Monday, September 21, 2026
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Haryana Civil Services: सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार से क्यों कहा: ‘अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को तुरंत बदलें’? जानिए क्या है पूरा मामला

Haryana Civil Services: सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को अपने ‘हरियाणा सिविल सेवा (अनुकंपा वित्तीय सहायता या नियुक्ति) नियम, 2019’ में मौजूद एक “बड़ी विसंगति” (significant anomaly) को तुरंत ठीक करने का निर्देश दिया है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इसे कानून की एक गंभीर खामी (legislative lacuna) माना है, जिससे प्रशासनिक दिक्कतें और फिजूल की मुकदमेबाजी पैदा हो रही है। कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि मौजूदा नियमों के तहत यदि किसी सरकारी कर्मचारी की हत्या के मामले में परिवार का कोई सदस्य आरोपी है, तो उसकी वित्तीय सहायता तो रोक दी जाती है, लेकिन उसे सरकारी नौकरी (अनुकंपा नियुक्ति) देने पर कोई रोक नहीं है।

क्या है नियमों की वह विसंगति (Anomaly)?

हरियाणा सरकार के 2019 के नियमों के नियम 23(1) में यह प्रावधान है कि यदि अनुकंपा सहायता पाने के लिए पात्र परिवार का कोई सदस्य सरकारी कर्मचारी की हत्या या हत्या के लिए उकसाने का आरोपी है, तो आपराधिक कार्यवाही लंबित रहने तक उसकी मासिक वित्तीय सहायता (financial assistance) सस्पेंड कर दी जाएगी। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि नियमों में अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) को लेकर ऐसा कोई रोक लगाने वाला प्रावधान नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि एक तरफ तो आरोपी परिवार को हर महीने मिलने वाले कुछ पैसों पर रोक लग जाती है, लेकिन दूसरी तरफ उसी अवधि के दौरान वह आरोपी व्यक्ति स्थायी सरकारी नौकरी पाने का हकदार बना रहता है।

कम लाभ पर रोक, बड़े लाभ पर छूट — कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने वित्तीय सहायता और सरकारी नौकरी की तुलना करते हुए कहा, यह बेहद अजीब और विरोधाभासी है कि नियम बनाने वाली अथॉरिटी ने कर्मचारी की हत्या के मामले में वित्तीय सहायता जैसे छोटे लाभ को तो सस्पेंड करने का प्रावधान रखा, लेकिन जीवनभर का वेतन, प्रमोशन, पेंशन और भत्ते देने वाली स्थायी सरकारी नौकरी जैसे बहुत बड़े लाभ को रोकने के लिए कोई सुरक्षा उपाय नहीं किया।

किस मामले की सुनवाई के दौरान आया यह फैसला?

यह पूरा मामला अतुल चौहान नाम के एक युवक से जुड़ा है। अतुल के पिता हरियाणा में एक सरकारी स्कूल शिक्षक थे, जिनकी मृत्यु हो गई। अतुल की मां पर अपने ही पति (अतुल के पिता) की हत्या की साजिश रचने का मुकदमा चल रहा था। इस आपराधिक मामले के कारण प्रशासन ने अतुल की अनुकंपा नियुक्ति के दावे को अधर (abeyance) में लटका दिया था। सुप्रीम कोर्ट का रुख: कोर्ट ने अतुल चौहान की अपील को स्वीकार कर लिया।

कारण: कोर्ट ने कहा कि चूंकि नियम 23(1) में सिर्फ ‘वित्तीय सहायता’ को सस्पेंड करने की बात कही गई है, ‘अनुकंपा नियुक्ति’ की नहीं, इसलिए प्रशासन नियमों में जो लिखा नहीं है, उसे खुद से लागू नहीं कर सकता। कानूनन अतुल को राहत देते हुए कोर्ट ने हरियाणा सरकार को इस कानूनी खामी को सुधारने की हिदायत दी।

अदालती फैसले का विस्तृत ‘डिजिटल हिंदी’ विश्लेषण

यह फैसला प्रशासनिक कानून (Administrative Law) के एक बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करता है। इसका विश्लेषण 3 प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है।

न्यायिक सीमाएं बनाम नीति निर्माण (Judicial Restraint)

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कोर्ट का काम कानून को वैसा ही लागू करना है जैसा वह लिखा गया है (Apply the law as it is)। अदालतें खुद से कानून की व्याख्या करके उसमें अपनी तरफ से कोई नई शर्त नहीं जोड़ सकतीं। संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत नियमों में बदलाव करना या इस विसंगति को दूर करना पूरी तरह से कार्यपालिका (Executive) और सरकार के नीति-निर्माण के दायरे में आता है।

प्रशासनिक और नैतिक विरोधाभास

मौजूदा नियम एक बहुत बड़ा नैतिक संकट खड़ा करते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने ही परिवार के सरकारी कर्मचारी की हत्या की साजिश में शामिल है, तो उसे कानूनी खामी का फायदा उठाकर स्थायी सरकारी सेवा का हिस्सा बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इससे न केवल न्याय का मखौल उड़ता है, बल्कि सरकारी विभागों में अनुशासन भी प्रभावित होता है।

हरियाणा सरकार के लिए अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब हरियाणा सरकार को ‘हरियाणा सिविल सेवा नियम, 2019’ में तत्काल संशोधन करना होगा। सरकार को नियम 23(1) के दायरे को बढ़ाकर उसमें ‘वित्तीय सहायता’ के साथ-साथ ‘अनुकंपा नियुक्ति’ को भी शामिल करना होगा, ताकि जब तक कर्मचारी की हत्या के मामले में आपराधिक सुनवाई (trial) पूरी नहीं हो जाती, तब तक आरोपी परिवार के किसी भी सदस्य को सरकारी नौकरी न दी जा सके।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए न्यायपालिका की सीमाओं को बनाए रखते हुए कार्यपालिका को उसका कर्तव्य याद दिलाया है, ताकि भविष्य में कोई भी आरोपी कानून की कमियों का फायदा उठाकर सरकारी व्यवस्था में प्रवेश न कर सके।

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