GST Statutes: माल और सेवा कर (GST) के विधिक ढांचे और सरकारी ठेकों के अंतर्संबंधों को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है।
जीएसटी रिकवरी और जुर्माने के मामले में सुनवाई
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और जस्टिस के.एस. हेमालेखा की खंडपीठ (Division Bench) ने राज्य सरकार और कर अधिकारियों द्वारा दायर अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए एकल पीठ (Single Judge) के उस पुराने आदेश को संशोधित (Modify) कर दिया है, जिसमें ठेकेदारों को जीएसटी रिकवरी और जुर्माने से बड़ी राहत दी गई थी।
यह रही अदालत की टिप्पणी
अदालत ने कहा, जीएसटी (GST) लागू होने के बाद कर के अतिरिक्त बोझ की प्रतिपूर्ति (Reimbursement) का विवाद पूरी तरह से ठेकेदार और संबंधित सरकारी विभाग के बीच का एक संविदात्मक (Contractual) मामला है। कोई भी संविदात्मक व्यवस्था या अदालती आदेश, जीएसटी कानून के तहत तय टैक्स लायबिलिटी, रिटर्न दाखिल करने की समयसीमा, ब्याज या जुर्माने के वैधानिक नियमों को न तो बदल सकता है और न ही उन्हें माफ कर सकता है।
मामला क्या है?: वैट (VAT) से जीएसटी (GST) के बदलाव का कानूनी फेर
यह पूरा विवाद देश में वैट (VAT) प्रणाली से जीएसटी (GST) व्यवस्था में हुए ऐतिहासिक बदलाव के दौर से जुड़ा है।
ठेकेदारों का दावा: कई ठेकेदारों ने जीएसटी लागू होने से ठीक पहले पुरानी ‘शेड्यूल ऑफ रेट्स’ (Pre-GST Rates) के आधार पर सार्वजनिक निर्माण (Public Works) के सरकारी ठेके लिए थे। नई व्यवस्था आने के बाद उन्हें अपनी जेब से भारी-भरकम जीएसटी चुकाना पड़ा, जिसकी प्रतिपूर्ति सरकारी विभागों (Employers) ने नहीं की। इसके खिलाफ ठेकेदारों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
एकल पीठ की व्यापक राहत: इससे पहले एक एकल न्यायाधीश ने ठेकेदारों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को प्रतिपूर्ति का आदेश तो दिया ही, साथ ही [श्री चंद्रशेखरैया बनाम कर्नाटक राज्य] मामले की नजीर पर चलते हुए ठेकेदारों को संशोधित जीएसटी रिटर्न (Revised Returns) दाखिल करने की अनुमति दे दी, समयसीमा (Limitation Period) में ढील दी और जीएसटी विभाग द्वारा लगाए जाने वाले ब्याज व जुर्माने से भी सुरक्षा प्रदान कर दी। इस व्यापक राहत के खिलाफ टैक्स अथॉरिटी और राज्य सरकार ने खंडपीठ में अपील दायर की।
हाई कोर्ट का रुख: अदालतें नहीं बदल सकतीं टैक्स कानून
कर्नाटक हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि टैक्स वसूलना राज्य का वैधानिक अधिकार है और इसमें किसी भी तरह की ढील केवल कानून के दायरे में ही दी जा सकती है। कोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष इस प्रकार हैं।
संविदा (Contract) बनाम वैधानिक कानून (Statute)
खंडपीठ ने साफ लकीर खींचते हुए कहा कि जीएसटी की अतिरिक्त राशि कौन भरेगा—यह ठेकेदार और काम देने वाले सरकारी विभाग के बीच का आपसी कॉन्ट्रैक्ट का मामला है। कोई भी कॉन्ट्रैक्ट, देश के वैधानिक टैक्स कानूनों (GST Statutes) के ऊपर नहीं हो सकता।
ब्याज और जुर्माना माफ करने की शक्ति नहीं
अदालत ने माना कि एकल न्यायाधीश का वह आदेश पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण था जो जीएसटी अधिकारियों को संशोधित रिटर्न स्वीकार करने या वैधानिक ब्याज और जुर्माने को माफ करने का निर्देश देता था। अदालतें ऐसा कोई आदेश जारी नहीं कर सकतीं जो सीधे तौर पर जीएसटी अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों के विपरीत (Contrary) जाता हो।
टैक्स अथॉरिटी बनाम एम्प्लॉयर विभाग
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि ठेकेदार को कोई राहत मिलनी भी है, तो वह केवल संबंधित सरकारी विभाग (जैसे- पीडब्ल्यूडी या अन्य एम्प्लॉयर) के खिलाफ ही लागू होगी, न कि टैक्स वसूलने वाले जीएसटी विभाग (Tax Authorities) के खिलाफ।
एसकेएस कारकला इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स की अलग अपील भी खारिज
इसी से जुड़े एक अन्य मामले में, कोर्ट ने SKS Karkala Infra Projects Pvt. Ltd. की उस अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने ‘दावणगेरे स्मार्ट सिटी लिमिटेड’ से जीएसटी भुगतान की मांग की थी।
अदालत का तर्क: इस मामले में अनुबंध (Contract) जीएसटी लागू होने के बाद हुआ था और उसमें स्पष्ट लिखा था कि ठेकेदार द्वारा दी गई दरें (Quoted Rates) सभी टैक्सों सहित (Inclusive of Taxes) हैं। कोर्ट ने कहा कि इसमें कई तथ्य विवादित हैं (जैसे- क्या वास्तव में ठेकेदार ने जीएसटी भरा, या क्या दरों में पहले से टैक्स शामिल था)। ऐसे विवादित तथ्यों की जांच रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) में नहीं की जा सकती, इसलिए ठेकेदार को उचित दीवानी मंच (Civil Forum) पर जाना होगा।
केस मैट्रिक्स: कर्नाटक हाई कोर्ट का आदेश (जून 2026)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | कर्नाटक उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय, बेंगलुरु |
| माननीय न्यायाधीश | मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और जस्टिस के.एस. हेमालेखा (खंडपीठ) |
| संबद्ध पक्ष | कर्नाटक राज्य और टैक्स अथॉरिटी बनाम सुधन्वा इंजीनियर्स व अन्य |
| मूल विधिक टकराव | क्या अदालती आदेश से जीएसटी की समयसीमा, ब्याज और जुर्माने को बदला या माफ किया जा सकता है? |
| स्टेट के वकील | एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट आदित्य विक्रम भट |
| ठेकेदारों के वकील | सीनियर एडवोकेट एस.एस. नागानंद |
| अदालत का अंतिम निर्णय | सरकारी अपीलों को आंशिक मंजूरी; टैक्स नियमों को शिथिल करने वाला एकल पीठ का आदेश रद्द। प्रतिपूर्ति का दावा केवल एम्प्लॉयर विभाग तक सीमित। |

