Rape Case: केरल हाईकोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ होने वाले गंभीर यौन अपराधों और अदालतों में होने वाले ‘आपसी समझौतों’ (Compromise) के विधिक अंतर्संबंधों पर एक बड़ा नजीर पेश किया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन की एकल पीठ ने एक डॉक्टर (MBBS ग्रेजुएट) आरोपी की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उसने पीड़िता (जो खुद एक डॉक्टर है) के साथ हुए समझौते के हलफनामे (Affidavit) के आधार पर अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे को बंद करने की गुहार लगाई थी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि दुष्कर्म (Rape) और शारीरिक प्रताड़ना जैसे गंभीर अपराध समाज को प्रभावित करते हैं, इसलिए केवल दोनों पक्षों के बीच ‘राजीनामा’ या समझौता हो जाने मात्र से आपराधिक कार्यवाहियों (Criminal Proceedings) को समाप्त या रद्द (Quash) नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि: प्यार, सगाई, यौन उत्पीड़न और बॉडी-शेमिंग
सगाई और रिश्ता: यह पूरा मामला दो पढ़े-लिखे डॉक्टरों के बीच के रिश्ते में आई विधिक विकृति से जुड़ा है। याचिकाकर्ता (आरोपी) और पीड़िता दोनों एमबीबीएस (MBBS) ग्रेजुएट हैं और साल 2022 से एक-दूसरे से प्यार करते थे। 25 मार्च, 2023 को दोनों का आधिकारिक सगाई समारोह (Betrothal/Engagement) संपन्न हुआ था।
गंभीर आरोप (13 मई, 2024): आरोप के अनुसार, सगाई होने का हवाला देकर आरोपी ने पीड़िता पर शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डाला। जब पीड़िता ने इसके लिए अपनी सहमति नहीं दी (Consent withheld), तो आरोपी ने उसे बेरहमी से पीटा और उसके साथ जबरन यौन उत्पीड़न/दुष्कर्म किया।
अपमान और शादी से इंकार: इसके बाद, पीड़िता की गरिमा को ठेस पहुंचाने (Outrage the modesty) के इरादे से आरोपी ने उसके दोस्तों के सामने उसे सरेआम ‘बॉडी-शेम’ (शारीरिक बनावट का मजाक उड़ाना) किया और अंततः शादी करने से मना कर दिया।
विधिक बहस: ‘राजीनामे’ के आधार पर केस रद्द करने की मांग
आरोपी के वकीलों (आर. अनिल, सुजेश मेनन वी.बी. और थॉमस साबू वडक्केकुट) ने हाई कोर्ट में दलील दी कि दोनों पक्षों ने अदालत के बाहर मामले को पूरी तरह और सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया है। पीड़िता ने खुद एक विधिक हलफनामा दायर कर कहा है कि उसकी अब कोई शिकायत शेष नहीं है और वह मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। इसी समझौते के आधार पर सेशंस कोर्ट ने आरोपी को 8 दिनों की न्यायिक हिरासत के बाद जमानत भी दे दी थी। वकीलों का तर्क था कि चूंकि मामला सुलझ चुका है, इसलिए मुकदमे को जारी रखना न्यायिक समय की बर्बादी और विधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of process of law) होगा।
हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: बीएनएसएस (BNSS) की धारा 528 के तहत शक्तियां
केरल हाई कोर्ट ने आरोपी की इन सभी विधिक दलीलों को खारिज करते हुए बेहद सख्त टिप्पणियां कीं।
दुष्कर्म एक व्यक्तिगत विवाद नहीं, समाज के खिलाफ अपराध है
अदालत ने कहा कि आरोपी मैरिट (गुण-दोष) पर केस रद्द करने की मांग नहीं कर रहा है, बल्कि केवल समझौते की आड़ ले रहा है। इस मामले में शामिल अपराध स्पष्ट रूप से व्यक्तिगत या निजी प्रकृति का (Private in nature) नहीं है। इसका निश्चित रूप से समाज पर गहरा और गंभीर प्रभाव पड़ता है। इसलिए, आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच हुए किसी भी कथित समझौते को आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
जघन्य अपराधों में विधिक छूट नहीं
अदालत ने रेखांकित किया कि एक अविवाहित महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया, पीटा गया और उसके दोस्तों के सामने उसे मानसिक व सामाजिक रूप से प्रताड़ित (Body-shame) किया गया। यह एक जघन्य (Heinous) कृत्य है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की सीमाएं
अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 (हाई कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का संरक्षण / Saving of inherent powers of High Court – जो पूर्ववर्ती CrPC की धारा 482 के समान है) के तहत मिलने वाले विशेषाधिकारों का उपयोग ऐसे गंभीर और असामाजिक मामलों में समझौते के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix)
| कानूनी बिंदु / श्रेणियां | केरल उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (जून 2026) |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन (एकल पीठ) |
| प्रासंगिक वैधानिक कानून | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या दुष्कर्म और बॉडी-शेमिंग जैसे गंभीर मामलों को पीड़िता की सहमति और समझौते (Compromise) के आधार पर रद्द किया जा सकता है? |
| अदालत का अंतिम आदेश | नहीं। याचिका पूरी तरह खारिज; आरोपी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा ट्रायल कोर्ट में जारी रहेगा। |

