Social Stigma: दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationships) या विवाह से इतर बने संबंधों से पैदा हुए बच्चों के कानूनी और मानवीय अधिकारों को लेकर बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
सच्चाई के खिलाफ प्रतिष्ठा को ढाल नहीं बनाया जा सकता: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने एक पारिवारिक अदालत (Family Court) के उस आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है, जिसमें तीन बच्चों के पितृत्व (Paternity) का पता लगाने के लिए एक व्यक्ति के डीएनए (DNA) टेस्ट का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा, किसी वयस्क (Adult) को समाज में बदनामी या अपनी प्रतिष्ठा (Reputation) खराब होने का डर हो सकता है, लेकिन उसकी यह चिंता किसी बच्चे के अपने जैविक माता-पिता (Biological Parents) को जानने के मौलिक अधिकार से बड़ी नहीं हो सकती। सच्चाई के खिलाफ प्रतिष्ठा को ढाल नहीं बनाया जा सकता और वयस्कों के आपसी फैसलों की बलि मासूम बच्चों को नहीं चढ़ाया जा सकता। बच्चों के अधिकार और उनके हित, बड़ों की सामाजिक प्रतिष्ठा या सामाजिक कलंक (Social Stigma) के विचारों के अधीन नहीं हो सकते।
मामला क्या है?: ‘वैध शादी’ की आड़ में बच्चों से पल्ला झाड़ने की कोशिश
यह कानूनी लड़ाई एक महिला और उसके तीन बच्चों द्वारा दायर किए गए गुजारा भत्ता (Maintenance) के मुकदमे से जुड़ी है।
महिला का दावा: पीड़िता का कहना था कि वह याचिकाकर्ता (पुरुष) के साथ लंबे समय तक वैवाहिक स्वरूप के रिश्ते (Relationship akin to marriage) में रही थी। इस जुड़ाव के परिणामस्वरूप उनके तीन बच्चों का जन्म हुआ। बच्चों ने अपने कानूनी अधिकारों और भरण-पोषण के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
पुरुष का इनकार: दूसरी ओर, पुरुष ने महिला और बच्चों के साथ किसी भी तरह के संबंध होने से पूरी तरह इनकार कर दिया। उसने दलील दी कि वह साल 1986 से एक वैध वैवाहिक जीवन (Valid subsisting marriage) में है और यह महिला केवल उसकी सामाजिक और पारिवारिक छवि को खराब करने के लिए झूठे आरोप लगा रही है।
पुख्ता सबूत: महिला और बच्चों ने अदालत के सामने पारिवारिक तस्वीरें, स्कूल के दस्तावेज, वोटर आईडी, राशन कार्ड और गवाहों के बयान पेश किए, जिनमें याचिकाकर्ता को बच्चों के पिता के रूप में दर्शाया गया था। इस प्रथम दृष्टया (Prima Facie) सबूत के आधार पर फैमिली कोर्ट ने DNA टेस्ट का आदेश दिया था, जिसे पुरुष ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: अपने फैसलों का बोझ बच्चों पर मत डालो
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने पुरुष की याचिका को खारिज करते हुए वयस्कों की जवाबदेही और बच्चों के अधिकारों पर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
बच्चे परिस्थितियों के लेखक नहीं हैं (Children are not authors of their birth)
अदालत ने कहा कि इस कथित संबंध से पैदा हुए बच्चे पूरी तरह से निर्दोष हैं। उनका इस बात पर कोई नियंत्रण नहीं था कि वे किन परिस्थितियों में या किस रिश्ते से इस दुनिया में आ रहे हैं। वे दो वयस्कों के बीच के फैसलों या उनके बीच हुए घटनाक्रमों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।
जवाबदेही से भाग नहीं सकते नागरिक
अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून किसी भी नागरिक को एक तरफ अपने ‘निजी स्वतंत्रता के अधिकार’ (Right to Personal Liberty) का दावा करने और दूसरी तरफ अपनी जिम्मेदारी व जवाबदेही (Accountability) से मुकर जाने की इजाजत नहीं दे सकता। यदि दो वयस्कों ने एक साथ रहने का फैसला किया था, तो उसके परिणामों को भी उन्हीं को भुगतना होगा, न कि बच्चों पर बोझ डाला जाएगा। जब दो वयस्क आपसी सहमति से एक रिश्ता बनाने का फैसला करते हैं और उससे बच्चे पैदा होते हैं, तो उन वयस्कों के बाद के फैसले बच्चों के अपने जैविक माता-पिता को जानने के अधिकार को खत्म या धुंधला नहीं कर सकते। अगर इसके विपरीत विचार अपनाया गया, तो समाज में ऐसी स्थिति पैदा हो जाएगी जहां कोई भी पुरुष या महिला, वैध विवाह से बाहर या लिव-इन में रहकर बच्चों को दुनिया में लाएंगे और बाद में पितृत्व से इनकार कर बच्चों को पूरी जिंदगी पहचान और वंश के अंधेरे में छोड़ देंगे।
गरिमा और पहचान से जुड़ा है डीएनए टेस्ट
दिल्ली हाई कोर्ट ने रेखांकित किया कि किसी बच्चे का यह जानना कि उसके जैविक माता-पिता कौन हैं, सीधे तौर पर उस बच्चे की पहचान (Identity) और गरिमा (Dignity) से जुड़ा है। इसके अलावा, इसी पहचान के आधार पर उनके भरण-पोषण (Maintenance) और संपत्ति पर भविष्य के कानूनी अधिकार तय होते हैं। अदालत ने साफ किया कि जब पितृत्व को लेकर कोई गंभीर और वास्तविक विवाद खड़ा होता है और रिकॉर्ड पर पर्याप्त सामग्री मौजूद हो, तो केवल इसलिए वैज्ञानिक जांच (DNA Test) को नहीं रोका जा सकता कि वयस्कों का वह रिश्ता कानून की नजर में एक वैध विवाह नहीं था।
अदालत का अंतिम निर्णय
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालत के सामने मुख्य मुद्दा वयस्कों के रिश्ते की वैधता या नैतिकता (Morality) की जांच करना नहीं है, बल्कि यह तय करना है कि क्या याचिकाकर्ता ही उन बच्चों का जैविक पिता है। चूंकि बच्चों का पहचान का अधिकार किसी वयस्क के सामाजिक संकोच या लोक-लाज के डर से कहीं ऊपर है, इसलिए डीएनए टेस्ट का आदेश पूरी तरह सही है। हाई कोर्ट ने पुरुष की चुनौती याचिका को खारिज कर दिया।
केस शीट: दिल्ली उच्च न्यायालय निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निष्कर्ष |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा (एकल पीठ) |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | सामाजिक बदनामी के डर बनाम बच्चे का अपनी पहचान जानने का अधिकार |
| अदालत का प्राथमिक साक्ष्य | स्कूल रिकॉर्ड, राशन कार्ड और सामाजिक पहचान (जिसमें पुरुष का नाम था) |
| वैज्ञानिक परीक्षण | डीएनए (DNA) पैतृत्व परीक्षण के आदेश को दी गई मंजूरी। |
| अंतिम निर्णय | याचिका खारिज; फैमिली कोर्ट का DNA टेस्ट का आदेश बरकरार। |

