Monday, August 10, 2026
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Drinking Water-I : आपकी रिपोर्ट झूठी हैं, जमीनी हकीकत कुछ और है…ग्रामीण महाराष्ट्र में पानी की किल्लत पर क्यों लगी फटकार, पढ़िए पूरी खबर

Drinking Water-I : बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में पीने के साफ पानी की भारी किल्लत और दूषित पानी पीने से हो रही मौतों पर बेहद आक्रामक और सख्त रुख अपनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस ए. एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाटा की खंडपीठ ने अमरावती जिले के मेलघाट आदिवासी क्षेत्र में कुपोषण और पानी की कमी से बच्चों व माताओं की मौत से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह तल्ख टिप्पणी की।

मामला क्या है?: दूषित पानी से मौतें और कागजी टैंकर

यह मामला महाराष्ट्र के सुदूर ग्रामीण और विशेषकर आदिवासी इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की विफलता से जुड़ा है।

कुपोषण और मौतों का मुद्दा: हाई कोर्ट मेलघाट क्षेत्र में कुपोषण (Malnutrition) के कारण नवजातों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की होने वाली मौतों को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था।

दूषित पानी का कहर: याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने अदालत को बताया कि भीषण गर्मी के बीच इन इलाकों में साफ पीने के पानी की भारी किल्लत है। स्वच्छ पानी न मिलने के कारण ग्रामीणों को दूषित पानी पीना पड़ रहा है, जिससे हाल ही में 13 लोगों की मौत हो चुकी है और कई लोग गंभीर रूप से बीमार हैं।

सरकार का कागजी दावा: सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सरकारी वकील पूजा जोशी ने अदालत को आश्वस्त करने की कोशिश की कि राज्य के सभी गांवों में नियमित अंतराल पर पानी के टैंकर भेजे जा रहे हैं और स्थिति नियंत्रण में है।

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हाई कोर्ट का सख्त रुख: अधिकारी दफ्तर में बैठकर रिपोर्ट बना रहे हैं

सरकारी वकील के दावों पर कड़ा ऐतराज जताते हुए खंडपीठ ने कहा कि अगर कागजों पर सब ठीक है, तो जमीन पर लोग क्यों मर रहे हैं। अगर सरकार कह रही है कि पानी उपलब्ध कराया जा रहा है, तो फिर ऐसी घटनाएं (मौतें और बीमारियां) क्यों हो रही हैं? आपकी रिपोर्ट झूठी हैं। यह साफ तौर पर दिख रहा है कि अधिकारियों ने यहां अपने दफ्तरों में आराम से बैठकर इन्हें तैयार किया है। जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

“ग्रामीण झूठ क्यों बोलेंगे?”

अदालत ने स्थानीय निवासियों से मिले इनपुट्स का हवाला देते हुए कहा कि गांवों में पानी के टैंकर आठ दिनों में सिर्फ एक बार आ रहे हैं। कोर्ट ने सवाल किया, “अगर उन्हें पानी मिल रहा होता, तो ग्रामीण इस भीषण संकट में झूठ क्यों बोलते?”

अदालत के महत्वपूर्ण निर्देश और सुझाव

हाई कोर्ट ने केवल फटकार नहीं लगाई, बल्कि सरकार को आपूर्ति व्यवस्था को अधिक व्यावहारिक बनाने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश दिए।

कुएं के बजाय घर-घर पहुंचे पानी: कोर्ट ने सरकार से कहा कि वे टैंकरों के पानी को सीधे गांवों के कुओं में खाली (offload) करने के बजाय घर-घर जाकर सीधे (house-to-house) पानी की आपूर्ति करने की नीति पर विचार करें, ताकि पानी बर्बाद न हो और दूषित होने से बचे।

प्रभावित गांवों की सूची मांगी: खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के वकीलों को उन सभी गांवों के नाम लिखित रूप में सौंपने का निर्देश दिया है, जहां हफ्ते में केवल एक बार पानी की सप्लाई हो रही है।

नियमित आपूर्ति का आश्वासन: कोर्ट की सख्ती के बाद सरकारी वकील ने अदालत को आश्वासन दिया कि प्रभावित क्षेत्रों में अब पानी की नियमित और साफ आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।

अदालत ने इस बेहद संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई गुरुवार (25 जून, 2026) के लिए तय की है, जहां सरकार को जमीनी सुधारों और नई कार्ययोजना के साथ जवाब देना होगा।

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Overview)

कानूनी और प्रशासनिक बिंदुबॉम्बे हाई कोर्ट की विधिक कार्यवाही (23 जून, 2026)
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस ए. एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाटा (खंडपीठ)
मुख्य मुद्दाग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों (मेलघाट) में पानी की किल्लत, दूषित पानी से मौतें और कुपोषण।
अदालत की मुख्य टिप्पणीसरकारी रिपोर्टें झूठी और दफ्तरों में बैठकर बनाई गई हैं; जमीनी हकीकत अलग है।
अदालत का व्यावहारिक सुझावटैंकरों का पानी कुओं में डालने के बजाय सीधे घर-घर (House-to-House) सप्लाई किया जाए।
अगली सुनवाईगुरुवार (25 जून, 2026)
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