Sunday, September 20, 2026
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Grounds of Arrest: हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारी में एंटी-करप्शन ब्यूरो की कार्यप्रणाली पर क्यों उठा सवाल…अनुच्छेद 21 और 22(1) के बारे में जानिए

राजस्थान हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) द्वारा की गई एक हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारी के मामले में नागरिक अधिकारों और पुलिस कार्यप्रणाली को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए गिरफ्तारी को चुनौती नहीं

यह निर्णय जस्टिस अशोक कुमार जैन और जस्टिस उमाशंकर व्यास की खंडपीठ ने डॉ. महेश जोशी के पुत्र रोहित जोशी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट पाया कि एसीबी ने आरोपी को गिरफ्तारी के आधार (Grounds of Arrest) लिखित में न देकर संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 47 का गंभीर उल्लंघन किया है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि एक बार जब विशेष न्यायाधीश (Special Judge) द्वारा लगातार न्यायिक रिमांड (Judicial Remand) के आदेश पारित कर दिए जाते हैं, तो उसके बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका के जरिए गिरफ्तारी को चुनौती नहीं दी जा सकती।

मामला और विधिक पृष्ठभूमि (Factual Background)

प्राथमिकी (FIR) और गिरफ्तारी: एसीबी ने 30 अक्टूबर 2024 को डॉ. महेश जोशी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988 और आईपीसी की विभिन्न गंभीर धाराओं (जैसे धारा 409, 467, 120B) के तहत एफआईआर दर्ज की थी। इसके बाद 7 मई 2026 को सुबह 7:45 बजे उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

याचिकाकर्ता का तर्क: डॉ. जोशी के बेटे ने 19 मई 2026 को हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर कहा कि गिरफ्तारी के समय न तो आरोपी को और न ही उनके परिवार को गिरफ्तारी के ठोस कारण लिखित में दिए गए, जो कि उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।

विशेष अदालत का रवैया (Criticism of Special Judge): गिरफ्तारी के तुरंत बाद 7 मई को जब आरोपी को विशेष न्यायाधीश के सामने पेश किया गया, तो उनके वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के मार्गदर्शक सिद्धांतों का उल्लंघन होने की बात उठाई। लेकिन विशेष जज ने उस आवेदन पर फैसला करने के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया और पुलिस रिमांड मंजूर कर ली। बाद में इस आवेदन को 31 दिनों की देरी के बाद 8 जून 2026 को खारिज किया गया, जिसकी हाई कोर्ट ने कड़ी आलोचना की।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: ‘कारण’ और ‘आधार’ में अंतर (Reason vs Ground)

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के पंकज बंसल (2024), प्रबीर पुरकायस्थ (2024) और मिहिर राजेश शाह (2025) के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए एसीबी और राज्य पुलिस की समझ पर गंभीर सवाल उठाए:

लिखित में आधार देना अनिवार्य (BNSS की धारा 47)

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल यह बता देना कि आपके खिलाफ कौन सी धाराएं या एफआईआर दर्ज हैं, गिरफ्तारी का आधार (Ground of Arrest) नहीं कहलाता; वह केवल गिरफ्तारी का कारण (Reason of Arrest) है। ‘आधार’ का मतलब है कि आरोपी की विशिष्ट भूमिका क्या है, उसके खिलाफ क्या सबूत हैं और उसे गिरफ्तार करना क्यों जरूरी था। यह सब आरोपी की समझने योग्य भाषा में लिखित रूप में दिया जाना अनिवार्य है।

एसीबी के बयानों में हेरफेर और ‘मनगढ़ंत’ तथ्य

हाई कोर्ट ने नोट किया कि एसीबी ने पहले जवाब (11 मई) और विस्तृत जवाब (14 मई) में विरोधाभासी बातें कहीं। बाद में कहानी गढ़ी गई कि दो एडिशनल एसपी सुबह 4:15 बजे ही उनके घर पहुंच गए थे, जिसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड रिमांड पेपर में नहीं था। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि “हम सुरक्षित रूप से कह सकते हैं कि ये एसीबी द्वारा हेरफेर किए गए (Manipulated) तथ्य हैं।” कस्टडी में लिए जाने के बाद मेमो पर कराए गए हस्ताक्षरों को कोर्ट ने विधिक रूप से शून्य (No Evidentiary Value) माना।

बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका क्यों खारिज हुई?

इतनी गंभीर विधिक कमियों और अवैधताओं को दर्ज करने के बावजूद, हाई कोर्ट ने विधिक सिद्धांतों के तहत याचिका को खारिज कर दिया।

न्यायिक रिमांड का विधिक अवरोध: सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम तस्नीम रिज़वान सिद्दीकी (2018) और वी. सेंथिल बालाजी (2023) मामलों का अनुसरण करते हुए खंडपीठ ने कहा कि जब कोई व्यक्ति सक्षम अदालत के ‘न्यायिक रिमांड आदेश’ के तहत कस्टडी में होता है, तो उसकी कस्टडी को स्वतः ‘अवैध’ नहीं माना जा सकता।

वैकल्पिक विधिक उपाय: चूंकि 19 मई को याचिका दायर होने से पहले ही विशेष अदालत कई बार रिमांड आदेश जारी कर चुकी थी, इसलिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका विचारणीय नहीं बची। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता विशेष अदालत के 8 जून के आदेश को नियमित विधिक प्रक्रियाओं (जैसे वैधानिक जमानत या पुनरीक्षण याचिका) के जरिए चुनौती देने के लिए स्वतंत्र हैं।

संस्थागत सुधार: पुलिस और जजों की ट्रेनिंग के निर्देश

राजस्थान पुलिस की विधिक समझ पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए हाई कोर्ट ने आदेश दिया। इस आदेश की एक प्रति रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत की जाए। एक प्रति अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह), राजस्थान सरकार को भेजी जाए। राज्य के सभी पुलिस अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसलों— विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2025) और मिहिर राजेश शाह (2025) के तहत अनिवार्य रूप से विधिक प्रशिक्षण (Training) दिया जाए, ताकि भविष्य में गिरफ्तारी के समय अनुच्छेद 21 और 22(1) का अक्षरशः पालन सुनिश्चित हो सके।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुराजस्थान उच्च न्यायालय का विधिक रुख (जून 2026)
मामला/याचिका संख्याडी.बी. बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका संख्या 171/2026 (रोहित जोशी बनाम राजस्थान राज्य)।
माननीय पीठ (Coram)जस्टिस अशोक कुमार जैन और जस्टिस उमाशंकर व्यास।
मुख्य विधिक उल्लंघनएसीबी ने डॉ. महेश जोशी को गिरफ्तारी के आधार लिखित में नहीं दिए (BNSS धारा 47 व अनु. 22(1) का उल्लंघन)।
खारिज होने का विधिक कारणसक्षम अदालत द्वारा पारित क्रमिक ‘न्यायिक रिमांड आदेशों’ के कारण बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) प्रभावी नहीं।
महत्वपूर्ण विधिक नजीरविहान कुमार बनाम हरियाणा (2025) एवं मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र (2025 INSC 1288)
खुला रखा गया मुद्दा6 मई 2026 के हुक्मनामा दस्तावेज के कथित फर्जीवाड़े (Fabrication) के आरोप को भविष्य की कार्यवाही के लिए खुला रखा गया है।
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