मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय न्यायाधीश | न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत (Gujarat High Court) |
| संबंधित कानून | RTI Act 2005; Indian Evidence Act 1872 (Sections 65, 74, 77) |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या RTI से प्राप्त निजी दस्तावेज़ स्वतः ‘पब्लिक डॉक्यूमेंट’ या ‘सर्टिफाइड कॉपी’ बन जाते हैं? |
| अदालत का निर्णय | नहीं। निजी दस्तावेज़ RTI से मिलने पर भी निजी ही रहते हैं; उन्हें साबित करने के लिए द्वितीयक साक्ष्य की कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। |
Public Documents: गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act), 2005 के तहत किसी सरकारी प्राधिकरण/विभाग से प्राप्त निजी दस्तावेज़ (Private Documents) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 74(2) के तहत स्वचालित रूप से ‘सार्वजनिक दस्तावेज़’ (Public Documents) नहीं बन जाते।
न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत (Justice Maulik J. Shelat) की एकल पीठ ने माना कि RTI के तहत जन सूचना अधिकारी (PIO) द्वारा प्रदान की गई निजी दस्तावेजों की ‘सत्य प्रतियों’ (True Copies) को साक्ष्य अधिनियम की धारा 65(e) या 65(f) के तहत ‘प्रमाणित प्रतियां’ (Certified Copies) मानकर सीधे प्रदर्श (Exhibit) के रूप में दर्ज नहीं किया जा सकता, जब तक कि पक्षकार धारा 65(a), (b) या (c) के तहत द्वितीयक साक्ष्य (Secondary Evidence) पेश करने का कानूनी आधार तैयार न करे।
Public Documents: अदालत के मुख्य कानूनी सिद्धांत और व्याख्या
- सार्वजनिक कार्यालय में रखे निजी दस्तावेज़ का दर्जा:“सार्वजनिक कार्यालय में केवल रखा गया या उपलब्ध कराया गया कोई निजी दस्तावेज़ स्वतः सार्वजनिक दस्तावेज़ नहीं बन जाता। किसी निजी दस्तावेज़ का सार्वजनिक रिकॉर्ड रखा जाना सार्वजनिक दस्तावेज़ हो सकता है, लेकिन वह मूल निजी दस्तावेज़ अपने आप में सार्वजनिक नहीं होता।”
- RTI द्वारा प्राप्त प्रतियों पर रुख:
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि PIO द्वारा प्रमाणित फोटोकॉपी केवल संबंधित विभाग के पास मौजूद निजी दस्तावेज़ों की ‘ट्रू कॉपी’ (सत्य प्रति) होती हैं, साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के तहत ‘सर्टिफाइड कॉपी’ नहीं।
- यदि मूल दस्तावेज़ निजी है, तो RTI के जरिए कॉपी मिलने मात्र से उसका ‘निजी स्वरूप’ खत्म नहीं होता।
- द्वितीयक साक्ष्य (Secondary Evidence) की शर्त:
- पक्षकार को अदालत में यह साबित करना होगा कि मूल दस्तावेज़ (Original Document) क्यों उपलब्ध नहीं है। प्राथमिक साक्ष्य की अनुपलब्धता का आधार (Foundation) तय करने के बाद ही RTI के तहत मिले ऐसे दस्तावेज़ों को द्वितीयक साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
Public Documents: मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- विवाद की उत्पत्ति: सूरत के सीनियर सिविल जज के समक्ष विभाजन, भरण-पोषण और स्थायी निषेधाज्ञा (Injunction) का एक सिविल मुकदमा दायर किया गया था।
- निचली अदालत का आदेश: वादियों ने सूरत नगर निगम (SMC) से RTI के तहत प्राप्त 3 दस्तावेज़—दो बंगलों के आर्किटेक्ट द्वारा जारी कंप्लीशन सर्टिफिकेट और एक पारिवारिक विभाजन समझौता (Family Partition Agreement)—अदालत के समक्ष रखे। ट्रॉयल कोर्ट ने केवल इस आधार पर उन्हें प्रदर्श (Exhibit Number) दे दिया कि वे RTI के तहत मिले हैं और सार्वजनिक दस्तावेज़ हैं।
- प्रतिवादियों की चुनौती: प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि ये निजी दस्तावेज़ हैं और फर्जी हस्ताक्षर/मुहर से बने हो सकते हैं। (यहां तक कि एक आपराधिक शिकायत में कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने माना था कि पारिवारिक विभाजन समझौते पर उनकी मुहर या हस्ताक्षर नहीं थे)।
- हाई कोर्ट का रुख: गुजरात हाई कोर्ट ने ट्रॉयल कोर्ट के फैसले को कानूनी रूप से गलत माना और कहा कि ट्रॉयल कोर्ट ने प्रतिवादियों की आपत्तियों को खारिज कर बिना किसी ठोस कानूनी आधार के इन्हें सार्वजनिक दस्तावेज़ मान लिया।
Public Documents: उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश
- आदेश रद्द: गुजरात हाई कोर्ट ने तीनों विवादित दस्तावेजों को दिए गए ‘एग्जीबिट’ (Exhibit) नंबर निरस्त करने (De-exhibit) का आदेश दिया।
- साक्ष्य का अवसर: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वादी कानून के अनुसार (धारा 65 के तहत) मूल दस्तावेज़ न होने का कारण बताते हुए आधार पेश करते हैं और दस्तावेज़ों को साबित करते हैं, तो ट्रॉयल कोर्ट उन्हें दोबारा द्वितीयक साक्ष्य के रूप में प्रदर्शित कर सकता है।
- मुकदमे में तेजी: निचली अदालत को सिविल सूट की सुनवाई जल्द से जल्द पूरी करने का निर्देश दिया गया।

