UP Police: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पुलिसिया बर्बरता को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ा कानूनी आईना दिखाया है।
पीड़ित नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन
हाई कोर्ट के जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की खंडपीठ ने अपने फैसले में पीड़ित नागरिक के मौलिक अधिकारों के हनन पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि वह पीड़ित को ₹25,000 का मुआवजा और साथ ही ₹10,000 का कानूनी खर्च (कुल ₹35,000) का भुगतान करे। अदालत ने घरेलू हिंसा की एक शिकायत पर एक नागरिक को जबरन उसके घर से घसीटकर 24 घंटे तक लॉकअप में बंद रखने वाले पुलिसकर्मी के कृत्य को ‘शर्मनाक और अवैध’ माना है।
निरंकुश रवैये पर तल्ख टिप्पणी
पुलिस के इस निरंकुश रवैये पर तल्ख टिप्पणी करते हुए खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा, याचिकाकर्ता को पुलिस अधिकारी दुबे द्वारा राज्य की सत्ता के दुरुपयोग के रंग में अवैध रूप से उसकी स्वतंत्रता से वंचित किया गया था। इस कृत्य के लिए याचिकाकर्ता को मौद्रिक मुआवजा (Monetary Recompense) दिया जाना अनिवार्य है। पुलिस अधिकारी ने बिना किसी कानूनी अधिकार के याचिकाकर्ता को घर से घसीटकर और लॉकअप में बंद करके उसके सबसे मूल्यवान मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) के मूल सार का लापरवाही से उल्लंघन किया है।
मामला क्या था? (घरेलू विवाद में आधी रात को पुलिसिया तांडव)
यह पूरा मामला प्रयागराज के हंडिया थाना क्षेत्र का है, जो पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
लुंगी-कुर्ते में घसीटा: याचिकाकर्ता अपने पैतृक गांव में अपनी कृषि संपत्ति की देखरेख करने आया था। 26 नवंबर 2022 को एक रिश्तेदार द्वारा दर्ज कराई गई घरेलू हिंसा की शिकायत के आधार पर पुलिस अधिकारी (दुबे) बिना किसी वारंट या कानूनी अधिकार के उसके घर में घुस गया। उसने याचिकाकर्ता को केवल लुंगी और कुर्ते में ही जबरन घर से बाहर घसीट लिया।
24 घंटे का अवैध लॉकअप और रिश्वत की मांग: पुलिस पहले उसे चौकी ले गई और फिर हंडिया थाने के लॉकअप में करीब २४ घंटे तक अवैध रूप से बंद रखा। याचिकाकर्ता का आरोप है कि उसे छोड़ने के बदले पुलिस अधिकारी ने ₹20,000 की रिश्वत भी मांगी थी।
सिस्टम की अनदेखी: पीड़ित के बेटे ने इस घटना की शिकायत मुख्यमंत्री (UP CM), पुलिस महानिदेशक (DGP) और पुलिस कमिश्नर, प्रयागराज को भेजी, लेकिन जब कोई प्रशासनिक कार्रवाई नहीं हुई, तो पीड़ित ने उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर वरिष्ठ अधिकारियों से जांच कराने की मांग की।
कोर्ट रूम एनालिसिस: पुलिस कोई आध्यात्मिक गुरु या पंच परमेश्वर नहीं है
सुनवाई के दौरान पुलिस विभाग ने अदालत में खुद को बचाने के लिए एक मनगढ़ंत कहानी पेश की। पुलिस का तर्क था कि दोनों पक्ष स्वेच्छा से थाने आए थे और वहां उनके बीच आपसी समझौता (Compromise) हो गया था।
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने पुलिस के इस दावे को पूरी तरह काल्पनिक मानते हुए किया खारिज
सच्चाई को स्वीकार न करना ही गुनाह की स्वीकारोक्ति: अदालत ने नोट किया कि पुलिस ने अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया में इस बात से सीधे तौर पर इनकार नहीं किया कि याचिकाकर्ता को जबरन थाने लाया गया था और लॉकअप में रखा गया था। स्पष्ट इनकार के अभाव में, कोर्ट ने माना कि अवैध हिरासत का तथ्य खुद-ब-खुद साबित (Deemed Admitted) हो जाता है।
पुलिस का काम न्याय पंचायत चलाना नहीं: जस्टिस जे.जे. मुनीर ने बेहद तीखे लहजे में कहा कि जब तक कोई स्पष्ट संज्ञेय अपराध (Cognisable Offence) न हुआ हो, पुलिस का ऐसे पारिवारिक मामलों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा, वह पुलिस अधिकारी कोई आध्यात्मिक गुरु, ‘पंच परमेश्वर’ या कोई सामाजिक नेता नहीं था, जिसके पास याचिकाकर्ता और उसका रिश्तेदार मार्गदर्शन और शांतिपूर्ण समझौते के लिए स्वेच्छा से दौड़े चले जाएंगे। यह बिल्कुल अस्वाभाविक है कि घरेलू विवाद का कोई आरोपी खुद चलकर थाने जाए ताकि वह पुलिस के सामने समझौता कर सके।
प्रशासनिक जांच काफी नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी पुलिसकर्मी दुबे के खिलाफ विभागीय या अनुशासनात्मक जांच (Disciplinary Inquiry) शुरू करना सरकार का एक प्रशासनिक काम है। भले ही उसे बाद में सजा मिल जाए, लेकिन उससे याचिकाकर्ता को हुए मानसिक और शारीरिक कष्ट तथा उसकी स्वतंत्रता के हनन की भरपाई नहीं हो सकती।
विधिक विश्लेषण: इलाहाबाद हाई कोर्ट का अंतिम विधिक आदेश
अदालत ने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार और दोषी पुलिसकर्मी दोनों की जवाबदेही तय की है।
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | इलाहाबाद हाई कोर्ट का विधिक निष्कर्ष और निर्देश |
| पीड़ित को मुआवजा | उत्तर प्रदेश सरकार को ₹25,000 का मुआवजा और ₹10,000 का अदालती खर्च पीड़ित को देना होगा। |
| दोषी पुलिसकर्मी पर गाज | हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को यह खुली छूट (Liberty) दी है कि वह पीड़ित को दी जाने वाली यह पूरी राशि दोषी पुलिस अधिकारी (दुबे) के वेतन या संपत्ति से वसूल (Recover) करे। |
| दीवानी मुकदमे की स्वतंत्रता | कोर्ट ने साफ किया कि इस रिट याचिका में तय किया गया मुआवजा अंतिम नहीं है। याचिकाकर्ता यदि चाहे, तो अवैध हिरासत के कारण हुए मानहानि और नुकसान के लिए दीवानी अदालत (Civil Court) में अधिक हर्जाने का दीवानी मुकदमा दायर करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। |

