Monday, August 10, 2026
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Drinking Water II: आजादी के 75 साल बाद भी नागरिक पानी के लिए अदालत आने को मजबूर…महाराष्ट्र के गांव का क्या है मामला, जानिए यहां पर

Drinking Water II: बॉम्बे हाईकोर्ट ने देश की आजादी के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी नागरिकों को पीने के पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता से वंचित रहने पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है।

अमरावती जिले के आदिवासी क्षेत्र मेलघाट व महाराष्ट्र में पेयजल संकट

हाईकोर्ट के जस्टिस अजय एस. गदकरी और जस्टिस कमल आर. खाता की खंडपीठ ने अमरावती जिले के आदिवासी क्षेत्र मेलघाट (Melghat) और पूरे महाराष्ट्र राज्य में पानी के गंभीर संकट व कुपोषण से जुड़ी जनहित याचिकाओं (PILs) पर सुनवाई करते हुए यह तल्ख टिप्पणियां कीं। अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए स्पष्ट किया कि सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल (Potable Drinking Water) पाना नागरिकों का एक बुनियादी मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है, न कि प्रशासनिक अधिकारियों का कोई विवेकाधिकार या उपकार।

मामले की पृष्ठभूमि: चिलचिलाती गर्मी, टैंकर राज और कोर्ट का हस्तक्षेप

यह विधिक हस्तक्षेप मेलघाट और महाराष्ट्र के अन्य आदिवासी/ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में बढ़ते कुपोषण और पानी की भीषण किल्लत को लेकर दायर याचिकाओं पर हुआ है।

पिछली सुनवाई (7 मई 2026) का निर्देश: गर्मियों की शुरुआत में हाई कोर्ट ने राज्य प्रशासन को सख्त निर्देश दिए थे कि विदर्भ क्षेत्र के अमरावती जिले के मेलघाट इलाके के कम से कम 300 गांवों में चिलचिलाती धूप और बढ़ते तापमान के बीच “इंसान और मवेशी” प्यासे नहीं रहने चाहिए। उन्हें पर्याप्त जलापूर्ति मिलनी चाहिए।

सरकार की दलील पर कोर्ट की नाराजगी: सरकारी वकील ने जब अदालत में दलील दी कि प्रशासन ने कुछ क्षेत्रों में ‘टैंकरों को तैयार (Readiness)’ रखा है और जैसे ही किसी गांव से पानी की मांग का कोई ‘संकेत (Indication)’ मिलता है, वहां तुरंत टैंकर भेज दिया जाता है। इस ‘मांग और आपूर्ति’ वाले तर्क पर अदालत भड़क उठी।

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हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां: पानी कोई विलासिता (Luxury) नहीं है

न्यायाधीशों ने सरकार के प्रशासनिक रवैये और ‘टैंकर प्रणाली’ की कड़ी आलोचना करते हुए निम्नलिखित विधिक एवं मानवीय सिद्धांत रेखांकित किए।

प्रशासनिक उपकार नहीं, संवैधानिक अधिकार है

सरकारी दलीलों को खारिज करते हुए खंडपीठ ने मौखिक रूप से कहा, आजादी के 75 साल से अधिक समय के बाद भी, महाराष्ट्र जैसे (प्रगतिशील) राज्य में एक याचिकाकर्ता को पीने के पानी के लिए अदालत के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। आप केवल टैंकर उपलब्ध करा रहे हैं, आप ऐसा करके कोई उपकार या दायित्व (Obliging) नहीं निभा रहे हैं।

पानी के लिए इंसान 24 घंटे इंतजार नहीं कर सकता

जब सरकारी वकील ने मेलघाट क्षेत्र का विशिष्ट डेटा देना शुरू किया, तो कोर्ट ने साफ किया कि वे केवल एक क्षेत्र नहीं बल्कि पूरे महाराष्ट्र की स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं। कहा, “महाराष्ट्र के एक नागरिक के तौर पर मुझे पीने का पानी नहीं मिल रहा है। एक मनुष्य के लिए पानी अपरिहार्य और आवश्यक है। आपको पानी की आपूर्ति के लिए किसी ‘संकेत’ या मांग की प्रतीक्षा क्यों है? कोई भी व्यक्ति पीने के पानी के लिए 24 घंटे तक इंतजार नहीं कर सकता।”

कोरे आश्वासनों के बजाय ठोस जमीनी योजना की आवश्यकता

अदालत ने सरकार को चेताया कि अब बहानों का वक्त निकल चुका है। कहा, अदालत द्वारा आदेश पर आदेश पारित किए जा रहे हैं… हम खुद को महाराष्ट्र का एक प्रगतिशील राज्य कहते हैं। पानी न देने के लिए हमें प्रशासनिक बहाने मत बताइए। याचिकाकर्ता आपसे किसी विलासिता (Luxury) की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपना बुनियादी मौलिक अधिकार मांग रहे हैं। हमें एक ठोस योजना (Concrete Scheme) बताइए कि आप क्षेत्र के अंतिम व्यक्ति तक पीने का पानी कैसे पहुँचाएंगे।

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix)

कानूनी बिंदु / श्रेणियांबॉम्बे उच्च न्यायालय की विधिक कार्यवाही (2026)
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस अजय एस. गदकरी और जस्टिस कमल आर. खाता (खंडपीठ)
मूल विधिक मुद्दामेलघाट और संपूर्ण महाराष्ट्र में पेयजल संकट तथा उससे उपजा कुपोषण।
अदालत का विधिक स्टैंडसुरक्षित पेयजल तक पहुंच भारतीय संविधान के तहत एक बुनियादी मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है।
अदालत का सख्त आदेशराज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वे मंगलवार, 23 जून की अगली सुनवाई के दौरान पूरे राज्य के लिए एक तत्काल और ठोस कार्यान्वयन योजना (Immediate Implementation Plan) अदालत के समक्ष पेश करें।
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