False Identity: मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति माइकल जोथानखुमा एवं न्यायमूर्ति संजीव कुमार शर्मा (Gauhati High Court) |
| मुख्य अभियुक्त | जहानुद्दीन शेख (उर्फ राजू दास) और सलमा बेगम |
| संबंधित कानून | IPC (Sec 366, 370, 372), POCSO Act, Immoral Traffic (Prevention) Act, Evidence Act (Sec 79) |
| अदालत का निर्णय | अपील खारिज; दोनों दोषियों की 20 साल की कठोर कारावास की सजा बरकरार। |
False Identity: गुवाहाटी हाईकोर्ट (Gauhati High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में माना है कि किसी नाबालिग लड़की को अपनी झूठी पहचान (False Identity) बताकर और शादी/प्यार का झांसा देकर भगा ले जाना और फिर उसे वैश्यालय (Brothel) में बेच देना, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 के तहत वैश्यावृत्ति के लिए मजबूर करने के आपराधिक और धोखेबाज़ इरादे को पूरी तरह साबित करता है।
इसके अलावा, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत जारी किया गया जन्म प्रमाण पत्र साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 79 के तहत प्रामाणिक माना जाएगा और POCSO Act / JJ Act की धारा 94 के तहत पीड़िता की नाबालिग उम्र साबित करने के लिए ठोस सबूत (Substantive Proof) माना जाएगा।
न्यायमूर्ति माइकल जोथानखुमा (Justice Michael Zothankhuma) और न्यायमूर्ति संजीव कुमार शर्मा (Justice Sanjeev Kumar Sharma) की खंडपीठ ने दोनों दोषियों—जहानुद्दीन शेख (जिसने “राजू दास” बनकर हिंदू नाम का इस्तेमाल किया) और सलमा बेगम (सिलीगुड़ी में वैश्यालय चलाने वाली)—की अपीलों को खारिज करते हुए कोकराझार की विशेष POCSO अदालत द्वारा दी गई 20 साल के कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) की सजा को बरकरार रखा।
False Identity: उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- धोखाधड़ी और आपराधिक इरादा (Section 366 IPC):“जहानुद्दीन द्वारा खुद को ‘राजू दास’ (हिंदू लड़का) बताकर झूठी पहचान अपनाना और शादी का झांसा देकर भगाना यह स्पष्ट करता है कि उसके मन में कोई वास्तविक प्रेम नहीं था। नाबालिग को झूठे वादे से बहला-फुसलाकर भगाना और फिर वैश्यालय में बेचना IPC की धारा 366 और POCSO एक्ट की धारा 6/17 (उकसाना/मदद करना) के तहत उसके अवैध इरादे को पूरी तरह साबित करता है।”
- जन्म प्रमाण पत्र की वैधता (Admissibility of Birth Certificate):
- कोर्ट ने सैफुल इस्लाम बनाम असम राज्य (2023) का हवाला देते हुए माना कि 1969 के अधिनियम (Registration of Births and Deaths Act) के तहत जारी प्रमाण पत्र साक्ष्य अधिनियम की धारा 79 के तहत सही माना जाता है। यह JJ Act की धारा 94 के तहत उम्र निर्धारण के लिए प्राथमिक और पर्याप्त साक्ष्य है।
- चोट के निशान न होने पर रुख:
- पीठ ने स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराया कि पीड़िता के शरीर पर दृश्यमान चोट के निशान न होना यौन उत्पीड़न या बलात्कार के दावे को खारिज नहीं करता, खासकर तब जब चिकित्सा साक्ष्य (Medical Evidence) बार-बार हुए पैनेट्रेटिव सेक्स की पुष्टि करते हों।
False Identity: मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- घटना और प्राथमिकी: मामला 31 जुलाई 2020 को असम के सेरफांगुरी पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR से जुड़ा है।
- अपराध का तरीका: आरोपी जहानुद्दीन शेख ने खुद को “राजू दास” बताकर नाबालिग पीड़िता को कोर्ट मैरिज का झांसा दिया। वह उसे पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी ले गया और वहां खालपाड़ा रेड-लाइट इलाके में सलमा बेगम के हाथों ₹500 व अन्य लाभ के बदले बेच दिया।
- रेस्क्यू: पीड़िता को जबरन वैश्यावृत्ति में धकेला गया और कई ग्राहकों द्वारा उसका यौन शोषण किया गया। 4 अगस्त 2020 को पुलिस की संयुक्त टीम ने उसे बचाया।
- निचली अदालत की सजा: कोकराझार की स्पेशल POCSO कोर्ट ने जहानुद्दीन को IPC की धारा 366, 370, 370(A), 372, 419 और POCSO एक्ट की धारा 6/17 के तहत; और सलमा बेगम को मानव तस्करी व अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम (ITPA) के तहत दोषी ठहराते हुए 20 साल जेल की अधिकतम सजा सुनाई थी।
False Identity: अंतिम निर्णय
गुवाहाटी हाई कोर्ट ने माना कि मानव तस्करी और नाबालिग के इस गंभीर यौन शोषण के मामले में दोनों अभियुक्तों की संलिप्तता पूरी तरह साबित होती है। निचली अदालत द्वारा दी गई 20-20 साल की सजा और जुर्माने के फैसले को पूर्णतः सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी गई।

