Tuesday, August 4, 2026
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Territorial Jurisdiction: NCLT अध्यक्ष की केस ट्रांसफर शक्तियों पर विवाद…केंद्र सरकार क्यों पहुंची सुप्रीम कोर्ट, जानिए विधिक बहस

Territorial Jurisdiction: नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के अध्यक्ष (President) के प्रशासनिक और विधिक अधिकारों के दायरे को लेकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के बीच एक महत्वपूर्ण विधिक बहस शुरू हो गई है।

किसी दूसरे राज्य की बेंच में मामला ट्रांसफर करने की शक्ति पर चर्चा

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहाना की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार की याचिका पर संज्ञान लिया है और मुख्य प्रतिवादी आर्सेलरमित्तल निप्पॉन स्टील इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (ArcelorMittal Nippon Steel India) को नोटिस जारी कर उनका जवाब तलब किया है। केंद्र सरकार ने गुजरात हाई कोर्ट के उस फैसले को देश की शीर्ष अदालत में चुनौती दी है, जिसमें कहा गया था कि एनसीएलटी अध्यक्ष के पास मामलों को एक राज्य/क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर किसी दूसरे राज्य की बेंच में ट्रांसफर करने की प्रशासनिक शक्ति नहीं है।

क्या है पूरा कानूनी विवाद? (The Core Legal Issue)

यह पूरा विवाद एनसीएलटी नियम, 2016 के नियम 16(d) की व्याख्या से जुड़ा है। यह नियम एनसीएलटी अध्यक्ष को यह शक्ति देता है कि वह “परिस्थितियों की आवश्यकता होने पर किसी भी मामले को एक बेंच से दूसरी बेंच में ट्रांसफर कर सकते हैं।

गुजरात हाई कोर्ट का रुख: हाई कोर्ट (जस्टिस नीरल आर. मेहता की एकल पीठ और बाद में डिवीजन बेंच) ने माना था कि नियम 16(d) एनसीएलटी अध्यक्ष को किसी बेंच के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र को बदलने या बढ़ाने का अधिकार नहीं देता है। इस आधार पर हाई कोर्ट ने एनसीएलटी अध्यक्ष के उन प्रशासनिक आदेशों को रद्द (Quash) कर दिया था, जिसके तहत आर्सेलरमित्तल से जुड़े मामलों को एनसीएलटी अहमदाबाद से एनसीएलटी मुंबई ट्रांसफर किया गया था।

केंद्र सरकार का विधिक तर्क: सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में केंद्र सरकार ने दलील दी है कि गुजरात हाई कोर्ट ने नियम 16(d) की व्याख्या करते हुए जबरन उसमें ‘क्षेत्रीय सीमा’ (Territorial Limitation) को जोड़ दिया है, जबकि मूल नियम में ऐसी किसी पाबंदी का उल्लेख ही नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की मुख्य दलीलें

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने एनसीएलटी के अखिल भारतीय स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण विधिक बिंदु रखे हैं।

‘पूरे देश के लिए एक ही ट्रिब्यूनल’: केंद्र सरकार के अनुसार, एनसीएलटी “पूरे देश के लिए एक एकीकृत न्यायाधिकरण (One Tribunal for whole of the country)” है, जो एक संरेखित प्रशासनिक ढांचे के तहत काम करता है। देश के अलग-अलग हिस्सों या राज्यों में एनसीएलटी की बेंचें केवल प्रशासनिक सुविधा और आम जनता की पहुंच आसान बनाने के लिए बनाई गई हैं, न कि कोई कठोर भौगोलिक दीवारें (Rigid Geographical Barriers) खड़ी करने के लिए।

न्यायिक शून्यता (Judicial Vacuum) से बचने की जरूरत: केंद्र सरकार ने उन व्यावहारिक परिस्थितियों को रेखांकित किया जिसके कारण केस ट्रांसफर करना पड़ा। इस मामले में, एनसीएलटी अहमदाबाद की कोर्ट-I (9 जनवरी 2024) और कोर्ट-II (अप्रैल 2024) दोनों की बेंचों ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग (Recused) कर लिया था। ऐसी स्थिति में न्यायाधिकरण के काम को सुचारू रूप से चलाने और कानूनी शून्यता से बचने के लिए अध्यक्ष का प्रशासनिक हस्तक्षेप अनिवार्य था।

कामकाज ठप होने का खतरा: केंद्र सरकार ने आगाह किया कि यदि हाई कोर्ट के इस संकुचित दृष्टिकोण को स्वीकार कर लिया गया, तो भविष्य में यदि किसी विशिष्ट क्षेत्रीय बेंच के सदस्य एक साथ खुद को किसी केस से अलग कर लेते हैं या वहां पद खाली (Vacancy) होते हैं, तो उस क्षेत्र में न्याय निर्णय की पूरी प्रक्रिया ही ठप हो जाएगी।

विधिक यात्रा का घटनाक्रम (Timeline of the Dispute)

तिथि / समयविधिक एवं प्रशासनिक घटनाक्रम
09 जनवरी 2024एनसीएलटी अहमदाबाद (कोर्ट-I) की बेंच ने आर्सेलरमित्तल/एस्सार स्टील मामले की सुनवाई से खुद को अलग (Recuse) किया।
अप्रैल 2024एनसीएलटी अहमदाबाद की दूसरी बेंच (Court II) ने भी मामले से खुद को अलग कर लिया।
06 जून 2024 & 10 फ़रवरी 2025एनसीएलटी अध्यक्ष ने प्रशासनिक आदेश जारी कर मामलों को एनसीएलटी अहमदाबाद से एनसीएलटी मुंबई ट्रांसफर किया।
फरवरी 2026गुजरात हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्देश दिया, क्योंकि इसी तरह का एक अन्य मामला (अनीता रायपत्ति बनाम अन्य) शीर्ष अदालत के समक्ष पहले से लंबित है।
जून 2026सुप्रीम कोर्ट (CJI सूर्यकांत की बेंच) ने केंद्र की अपील पर सुनवाई करते हुए आर्सेलरमित्तल को नोटिस जारी किया।
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