यह है खबर के मुख्य बिंदु
इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका, ताजमहल के निरीक्षण-फोटोग्राफी के लिए एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति की मांग
दावा: ताजमहल पहले ‘तेजो महालय’ नामक भगवान शिव का मंदिर था, बाद में उसे मकबरे में बदला गया
कोर्ट ने केंद्र सरकार और एएसआई से काउंटर-अफिडेविट दाखिल करने को कहा
Tejo Mahalaya’ Temple Petition: ताजमहल की उत्पत्ति पर चल रहे विवाद के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से जवाब तलब किया।
ताजमहल का सर्वे, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराने की मांग
दरअसल, हाईकोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई है कि लंबित दीवानी वाद के सिलसिले में ताजमहल का सर्वे, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराने के लिए एक एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया जाए। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ताजमहल मूल रूप से ‘तेजो महालय’ नामक भगवान शिव का मंदिर था, जिसे बाद में मुगल शासक शाहजहां के दौर में मुमताज महल का मकबरा बना दिया गया।
एडवोकेट कमिश्नर नियुक्ति से इनकार करने के आदेशों को चुनौती दी गई है
हाईकोर्ट के जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की पीठ ने केंद्र और एएसआई को काउंटर-अफिडेविट दायर करने का निर्देश देते हुए मामले पर अगली कार्रवाई का संकेत दिया। याचिका ‘भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान तेजो महालय टेम्पल पैलेस’ के नाम से, नेक्स्ट फ्रेंड हरि शंकर जैन व अन्य के माध्यम से दाखिल की गई है। इसमें ट्रायल कोर्ट और रिविजनल कोर्ट द्वारा एडवोकेट कमिश्नर नियुक्ति से इनकार करने के आदेशों को चुनौती दी गई है। अगली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि क्या कोर्ट-नियंत्रित सर्वे/डॉक्यूमेंटेशन की राह खुलेगी या मामला यथास्थिति में आगे बढ़ेगा।
यह है मामले की पृष्ठभूमि
2015 में आगरा की सिविल कोर्ट में एक दीवानी वाद दायर किया गया था, जिसमें ताजमहल को शिव मंदिर ‘तेजो महालय’ बताने के साथ हिंदू पक्षकारों को स्मारक परिसर में दर्शन, पूजा और आरती की अनुमति देने की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि स्मारक के स्थापत्य व संरचनात्मक तत्वों का प्रत्यक्ष रिकॉर्ड बनाना जरूरी है, जिसे केवल मौखिक साक्ष्य से सिद्ध नहीं किया जा सकता। चूंकि ताजमहल एक संरक्षित स्मारक है और एएसआई के नियंत्रण में है, इसलिए स्वतंत्र निरीक्षण/फोटोग्राफी संभव नहीं है।
प्रक्रिया का सफर: 2017 में एडवोकेट कमिश्नर नियुक्ति के लिए अर्जी दायर की गई थी, जिसे जुलाई 2019 में ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसकी पर्याप्त जरूरत नहीं है। 4 अप्रैल 2026 को आगरा के अतिरिक्त जिला जज ने भी यह आदेश बरकरार रखा। इन आदेशों के खिलाफ अब हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। याचिका में दलील है कि निचली अदालतों ने विवादित मुद्दों के समाधान के लिए स्थानीय जांच की आवश्यकता का समुचित परीक्षण नहीं किया। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले में सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर 26 रूल 9 के तहत स्थानीय जांच के लिए कमिश्नर नियुक्त करने की शक्ति को मान्यता दी गई है, जिस पर भरोसा किया गया है।
निचली अदालत ने एडवाेकेट कमिश्नर नियुक्त करने की मांग को खारिज किया था
क्या मौखिक गवाहों के बजाय वहां मौजूद भौतिक कलाकृतियां, बंद तहखाने और वास्तुशिल्पीय प्रतीक ही इस विवाद का असली सच सामने ला सकते हैं?” इस सुलगते हुए ऐतिहासिक और कानूनी सवाल के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है। यह याचिका आगरा की निचली अदालत (Civil Court) और जिला अदालत (District Court) के उन फैसलों को चुनौती देती है, जिसमें ताजमहल परिसर के भीतर वैज्ञानिक निरीक्षण, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराने के लिए एक ‘एडवोकेट-कमिश्नर’ (Advocate-Commissioner) नियुक्त करने की मांग को खारिज कर दिया गया था। यह याचिका भगवान “श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान” की ओर से उनके ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ (विधिक मित्र) प्रसिद्ध अधिवक्ता हरि शंकर जैन और कई अन्य श्रद्धालुओं के माध्यम से दायर की गई है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 2015 से अदालत में लंबित है मूल मुकदमा
इस विवाद की कानूनी शुरुआत साल 2015 में हुई थी, जब वादियों (Plaintiffs) ने सिविल जज (सीनियर डिवीजन), आगरा के समक्ष एक नियमित दीवानी मुकदमा (Regular Suit) दायर किया था। इस मुकदमे में निम्नलिखित मुख्य विधिक दावे किए गए थे:
मूल पहचान: यह विश्व प्रसिद्ध स्मारक वास्तव में भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन हिंदू मंदिर है, जिसका नाम ‘तेजो महालय’ (Tejo Mahalaya) है।
पूजा का अधिकार: वादियों ने अदालत से डिक्री (Decree of Declaration) की मांग की थी कि इस परिसर को हिंदू मंदिर घोषित किया जाए और हिंदू समुदाय के लोगों को इसके भीतर ‘दर्शन’ और ‘पूजा-अर्चना’ करने की अनुमति दी जाए।
संवैधानिक अधिकार: याचिका में तर्क दिया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हिंदुओं को अपने आराध्य की पूजा करने का मौलिक अधिकार है, जिससे उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता।
आगरा की अदालतों ने क्यों खारिज की थी सर्वे की मांग?
निचली अदालत का रुख (2019): साल 2019 में वादियों ने परिसर के वैज्ञानिक सर्वे के लिए एडवोकेट कमीशन के गठन का आवेदन दिया था। अतिरिक्त सिविल जज ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वादी जमीन के सटीक राजस्व दस्तावेज (जैसे खसरा या खतौनी) और गाटा संख्या पेश करने में विफल रहे। साथ ही, वादियों द्वारा बताई गई 77 बीघा जमीन की सीमाएं प्रतिवादियों के दस्तावेजों से मेल नहीं खाती थीं।
जिला अदालत का रुख (अप्रैल 2026): इस फैसले के खिलाफ दायर की गई पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को इसी साल अप्रैल में अतिरिक्त जिला जज (ADJ), आगरा ने ‘गैर-रखरखाव योग्य’ (Non-maintainable) बताते हुए खारिज कर दिया था।
हाई कोर्ट में दी गई चुनौतियां और पुरातात्विक दावे
निचली अदालतों के तर्कों को “पूरी तरह अवैध और अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने में विफलता” बताते हुए याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट के समक्ष कई ऐतिहासिक और स्थापत्य कला (Architectural) से जुड़े दावे पेश किए हैं।
राजा परमर्दी देव का निर्माण: याचिका के अनुसार, इस प्राचीन मंदिर का निर्माण 1155-56 ईस्वी में राजा परमर्दी देव द्वारा कराया गया था। बाद में यह जयपुर के राजा मान सिंह और फिर 17वीं शताब्दी में राजा जय सिंह के नियंत्रण में आया।
शाहजहां द्वारा कब्जा: आरोप है कि मुगल शासक शाहजहां ने राजा जय सिंह से इस ‘तेजो महालय’ महल को जबरन हड़प लिया (Usurped) और अपनी मृत बेगम की याद में इसे मकबरे में बदल दिया। इस दौरान मंदिर के कुछ हिस्सों में बदलाव कर उसमें इस्लामिक विशेषताएं जोड़ी गईं।
109 पुरातात्विक प्रतीक: याचिका में दावा किया गया है कि इमारत में कम से कम 109 ऐसे अकाट्य साक्ष्य मौजूद हैं जो इसके मंदिर होने की पुष्टि करते हैं। संगमरमर के गुंबद के शीर्ष पर ‘कलश’ होना और उसका ‘कमल की पंखुड़ियों’ से सजा होना इसका उदाहरण है।
परिसर में ‘गौशाला’: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पुराने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा गया है कि परिसर के दक्षिण-पूर्वी कोने पर एक संरचना को ‘गौशाला’ के रूप में दर्ज किया गया है। एक गौशाला हिंदू मंदिर का अभिन्न हिस्सा होती है, किसी मुस्लिम मकबरे का नहीं।
नमाज़ पर आपत्ति: याचिका में एएसआई द्वारा शुक्रवार को परिसर में नमाज़ पढ़ने की अनुमति देने को ‘गैर-कानूनी’ बताया गया है, जबकि आम आगंतुकों के लिए इसके कई तलों (Floors) को हमेशा बंद और लॉक रखा जाता है।
हाई कोर्ट से क्या गुहार लगाई गई है?
अधिवक्ता सौम्या श्रीवास्तव के माध्यम से दायर इस याचिका में वादियों ने मुख्य रूप से दो मांगें रखी हैं।
एडवोकेट-कमिश्नर की नियुक्ति: चूंकि ताजमहल एक संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक है और वादियों को वहां स्वतंत्र रूप से फोटो या वीडियो लेने का अधिकार नहीं है, इसलिए अदालत खुद एक कमिश्नर नियुक्त करे जो बंद कमरों और प्रतीकों की प्रामाणिक तस्वीरें (Authoritative Photographs) अदालत के सामने रख सके। इस विवाद को केवल ओरल एविडेंस (मौखिक गवाही) से तय नहीं किया जा सकता।
अंतरिम राहत (Interim Stay Application): हाई कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह एएसआई (ASI) के महानिदेशक को निर्देश दे कि वे याचिकाकर्ताओं की उपस्थिति में ताजमहल के भीतर और बाहर की विस्तृत तस्वीरें लें और उन्हें वर्तमान कार्यवाही के रिकॉर्ड पर पेश करें।
केस शीट: ताजमहल ‘तेजो महालय’ याचिका (2026)
| विधिक और ऐतिहासिक श्रेणियां | याचिका में शामिल विधिक बिंदु और दावे |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| याचिकाकर्ता | भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान (वाया हरि शंकर जैन) |
| मूल दीवानी मुकदमा | वर्ष 2015 से सिविल जज (सीनियर डिवीजन), आगरा में लंबित। |
| मुख्य विधिक आधार | संविधान का अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता और पूजा का अधिकार)। |
| निचली अदालत का आधार | राजस्व रिकॉर्ड (खसरा/खतौनी) और गाटा संख्या की स्पष्टता न होना। |
| याचिकाकर्ताओं का तर्क | संपत्ति की पहचान (Identity) को लेकर कोई विवाद नहीं है, अतः सर्वे की मांग जायज है। |

