Duty of Care: कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्कूल बसों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।
छात्रों के प्रति देखभाल का कर्तव्य स्कूल के मुख्य द्वार पर खत्म नहीं हो जाता
हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि स्कूल बस कुछ और नहीं, बल्कि स्कूल का ही एक विस्तार (Extension of the school) है। अदालत ने यह टिप्पणी मांड्या स्थित ‘दिव्यज्योति स्कूल’ प्रबंधन की उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले (FIR) को रद्द करने की मांग की थी। कहा, किसी स्कूल का अपने छात्रों के प्रति देखभाल का कर्तव्य (Duty of Care) स्कूल के मुख्य द्वार पर खत्म नहीं हो जाता, बल्कि वह स्कूल बस में भी तब तक जारी रहता है जब तक कि बच्चे सुरक्षित अपने माता-पिता के पास न पहुंच जाएं।
मामला क्या है?: स्कूल बस में चौथी के छात्र ने गंवाई एक आंख की रोशनी
यह दुखद मामला स्कूल प्रबंधन की लापरवाही और सुरक्षा मानकों की अनदेखी से जुड़ा है।
बस के भीतर हादसा: 1 अगस्त 2025 को दिव्यज्योति स्कूल का कक्षा 4 का एक छात्र स्कूल बस से अपने घर लौट रहा था। सफर के दौरान बस के भीतर कुछ अन्य छात्रों ने रंगीन कंफ़ेटी (रंगीन कागज के टुकड़े/स्पार्कलर) उड़ाए या स्प्रे किए।
40% स्थायी विकलांगता: इस सामग्री के कण बच्चे की आंख में चले गए, जिससे उसकी एक आंख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई। डॉक्टरों ने बाद में बच्चे को पूरे शरीर के स्तर पर 40 प्रतिशत स्थायी विकलांगता (Permanent Disability) से पीड़ित घोषित किया।
माता-पिता की शिकायत और FIR: पीड़ित बच्चे के माता-पिता ने स्कूल प्रबंधन के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। एफआईआर में आरोप लगाया गया कि स्कूल ने बस के भीतर कोई अटेंडेंट (निगरानीकर्ता) तैनात नहीं किया था, बच्चों की देखरेख में लापरवाही बरती और बस का सीसीटीवी (CCTV) कैमरा भी खराब था।
स्कूल प्रबंधन ने इस आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में क्वेशिंग याचिका (Quashing Petition) दायर की थी। स्कूल का तर्क था कि किसी अन्य बच्चे की अचानक की गई हरकत के लिए प्रबंधन को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: सुरक्षा कोई दान या सुविधा नहीं, कानूनी बाध्यता है
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने स्कूल प्रबंधन के ‘पल्ला झाड़ने’ वाले रवैये पर सख्त नाराजगी जताई और कर्नाटक शैक्षिक संस्थान (वर्गीकरण, विनियमन और पाठ्यक्रम निर्धारण आदि) (संशोधन) नियम, 2018 का हवाला देते हुए निम्नलिखित कानूनी सिद्धांत तय किए।
कानूनी अधिदेश (Statutory Mandate): कोर्ट ने कहा कि स्कूल बसों में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बस में शिक्षकों या अटेंडेंट की मौजूदगी अनिवार्य है। स्कूल इस वैधानिक जिम्मेदारी से हाथ नहीं खींच सकते।
लापरवाही के लिए प्रबंधन जिम्मेदार: अदालत ने स्कूल के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि यह किसी दूसरे बच्चे की स्वतंत्र हरकत थी। कोर्ट ने कहा कि यदि प्रबंधन की अपनी लापरवाही (अटेंडेंट न रखना, सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन न करना) के कारण स्थिति बिगड़ी, तो दूसरे बच्चे की संलिप्तता स्कूल को दोषमुक्त नहीं करती।
गहन जांच की जरूरत: हाई कोर्ट ने माना कि यह मामला सीधे तौर पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 125(ए) के तहत ‘मानव जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालने वाले लापरवाहीपूर्ण कार्य’ (जिसके कारण चोट पहुँची हो) के दायरे में आता है। बस में खतरनाक सामग्री कैसे आई, सीसीटीवी क्यों बंद था—इन सब तथ्यों का फैसला केवल पुलिस जांच से ही हो सकता है, इसलिए केस रद्द नहीं किया जा सकता।
केस मैट्रिक्स: कर्नाटक हाई कोर्ट का आदेश (Case Summary)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | कर्नाटक उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (2026) |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय, बेंगलुरु |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एम. नागप्रसन्ना |
| केस संदर्भ | दिव्यज्योति स्कूल मैनेजमेंट बनाम कर्नाटक राज्य (Divyajyothi School Management Vs State of Karnataka) |
| प्रासंगिक कानून | भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 125(ए) और कर्नाटक शैक्षिक संस्थान नियम, 2018 |
| स्कूल के वकील | एडवोकेट नितिन ए.एम. |
| शिकायतकर्ता के वकील | एडवोकेट डी.ए. शिवकुमार |
| अदालत का अंतिम निर्णय | स्कूल प्रबंधन की याचिका खारिज। पुलिस को स्कूल के खिलाफ आपराधिक लापरवाही की जांच जारी रखने का आदेश। |

