगी’

हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और सचिव द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने जिला प्रशासन की जांच क्षमता पर ही सवाल उठा दिए। कोर्ट ने कहा, 20 मई 2026 से जिस तरह दोनों पेशेवर समूहों (वकीलों और डॉक्टरों) के बीच प्रतिद्वंद्विता विकसित हुई है, उसे देखते हुए हमें पूरा संदेह है कि जिला प्रशासन द्वारा की जाने वाली कोई भी जांच केवल एक दिखावा (Sham Investigation) होगी। उनकी रिपोर्ट पूरी तरह पक्षपातपूर्ण होगी—या तो उस वर्ग के पक्ष में जो सड़कों पर अशोभनीय हरकतें करके, जनता को प्रताड़ित करके और अपनी ताकत दिखाकर प्रशासन पर दबाव बनाने में सक्षम है, या फिर उस वर्ग के पक्ष में जो आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होकर उन गरीब और आम लोगों को इलाज देने से इनकार कर रहा है जिनके टैक्स के पैसे से उनकी रोजी-रोटी चलती है।”अदालत ने साफ कहा कि परिस्थितियों को देखते हुए एक स्वतंत्र और बाहरी न्यायिक जांच ही एकमात्र रास्ता है।

कोर्ट के कड़े निर्देश: डॉक्टरों की हड़ताल और वकीलों के प्रदर्शन पर रोक

अदालत ने आम जनता को हो रही असुविधा को देखते हुए दोनों पक्षों और पुलिस प्रशासन को तत्काल प्रभावी निर्देश जारी किए हैं।

समय-सीमा और सील कवर रिपोर्ट: कोर्ट ने जस्टिस अरुण टंडन से अनुरोध किया है कि वे चिकित्सा लापरवाही के दावों और अस्पताल में हुई मारपीट, दोनों पहलुओं की जांच को 30 सितंबर 2026 तक अनिवार्य रूप से पूरा करें और अपनी रिपोर्ट सील कवर (Sealed Cover) में अदालत को सौंपें।

डॉक्टरों की गिरफ्तारी पर रोक (No Custodial Interrogation): वकीलों द्वारा दर्ज कराई गई आपराधिक शिकायत पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि फिलहाल डॉक्टरों की कोई गिरफ्तारी नहीं होगी। कोर्ट ने कहा, “यह ऐसा मामला नहीं है जहां कस्टोडियल पूछताछ की आवश्यकता हो, और हम इस बात से भी वाकिफ हैं कि आरोपी चिकित्सा पेशेवर (Medical Professionals) हैं।” इसके साथ ही कोर्ट ने डॉक्टरों को तत्काल हड़ताल वापस लेने और काम पर लौटने का आदेश दिया।

सड़कों पर अराजकता बर्दाश्त नहीं: कोर्ट ने प्रयागराज पुलिस को सख्त निर्देश दिए कि यदि कोई भी वकील या संगठन सड़कों पर यातायात बाधित करता है या चक्काजाम करता है, तो उनके खिलाफ तुरंत कानूनी दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

विश्लेषण: ‘आम जनता के अधिकारों की बलि नहीं दी जा सकती’

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि दो रसूखदार और शिक्षित वर्गों की आपसी लड़ाई का खामियाजा देश के आम नागरिक को नहीं भुगतना पड़ेगा।

सामाजिक और कानूनी हकीकतहाई कोर्ट का संवैधानिक दृष्टिकोण (The Legal Grid)
यातायात और आवाजाही पर रोकनागरिकों के स्वतंत्र रूप से आने-जाने के अधिकार को रोकना एक आपराधिक कृत्य (Criminal Act) है, चाहे वह किसी भी मांग के लिए किया गया हो।
सरकारी अस्पतालों में हड़तालडॉक्टरों द्वारा गरीबों और आम मरीजों को चिकित्सा सहायता से वंचित करना उनके जीवन के अधिकार (Art. 21) का हनन है। यह कृत्य भी आपराधिक श्रेणी में आता है।
पुलिस जांच की निगरानीपुलिस अपनी जांच जारी रखेगी, लेकिन उसे हर प्रगति की जानकारी (Progress Report) सीधे जांच अधिकारी जस्टिस अरुण टंडन को देनी होगी।
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