Delhi Riots: साल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के पीड़ितों को अंतरिम राहत देने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को तगड़ा झटका दिया है।
मुआवजा वितरित करने के जनवरी 2025 के आदेश को वापस लेने की गुहार
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने दिल्ली सरकार की उस अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें सरकार ने दंगा पीड़ितों को ₹21.71 करोड़ का मुआवजा वितरित करने के जनवरी 2025 के आदेश को वापस लेने (Recall) की गुहार लगाई थी। अदालत ने कहा, अदालती आदेशों के तहत दंगों में हुए नुकसान का मुआवजा पीड़ितों को देना सरकार की जिम्मेदारी है। आप इस मुआवजे की राशि को हिंसा फैलाने वाले असली अपराधियों (Perpetrators) से वसूलने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन पीड़ित खुद दंगाइयों के पास अपना मुआवजा वसूलने नहीं जाएंगे। सरकार को ऐसी वसूली के लिए एक कानूनी तंत्र (Mechanism) बनाना चाहिए था। जब तक आपके पास अपराधियों से पैसे वसूलने की कोई व्यवस्था नहीं है, तब तक आप पीड़ितों को उनके हक के मुआवजे से वंचित नहीं रख सकते। सिर्फ सरकार बदलने से अदालत में राज्य का रुख नहीं बदल जाना चाहिए।
मामला क्या है?: ₹153 करोड़ के दावों पर ₹21 करोड़ की सिफारिश
यह पूरा विवाद फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों के पुनर्वास और दावों से जुड़ा है।
दंगों का असर: 23 फरवरी 2020 को शुरू हुए इन दंगों में कम से कम 53 लोगों की जान चली गई थी और 700 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। बड़े पैमाने पर संपत्ति का नुकसान हुआ था।
कमीशन का गठन: तत्कालीन आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने पीड़ितों के नुकसान का आकलन करने के लिए अप्रैल 2020 में ‘उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा दावा आयोग’ (NEDRCC) का गठन किया था। पीड़ितों ने कुल ₹153.69 करोड़ के दावे पेश किए थे, जिसमें से आयोग (NEDRCC) ने ₹21.71 करोड़ का मुआवजा बांटने की सिफारिश की थी।
जनवरी 2025 का आदेश: पीड़ितों की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 15 जनवरी 2025 को दिल्ली सरकार को यह राशि तुरंत जारी करने का निर्देश दिया था। उस समय सरकार की तरफ से इस पर कोई आपत्ति (No Objection) दर्ज नहीं कराई गई थी।
बदला हुआ स्टैंड: सरकार बदलते ही मुकर गए वकील
फरवरी 2025 में दिल्ली में नई सरकार के गठन के बाद, राज्य सरकार का कानूनी रुख पूरी तरह बदल गया।
सरकार की दलील: सितंबर 2025 में दिल्ली सरकार ने एकल पीठ के सामने आवेदन देकर कहा कि जनवरी 2025 में सरकारी वकील (Proxy Counsel) ने “अनजाने में” और बिना वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति के ‘नो ऑब्जेक्शन’ दे दिया था, इसलिए उस आदेश को वापस लिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आड़: सरकार के स्थायी वकील समीर वशिष्ठ ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के 2009 के एक ऐतिहासिक फैसले (आंध्र प्रदेश राज्य बनाम सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान मामला) के अनुसार, दंगों में संपत्ति के नुकसान की भरपाई सरकार को नहीं, बल्कि हिंसा फैलाने वाले और दंगे का आयोजन करने वाले असली अपराधियों को अपनी जेब से करनी चाहिए।
एकल पीठ का झटका: हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 7 मई 2026 को सरकार के इस ‘अनजाने में हुई गलती’ वाले तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि सरकार अवमानना (Contempt) से बचने के लिए जानबूझकर देरी से यह याचिका लाई है। सरकार ने इसके खिलाफ खंडपीठ (Division Bench) में अपील की थी।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: वसूली का तंत्र कहां है?
चीफ जस्टिस डी. के. उपाध्याय की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के वकीलों को कड़ी फटकार लगाई और उनके दावों की विधिक कमियों को उजागर किया।
पीड़ित दंगाइयों के पास नहीं जाएंगे
जब सरकारी वकील ने कहा कि मुआवजा दंगाइयों से लिया जाना चाहिए, तो कोर्ट ने मौखिक रूप से पूछा, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के तहत, आपको (सरकार को) उन लोगों से नुकसान की राशि वसूल करनी है जो इसके लिए जिम्मेदार हैं। क्या आपने अब तक अपराधियों से वह राशि वसूल की है? क्या पीड़ित खुद अपराधियों के पास मुआवजा मांगने जा सकते हैं? क्या वे ऐसा कर सकते हैं? अपराधियों से हर्जाना वसूलने के लिए आपको एक तंत्र (Mechanism) विकसित करना था; क्या वह तंत्र अभी लागू है? सरकारी वकील ने स्वीकार किया कि आरोपियों के खिलाफ ट्रायल अभी जारी है और वसूली का ऐसा कोई तंत्र “अभी तक तैयार नहीं” है।
अवमानना से बचने की कोशिश
पीड़ितों के वकील चिरायु जैन ने अदालत में जोरदार दलील दी कि कानून विभाग ने मई 2025 में ही यह राय दी थी कि अवमानना की कार्रवाई से बचने के लिए केवल एक समीक्षा याचिका दायर कर दी जाए। सितंबर 2025 में यह अर्जी सिर्फ समय काटने के लिए लगाई गई क्योंकि फरवरी में सरकार बदल चुकी थी और सरकार बदलने से राज्य की नीतियां इस तरह नहीं बदली जा सकतीं। खंडपीठ ने पीड़ितों की दलीलों से सहमति जताते हुए दिल्ली सरकार की अपील को निपटा दिया और जनवरी 2025 तथा मई 2026 के मुआवजा वितरण के आदेशों में कोई भी हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने राज्य को केवल तकनीकी रूप से जनवरी 2025 के मूल आदेश को चुनौती देने वाली एक अलग नियमित याचिका दायर करने की छूट (Liberty) दी है।
केस शीट: दिल्ली उच्च न्यायालय निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निष्कर्ष |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | चीफ जस्टिस डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया (खंडपीठ) |
| मुआवजा आयोग | उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा दावा आयोग (NEDRCC) |
| मुआवजे की कुल राशि | ₹21.71 करोड़ (कुल ₹153.69 करोड़ के दावों के एवज में) |
| सरकार का मुख्य तर्क | मुआवजा सरकार के बजाय दंगा भड़काने वाले असली अपराधियों से वसूला जाए। |
| अदालत का अंतिम आदेश | आदेश वापस लेने से इनकार; पीड़ितों को तुरंत मुआवजा देने का पुराना फैसला बरकरार। |

