Digital Footprints: मद्रास हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर महिलाओं के खिलाफ बढ़ते साइबर अपराधों पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए ऐतिहासिक टिप्पणी की है।
रमेश कुमार बनाम पुलिस अधीक्षक केस की सुनवाई
हाईकोर्ट जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी की मदुरै खंडपीठ ने रमेश कुमार बनाम पुलिस अधीक्षक (SP) मामले की सुनवाई में कहा, किसी महिला की मॉर्फ्ड (फर्जी/छेड़छाड़ की गई) अश्लील तस्वीरें बनाना कोई मासूम डिजिटल मज़ाक नहीं है। यह उसकी निजता, प्रतिष्ठा और गरिमा पर किया गया एक सोचा-समझा हमला है। कानून को भी उतनी ही गति से काम करना चाहिए, जिस गति से यह अवैध सामग्री इंटरनेट पर फैलती है। अदालत ने डिंडिगुल पुलिस को सिंगापुर में काम कर रही एक भारतीय महिला की मॉर्फ्ड अश्लील तस्वीरों और वीडियो को इंस्टाग्राम पर प्रसारित करने की शिकायत पर तुरंत और कड़ी कार्रवाई करने का आदेश दिया।
मामला क्या है?: सिंगापुर में कार्यरत महिला को ब्लैकमेल करने की साजिश
यह मामला एक भारतीय महिला की सुरक्षा और डिजिटल सम्मान से जुड़ा है, जो वर्तमान में सिंगापुर में एक हाउसकीपर (Housekeeper) के रूप में कार्यरत है।
फर्जी प्रोफाइल और अश्लीलता: महिला के भाई (याचिकाकर्ता) ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी कि उसकी बहन के नाम से एक फर्जी इंस्टाग्राम अकाउंट बनाया गया है। इस अकाउंट और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उसकी बहन की मॉर्फ्ड, नग्न और अश्लील तस्वीरें और वीडियो धड़ल्ले से शेयर किए जा रहे हैं।
पैसे की मांग (Extortion): याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि ‘मणिकंदन’ नाम के एक व्यक्ति ने इन तस्वीरों और वीडियो को डिलीट करने के बदले पैसों की मांग की। जब परिवार ने पैसे देने से इनकार कर दिया, तो आरोपी ने उन अश्लील सामग्रियों को और अधिक प्रसारित करना शुरू कर दिया।
पुलिस की सुस्ती: स्थानीय पुलिस द्वारा शिकायत पर प्रभावी कार्रवाई न करने के बाद पीड़ित महिला के भाई ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: डिजिटल साक्ष्य नाजुक होते हैं, देरी न्याय की हत्या है
जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने इस मामले को केवल एक पारिवारिक विवाद या सोशल मीडिया की गलतफहमी मानने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों (Law Enforcement Agencies) के लिए महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत तय किए:
अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: अदालत ने कहा कि ऑनलाइन यौन उत्पीड़न, फर्जी प्रोफाइल बनाना और तस्वीरें हटाने के लिए जबरन वसूली करना सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत प्राप्त शारीरिक गोपनीयता (Bodily Privacy), निर्णय लेने की गरिमा और सुरक्षा के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।
साइबर अपराधों में समय का महत्व: हाई कोर्ट ने डिजिटल साक्ष्यों की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए कहा, साइबर अपराधों में देरी अक्सर सबूतों के लिए घातक साबित होती है। डिजिटल पदचिह्न (Digital Footprints) बेहद नाजुक होते हैं। यूआरएल (URLs) गायब हो सकते हैं, अकाउंट डिलीट किए जा सकते हैं और आईपी लॉग्स (IP logs) ओवरराइट हो सकते हैं। इसलिए, डिजिटल साक्ष्यों का तत्काल संरक्षण केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मूल न्याय (Substantive Justice) है।
विदेश में होने पर भी पुलिस की जिम्मेदारी: कोर्ट ने साफ किया कि पीड़िता का भारत से बाहर (सिंगापुर में) होना पुलिस को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। चूंकि शिकायतकर्ता, उसका परिवार, आरोपी और धमकी भरे फोन कॉल जैसी पूरी कानूनी वजह (Cause of Action) भारतीय पुलिस के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) से जुड़ी है, इसलिए कार्रवाई अनिवार्य है।
पुलिस को हाई कोर्ट के तत्काल और विस्तृत निर्देश
हाई कोर्ट ने डिंडिगुल ग्रामीण के पुलिस उपाधीक्षक (DSP) और जिला पुलिस अधीक्षक (SP) को इस मामले में तुरंत निम्नलिखित कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
तत्काल एफआईआर: यदि 20 मार्च 2026 की शिकायत में कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) प्रकट होता है, तो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) और भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की उचित धाराओं के तहत तुरंत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाए।
साक्ष्यों का संरक्षण: पुलिस तुरंत संबंधित स्क्रीनशॉट, यूआरएल, प्रोफाइल लिंक, अकाउंट के नाम, फोन नंबर, कॉल विवरण (CDR) और जबरन वसूली के संदेशों को सुरक्षित करे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से आईपी लॉग और सब्सक्राइबर जानकारी (IP Logs & Subscriber Info) तुरंत मांगी जाए।
सामग्री को ब्लॉक करना: इंटरनेट पर मौजूद सभी मॉर्फ्ड और आपत्तिजनक सामग्री को सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से तुरंत हटाने या ब्लॉक (Remove/Block) करने के कदम उठाए जाएं।
केस मैट्रिक्स: मद्रास हाई कोर्ट का आदेश (Case Summary)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | मद्रास उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (२०२६) |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै खंडपीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी (एकल पीठ) |
| याचिकाकर्ता के वकील | एडवोकेट पी. मणिकंदन |
| मुख्य आरोपी | मणिकंदन (जिस पर जबरन वसूली का आरोप है) |
| प्रासंगिक कानून | सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act), 2000 और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 |
| अदालत का अंतिम आदेश | पुलिस को तुरंत एफआईआर दर्ज करने, डिजिटल सबूतों को फ्रीज करने और अश्लील कंटेंट को ब्लॉक करने का सख्त निर्देश। |

