Tuesday, August 4, 2026
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Procedural Defect: नियुक्ति प्रक्रिया की मामूली तकनीकी कमी से पूरी भर्ती रद्द नहीं की जा सकती…यह है फैसले के पीछे की वजह, पढ़ें

Procedural Defect: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी और सहकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने हरियाणा की एक सहकारी समिति के 10 साल से अधिक समय से सेवा दे रहे सात कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा है कि यदि कोई भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से आयोजित की गई हो, तो अंतिम चरण (final stage) में हुई किसी प्रक्रियात्मक या तकनीकी कमी (procedural defect) के कारण पूरी भर्ती को अवैध या अमान्य नहीं ठहराया जा सकता।

क्या था मामला और कहां हुई थी ‘चूक’?

यह मामला कुरुक्षेत्र की ‘थानेसर को-ऑपरेटिव मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी’ में साल 2014 में क्लर्क-कम-सेल्समैन और पीन-कम-चौकीदार के पदों पर हुई नियुक्तियों से जुड़ा है।

सहकारी समिति के कुछ सदस्यों ने इन नियुक्तियों को इस आधार पर चुनौती दी थी कि इसमें स्टाफ सर्विस रूल्स, 2003 के नियम 3 का उल्लंघन हुआ था। इस नियम के अनुसार, जिस बोर्ड बैठक में अंतिम नियुक्ति का फैसला लिया जाता है, उसमें निम्नलिखित तीन अधिकारियों की उपस्थिति और सहमति अनिवार्य है, इसमें सहायक रजिस्ट्रार सहकारी समितियां (Assistant Registrar), निरीक्षक सहकारी समितियां (Inspector) और हैफेड (HAFED) के जिला प्रबंधक। 13 अगस्त 2014 को जब इन कर्मचारियों की नियुक्ति को मंजूरी दी गई, तब ये तीनों अधिकारी उस बैठक में उपस्थित नहीं थे। इसी आधार पर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इन नियुक्तियों को रद्द करने के फैसले को सही ठहराया था।

सुप्रीम कोर्ट का रुख: ‘त्रुटि सुधारी जा सकती है’

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए गौरव मेहला और अन्य कर्मचारियों की अपील को स्वीकार कर लिया। शीर्ष अदालत ने भर्ती प्रक्रिया को तीन अलग-अलग चरणों में बांटकर देखा।

  • चरण 1: पदों का विज्ञापन (Advertisement)
  • चरण 2: चयन प्रक्रिया/इंटरव्यू (Selection Process)
  • चरण 3: अंतिम नियुक्ति का निर्णय (Final Appointment Decision)

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पहले दो चरणों (विज्ञापन या इंटरव्यू) में कोई बुनियादी खामी, धोखाधड़ी या धांधली होती है, तो पूरी भर्ती रद्द होनी चाहिए। लेकिन इस मामले में विज्ञापन और इंटरव्यू पूरी तरह पारदर्शी थे। कमी सिर्फ तीसरे चरण (अधिकारियों की अनुपस्थिति) में थी, जो कि एक ‘सुधारने योग्य त्रुटि’ (curable defect) है। कोर्ट ने कहा कि इन अधिकारियों की भूमिका केवल यह सुनिश्चित करने की थी कि नियमों का पालन हुआ है या नहीं।

अधिकारियों की अनुपस्थिति के कारण पूरी भर्ती प्रक्रिया को अवैध नहीं माना जा सकता। इसके अलावा, अधिकारियों की इस लापरवाही या चूक के लिए उन कर्मचारियों को सजा नहीं दी जा सकती, जिनका इस प्रक्रियात्मक त्रुटि में कोई रोल नहीं था और जो 10 साल से अधिक की सेवा दे चुके हैं।
— सुप्रीम कोर्ट

अदालती फैसले का विस्तृत ‘डिजिटल हिंदी’ विश्लेषण

यह फैसला प्रशासनिक सुधार और कर्मचारियों के अधिकारों के संरक्षण के लिहाज से काफी अहम है।

अधिकारियों की गलती का खामियाजा कर्मचारी क्यों भुगतें?

न्यायशास्त्र (Jurisprudence) का यह एक स्थापित सिद्धांत है कि प्रशासन या अधिकारियों द्वारा की गई किसी तकनीकी चूक की सजा किसी निर्दोष नागरिक या कर्मचारी को नहीं मिलनी चाहिए। इस मामले में, कर्मचारियों ने पूरी ईमानदारी से परीक्षा और इंटरव्यू पास किया था। बोर्ड की बैठक में कौन से अधिकारी आए और कौन से नहीं, इस पर उम्मीदवारों का कोई नियंत्रण नहीं था।

‘बुनियादी खामी’ बनाम ‘तकनीकी कमी’ में अंतर

इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य के मुकदमों के लिए एक स्पष्ट रेखा खींच दी है। अदालत ने साफ किया है कि न्याय करते समय ‘सद्भावना’ (Good Faith) और ‘नीयत’ को देखा जाना चाहिए। अगर चयन प्रक्रिया में कोई भ्रष्टाचार या भाई-भतीजावाद नहीं हुआ है, तो केवल एक कागजी या प्रक्रियात्मक नियम के छूट जाने से किसी का रोजगार नहीं छीना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का आगे के लिए निर्देश

शीर्ष अदालत ने सहकारी समिति को निर्देश दिया है कि वह एक महीने के भीतर बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक दोबारा बुलाए। इस बैठक में उन तीनों अनिवार्य अधिकारियों (सहायक रजिस्ट्रार, निरीक्षक और हैफेड प्रबंधक) की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।

सीमित अधिकार: कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यह बोर्ड पुराना इंटरव्यू या विज्ञापन की जांच दोबारा नहीं शुरू कर सकता। बोर्ड को सिर्फ यह देखना होगा कि चुने गए कर्मचारी तय योग्यताएं पूरी करते हैं या नहीं।

सेवा की निरंतरता: यदि ये कर्मचारी दोबारा योग्य पाए जाते हैं, तो उनकी पिछले 10 साल की सेवा को सभी लाभों (पेंशन, वरिष्ठता आदि) के लिए गिना जाएगा। हालांकि, अगस्त 2025 में नौकरी से हटाए जाने के बाद से अब तक की अवधि का पिछला वेतन (arrears of salary) उन्हें नहीं मिलेगा।

अंतिम निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तकनीकी रूढ़िवादिता के ऊपर व्यावहारिक न्याय (Substantive Justice) को प्राथमिकता देता है। यह स्थापित करता है कि कानून का उद्देश्य लोगों को राहत देना है, न कि प्रशासनिक बारीकियों के आधार पर उनके लंबे करियर को तबाह करना।

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