Online Child Sex: बॉम्बे हाईकोर्ट ने देश में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की कानूनी जिम्मेदारी को लेकर एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक विधिक व्यवस्था दी है।
Online Child Sex को लेकर हाईकोर्ट में चली सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस राज वाकोडे की नागपुर खंडपीठ ने एक ऐसे व्यक्ति को कोई भी विधिक राहत देने से साफ इनकार कर दिया, जिसका इंस्टाग्राम (Instagram) अकाउंट एक नाबालिग को नग्न सामग्री (Nude Content) भेजने के कारण हमेशा के लिए निलंबित (Permanently Suspended) कर दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया है कि इंटरनेट पर बाल यौन शोषण (Online Child Sexual Exploitation) के मामले दिन-ब-दिन बढ़ रहे हैं और यह साइबर अपराध का सबसे गंभीर रूप बनकर उभरा है।
हाई कोर्ट का विधिक सिद्धांत: Online Child Sex में बच्चों की सुरक्षा के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ जरूरी
खंडपीठ ने सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी और बच्चों के अधिकारों के बीच संतुलन पर महत्वपूर्ण विधिक बिंदु रखे।
मेटा (Meta) की ‘जीरो-टॉलरेंस’ नीति पूरी तरह वैध
याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि सोशल मीडिया कंपनी ‘मेटा’ द्वारा बिना कोई चेतावनी दिए सीधे अकाउंट को स्थायी रूप से ब्लॉक कर देना मनमाना और अत्यधिक कठोर कदम है। कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा, मेटा की ‘जीरो-टॉलरेंस’ (शून्य-सहनशीलता) नीति को मनमाना या असंगत नहीं ठहराया जा सकता। बल्कि, यह ऑनलाइन दुर्व्यवहार के सबसे घृणित रूपों में से एक के खिलाफ एक आवश्यक और उचित प्रतिक्रिया है, जो डिजिटल वातावरण में बच्चों की सुरक्षा के सर्वोपरि महत्व को दर्शाती है।
अपरिवर्तनीय शारीरिक और मानसिक नुकसान
अदालत ने ऑनलाइन बाल यौन शोषण के विनाशकारी परिणामों पर गहरी चिंता व्यक्त की। कहा, ऑनलाइन बाल यौन शोषण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यह साइबर-सक्षम अपराधों (Cyber-enabled crimes) के सबसे खतरनाक रूपों में से एक है, जो बच्चों को ऐसा शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक नुकसान पहुंचाता है जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती (Irreversible Harm)।
मामले की पृष्ठभूमि: ‘ग्रिवेंस अपीलीय समिति’ से भी नहीं मिली थी राहत
विवाद का कारण: याचिकाकर्ता का इंस्टाग्राम अकाउंट बाल यौन शोषण, दुर्व्यवहार और नग्नता (Nudity) से जुड़े कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स के बार-बार उल्लंघन के कारण मेटा द्वारा हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।
विधिक मंचों की विफलता: याचिकाकर्ता ने पहले सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत गठित केंद्र सरकार की ग्रिवेंस अपीलीय समिति (Grievance Appellate Committee – GAC) के समक्ष गुहार लगाई थी। वहां से कोई राहत न मिलने पर उसने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिकाकर्ता के वकील का तर्क: अधिवक्ता प्रीति बडवाइक पेंडके ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को अपनी गलती सुधारने का एक भी मौका नहीं दिया गया और सीधे इतनी कठोर विधिक कार्रवाई कर दी गई।
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अदालत का अंतिम निष्कर्ष: Online Child Sex के मामले में एक बार की गलती पर भी सीधा बैन जायज
सबूतों की समीक्षा के बाद, खंडपीठ ने पाया कि इसमें कोई विवाद नहीं है कि याचिकाकर्ता ने जिस यूजर को आपत्तिजनक सामग्री भेजी थी, वह कानूनन एक नाबालिग (Minor) था।
सामान्य नियमों से अलग है यह अपराध: सामान्य नीति उल्लंघनों में जहां चेतावनियां या अस्थायी प्रतिबंध लगाए जाते हैं, वहीं बाल यौन शोषण, दुर्व्यवहार और बाल संकट से जुड़ी सामग्री के मामलों में बिना किसी पूर्व चेतावनी के तत्काल और स्थायी निलंबन पूरी तरह न्यायसंगत है, भले ही ऐसा उल्लंघन केवल एक बार ही क्यों न किया गया हो।
कानूनी कार्रवाई की छूट: कोर्ट ने मेटा की नीति की सराहना करते हुए कहा कि कंपनियों को न केवल ऐसे अकाउंट्स को स्थायी रूप से अक्षम (Disable) करने का अधिकार है, बल्कि कानूनन आवश्यक होने पर इस मामले की रिपोर्ट सक्षम कानून प्रवर्तन एजेंसियों (Cyber Police) को भी करनी चाहिए।
Online Child Sex: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | बॉम्बे उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (जून 2026) |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (नागपुर खंडपीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस राज वाकोडे (खंडपीठ) |
| याचिका का आधार | आईटी नियम, 2021 के तहत GAC के आदेश और मेटा के सस्पेंशन को चुनौती। |
| मुख्य विधिक प्रश्न | क्या बाल यौन शोषण के मामले में बिना चेतावनी अकाउंट को हमेशा के लिए डिलीट करना ‘मनमाना’ कृत्य है? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | बाल सुरक्षा के मामले में कोई शॉर्टकट नहीं; मेटा की त्वरित और स्थायी निलंबन की कार्रवाई कानूनन बिल्कुल सही और वैध है। |
| अदालत का अंतिम आदेश | व्यक्ति की रिट याचिका पूरी तरह खारिज (Dismissed)। |
Online Child Sex केस और भारतीय कानून में दिए गए फैसले
भारत में इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के प्रसार के साथ ही इंटरनेट पर बाल यौन शोषण (Online Child Sexual Abuse) एक बेहद गंभीर और संवेदनशील समस्या बनकर उभरा है। इस विषय पर भारत की वर्तमान स्थिति, कानूनी ढांचा और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले की विस्तृत जानकारी नीचे दी गई है:
भारत में वर्तमान स्थिति (Current Scenario)
भारत में स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट डेटा के आने से डिजिटल साक्षरता तो बढ़ी है, लेकिन इसके साथ ही ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री, जिसे तकनीकी भाषा में CSAM (Child Sexual Abuse Material) या CSEAM कहा जाता है, के प्रसार में भारी उछाल आया है।
डराने वाले आंकड़े: अमेरिका की संस्था ‘नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन’ (NCMEC) की साइबर हेल्पलाइन रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर मिलने वाली कुल रिपोर्ट्स में से एक बड़ा हिस्सा (सालाना लाखों की संख्या में) भारत में मौजूद इंटरनेट प्रोटोकॉल (IP) एड्रेस या अपराधियों से जुड़ा होता है।
अपराध का तरीका: डार्क वेब, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स (जैसे व्हाट्सऐप, टेलीग्राम) और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए इस सामग्री को बनाया, स्टोर और शेयर किया जा रहा है।
मानसिक और सामाजिक प्रभाव: यह केवल एक डिजिटल अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के शब्दों में, जब ऐसी किसी सामग्री को रिकॉर्ड और इंटरनेट पर शेयर किया जाता है, तो पीड़ित बच्चे के लिए वह “ट्रॉमा की एक निरंतर चलने वाली लहर” (Ripple of Trauma) बन जाता है, क्योंकि उसे हमेशा यह डर रहता है कि उसका शोषण कोई भी, कहीं भी देख सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (2024)
23 सितंबर 2024 को देश के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की पीठ ने ‘जस्ट राइट फॉर चिल्ड्रन एलायंस बनाम एस. हरीश’ मामले में एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया।
फैसले की मुख्य बातें: सिर्फ देखना और स्टोर करना भी अपराध: सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि “केवल डाउनलोड करना या देखना अपराध नहीं है, जब तक कि उसे किसी को भेजा न जाए।” सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ऐसी सामग्री को सिर्फ देखना, डाउनलोड करना या फोन/कंप्यूटर में रखना (Possession and Storage) भी पोक्सो (POCSO) एक्ट के तहत दंडनीय अपराध है।
रिपोर्ट न करना ‘गलत इरादा’ माना जाएगा: कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पास ऐसी सामग्री है और वह उसे डिलीट नहीं करता या पुलिस को रिपोर्ट नहीं करता, तो कानूनन यह मान लिया जाएगा कि उसका इरादा (Mens Rea) इसे आगे बढ़ाने का था।
‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ शब्द पर रोक: सुप्रीम कोर्ट ने इस सामग्री के लिए ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ (Child Pornography) शब्द के इस्तेमाल पर सख्त आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि ‘पोर्नोग्राफी’ शब्द से ऐसा लगता है जैसे इसमें सहमति शामिल हो। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इसके स्थान पर “चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेटिव एंड एब्यूज मटेरियल” (CSEAM – बाल यौन शोषणात्मक और दुर्व्यवहार सामग्री) शब्द का इस्तेमाल किया जाए। संसद से भी कानून में यह बदलाव करने को कहा गया है।
सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही: कोर्ट ने साफ किया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (Intermediaries) को ‘Safe Harbour’ (कानूनी सुरक्षा) का लाभ नहीं मिलेगा। अगर उन्हें सरकार या एजेंसी द्वारा ऐसी सामग्री की सूचना दी जाती है, तो उन्हें इसे तुरंत हटाना होगा।
भारत में कानूनी ढांचा (Legal Framework)
भारत में Online Child Sex के शोषण से निपटने के लिए मुख्य रूप से तीन कानूनी हथियार हैं।
| कानून और धारा | प्रावधान और सजा |
| POCSO एक्ट, 2012 (धारा 15) | CSEAM को स्टोर या पज़ेस (कब्जे में) रखने पर पहली बार जुर्माना। यदि इरादा इसे प्रसारित या व्यावसायिक लाभ (Commercial Intent) के लिए इस्तेमाल करने का है, तो 3 से 5 साल तक की जेल और भारी जुर्माना। |
| IT एक्ट, 2000 (धारा 67B) | बच्चों को अश्लील या यौन रूप से स्पष्ट कृत्य में दर्शाने वाली सामग्री को ऑनलाइन पब्लिश, ट्रांसमिट या ब्राउज़ करने पर पहली बार में 5 साल तक की जेल और दूसरी बार में 7 साल तक की जेल। |
| भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 | नई संहिताओं (धारा 294 और 295) के तहत बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से अश्लील सामग्री बेचने, वितरित करने या प्रदर्शित करने को और अधिक कड़ा बनाया गया है। |
सरकार के अन्य प्रयास और कदम
IT नियम 2021: सोशल मीडिया और इंटरनेट कंपनियों के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे स्वचालित टूल्स (Automated Tools) का उपयोग करके अपने प्लेटफॉर्म पर CSEAM की पहचान करें और उसे ब्लॉक करें।
I4C (भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र): गृह मंत्रालय के तहत यह विंग राज्यों की पुलिस के साथ मिलकर इंटरनेट पर ऐसी सामग्री अपलोड करने वालों पर चौबीसों घंटे निगरानी रखती है और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (cybercrime.gov.in) के जरिए शिकायतें दर्ज करती है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले ने कानून के उस लूपहोल (कमजोरी) को बंद कर दिया है जिसका फायदा उठाकर लोग बच जाते थे। अब भारत में डिजिटल माध्यमों पर बच्चों के शोषण से जुड़ी किसी भी सामग्री को देखना या रखना आपको सीधे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा सकता है।

