केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (August 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति संदीप जैन (इलाहाबाद उच्च न्यायालय) |
| याचिका का प्रकार | बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) |
| संबंधित संवैधानिक प्रावधान | Article 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) एवं Article 25 (धर्म को मानने और आचरण की स्वतंत्रता) |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | 1. बालिग नागरिक की व्यक्तिगत स्वायत्तता (Decisional Autonomy) माता-पिता या सामाजिक नैतिकता से ऊपर है। 2. अवैध बंधक (Illegal Confinement) में पुलिस की ढिलाई पर सार्वजनिक कानून के तहत क्षतिपूर्ति (Monetary Compensation) लागू होगी। |
| अदालत का अंतिम आदेश | 1. ₹25 लाख का संयुक्त मुआवजा (पिता + राज्य सरकार)। 2. महिलाओं को पूर्ण स्वतंत्रता और पुलिस सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश। |
Conversion To Islam: इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने हिंदू धर्म छोड़कर स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपनाने के बाद अपने पिता द्वारा अवैध रूप से बंधक बनाई गईं दो बालिग बहनों को ₹25 लाख का मुआवजा देने का ऐतिहासिक आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति संदीप जैन (Justice Sandeep Jain) की पीठ ने फैसला सुनाते हुए आदेश दिया कि मुआवजे की यह राशि बहनों के पिता और राज्य सरकार (उत्तर प्रदेश सरकार) द्वारा संयुक्त रूप से दी जाएगी। अदालत ने पाया कि वर्ष 2021 से दोनों महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन किया जा रहा था और राज्य मशीनरी (पुलिस) ने उनकी रिहाई सुनिश्चित करने के बजाय आपराधिक कार्यवाही की आड़ में उनके अवैध डिटेंशन को जारी रहने दिया।
6 अगस्त के अपने फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों महिलाएं अपनी पसंद के किसी भी स्थान पर रहने और किसी भी व्यक्ति के साथ रहने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं।
हाई कोर्ट की प्रमुख संवैधानिक टिप्पणियां
- “संवैधानिक अधिकार माता-पिता के प्रभुत्व से ऊपर हैं”:
- पीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा: “संविधान माता-पिता को अपने बालिग बच्चों को केवल इसलिए कैद करने का लाइसेंस नहीं देता क्योंकि वे उनके धर्म, मान्यताओं या व्यक्तिगत प्राथमिकताओं से असहमत हैं। संवैधानिक अधिकारों को पैतृक अधिकार, सामाजिक नैतिकता या बहुसंख्यकवादी भावनाओं से दबाया नहीं जा सकता।”
- अनुच्छेद 21 और 25 के तहत मौलिक अधिकार:
- अदालत ने माना कि बालिग होने के नाते महिलाओं के पास जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन न होने योग्य संवैधानिक अधिकार है। अपनी आस्था चुनना (Freedom of Conscience) और रहने का स्थान तय करना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) के अभिन्न पहलू हैं।
- धर्मांतरण कानून (UP Conversion Law) की आड़ पर टिप्पणी:
- कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के अनुपालन न करने की धारणा मात्र से दो बालिग महिलाओं को उनके पिता द्वारा उनकी इच्छा के विरुद्ध बंधक बनाकर रखने का अधिकार नहीं मिल जाता।
- अदालत ने दर्ज किया कि महिलाओं ने बिना किसी दबाव, कपट, लालच या अनुचित प्रभाव के केवल अपनी आध्यात्मिक संतुष्टि और मन की शांति के लिए स्वेच्छा से इस्लाम अपनाया था।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका
- यह मामला दो बहनों (उम्र ~20 वर्ष और ~35 वर्ष) की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से सामने आया। याचिका में बताया गया कि उन्होंने अपनी मर्जी से हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था और अपनी पसंद से शादी करना चाहती थीं।
- पिता और पुलिस की सांठगांठ का आरोप
- उनके पिता ने उन्हें रोकने के लिए पुलिस में अपहरण (Kidnapping) का झूठा मुकदमा दर्ज कराया और आरोप है कि पुलिस के साथ मिलीभगत करके दोनों बेटियों को 2021 से घर में अवैध रूप से बंद कर दिया।
- अदालत में व्यक्तिगत बातचीत
- 30 जुलाई को कोर्ट के निर्देश पर महिलाओं को पीठ के समक्ष पेश किया गया। जज ने उनसे सीधे बातचीत की और पाया कि वे शिक्षित, बालिग और अपनी पसंद तय करने में सक्षम हैं, लेकिन उन्हें लंबे समय से जबरन उनकी स्वतंत्रता से वंचित रखा गया था।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश एवं निर्देश
- ₹25 लाख का मुआवजा: पिता और राज्य सरकार संयुक्त रूप से दोनों बहनों को ₹25 लाख की क्षतिपूर्ति/मुआवजा देंगे।
- दस्तावेज और व्यक्तिगत सामान लौटाने का आदेश: पिता को 7 दिनों के भीतर दोनों बहनों के पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाणपत्र, पहचान पत्र, बैंक पासबुक, चेकबुक, धर्मांतरण संबंधी दस्तावेज और निजी सामान वापस करने का निर्देश दिया गया।
- सुरक्षा का निर्देश: कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को निर्देश दिया कि वे दोनों बहनों को पूरी सुरक्षा प्रदान करें ताकि कोई भी उनके जीवन और स्वतंत्रता में बाधा न डाल सके।

