Sunday, October 4, 2026
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Valid Marriage: दूल्हे की उम्र 21 साल से कम होने के बावजूद नवविवाहित जोड़े को दी सुरक्षा; क्यों कहा-दोनों बालिग हैं और साथ खुश हैं, पढ़िए केस

Valid Marriage: विवाह के लिए तय कानूनी उम्र से जुड़े एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सुरक्षात्मक फैसला सुनाया है।

प्रेमी जोड़े की रिट याचिका पर सुनवाई

हाईकोर्ट जस्टिस आलोक महरा की एकल पीठ ने एक प्रेमी जोड़े की रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित थाना प्रभारी (SHO) को निर्देश दिया है कि वे जोड़े के जीवन पर मंडरा रहे खतरे का आकलन करें और उन्हें पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करें। अदालत ने कहा, यदि कोई युवती अपने माता-पिता के पास वापस नहीं जाना चाहती और अपने साथी के साथ खुश है, तो केवल इस तकनीकी आधार पर उन्हें सुरक्षा देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि विवाह के समय दूल्हे की उम्र 21 वर्ष पूरी नहीं हुई थी। चूंकि दोनों याचिकाकर्ता कानूनी रूप से बालिग (Major) हैं, इसलिए उनके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना अदालत का संवैधानिक कर्तव्य है।

मामला क्या है?: 20 साल के दूल्हे और 19 साल की दुल्हन का विवाह

यह कानूनी विवाद दो बालिगों के प्रेम विवाह और लड़की के परिवार वालों द्वारा दी जा रही धमकियों से जुड़ा है।

आयु का विवरण: याचिकाकर्ताओं (जोड़े) के अनुसार, उन्होंने 24 मार्च 2026 को आपसी सहमति से विवाह कर लिया था। मैट्रिक सर्टिफिकेट के मुताबिक, विवाह के समय दुल्हन (याचिकाकर्ता संख्या 1) की उम्र 19 वर्ष 6 महीने थी, जबकि दूल्हे (याचिकाकर्ता संख्या 2) की उम्र 20 वर्ष थी।

जान का खतरा और काउंसलिंग: चूंकि लड़की के परिवार वाले इस शादी के सख्त खिलाफ थे, इसलिए दोनों को जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं। इससे पहले हाई कोर्ट की एक समन्वय पीठ (Coordinate Bench) ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए दोनों पक्षों को एक काउंसलर (परामर्शदाता) के सामने पेश होने का निर्देश दिया था। काउंसलर की रिपोर्ट में साफ कहा गया कि लड़की अपने माता-पिता के घर जाने को बिल्कुल तैयार नहीं है और वह अपने पति के साथ बेहद खुश है।

लड़की के परिवार की विधिक दलील: लड़की के परिजनों (निजी प्रतिवादियों) ने कोर्ट में मुख्य दलील यह दी कि चूंकि हिंदू विवाह अधिनियम या देश के विवाह कानूनों के तहत लड़के की कानूनी उम्र 21 वर्ष होनी चाहिए, और यहाँ दूल्हा केवल 20 वर्ष का है, इसलिए यह विवाह कानूनी रूप से वैध (Valid Marriage) नहीं है। अतः इन्हें सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए।

जोड़े का पलटवार: जोड़े के वकील ने तर्क दिया कि दूल्हे की उम्र 21 साल से कम होने के बावजूद यह विवाह कानूनन शून्य (Void) नहीं है, बल्कि अत्यधिक स्थिति में इसे केवल ‘शून्यकरणीय’ (Voidable – जिसे चुनौती दिए जाने पर रद्द किया जा सके) माना जा सकता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उनसे जीवित रहने का अधिकार छीन लिया जाए।

हाई कोर्ट का रुख: ‘लता सिंह’ (2006) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला

जस्टिस आलोक महरा ने लड़की के परिवार की दलीलों को दरकिनार करते हुए स्पष्ट किया कि अदालत यहाँ विवाह की विधिक प्रामाणिकता (Validity of Marriage) को तय करने के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन के अधिकार की रक्षा के लिए बैठी है। कोर्ट के मुख्य विधिक बिंदु इस प्रकार हैं:

दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं

अदालत ने नोट किया कि लड़का (20 वर्ष) और लड़की (19.5 वर्ष) दोनों ही कानून की नजर में बालिग (Major) हैं। भारत का कानून हर बालिग व्यक्ति को अपनी मर्जी से जीने और अपना जीवनसाथी चुनने या किसी के भी साथ रहने की आजादी देता है।

सुप्रीम कोर्ट की नजीर का पालन

हाई कोर्ट ने उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले [लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006)] का हवाला दिया। इस नजीर के तहत सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि यदि दो बालिग अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं या शादी कर रहे हैं, तो समाज या परिवार के लोग उन्हें प्रताड़ित या हिंसा की धमकी नहीं दे सकते। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं का मामला सुरक्षा पाने का एक पुख्ता आधार बनाता है।

अदालत का अंतिम आदेश: पुलिस को खतरे का आकलन करने का निर्देश

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने याचिका को स्वीकार करते हुए निम्नलिखित कड़े निर्देश जारी किए हैं।

तत्काल सुरक्षा: संबंधित पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी (SHO) को आदेश दिया गया है कि वे तुरंत जोड़े के जीवन और अंगों (Life and Limb) को निजी प्रतिवादियों से होने वाले खतरे का वास्तविक आकलन (Threat Assessment) करें और खतरा पाए जाने पर उन्हें आवश्यक पुलिस सुरक्षा मुहैया कराएं।

परिजनों की काउंसलिंग: कोर्ट ने पुलिस को यह भी निर्देश दिया कि वे लड़की के माता-पिता, परिजनों और इस शादी के खिलाफ खड़े अन्य लोगों को थाने बुलाकर कानून के दायरे में उनकी सख्त विधिक काउंसलिंग (Counseling) करें, ताकि वे जोड़े को परेशान न करें।

केस मैट्रिक्स: उत्तराखंड हाई कोर्ट का आदेश (जुलाई 2026)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांउत्तराखंड उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति
संबंधित अदालतउत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court), नैनीताल
माननीय न्यायाधीशजस्टिस आलोक महरा (एकल पीठ)
ऐतिहासिक विधिक नजीरलता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Supreme Court – 2006)
विवाह की तिथि24 मार्च 2026
याचिकाकर्ताओं की आयुदुल्हन: 19 वर्ष 6 महीने
विपक्ष की मुख्य आपत्तिविवाह के समय दूल्हे की आयु 21 वर्ष से कम थी, इसलिए शादी अवैध है।
अदालत का अंतिम निर्देशयाचिका मंजूर; पुलिस को जोड़े को सुरक्षा देने और लड़की के परिजनों की कानूनी काउंसलिंग करने का आदेश।
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