Tuesday, August 25, 2026
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Recruitment Disputes: वेबसाइट या कैंडिडेट डैशबोर्ड पर नोटिस अपलोड करना वैध कानूनी नोटिस नहीं…सरकारी विभाग केस पढ़ें आंख खोलें

Recruitment Disputes: केरल हाईकोर्ट ने केरल प्रशासनिक न्यायाधिकरण (KAT) के प्रक्रिया नियमों और डिजिटल नोटिस की कानूनी वैधता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

यह रही हाईकोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ की राय

हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्ण एस. की खंडपीठ ने साफ किया कि समय बचाने के नाम पर या रैंक लिस्ट की वैधता खत्म होने के डर से कानून द्वारा स्थापित ‘नोटिस तामील’ (Service of Process) की अनिवार्य प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा, भर्ती विवादों (Recruitment Disputes) में प्रभावित उम्मीदवारों को कानूनी नोटिस भेजने की जगह केरल लोक सेवा आयोग (KPSC) की आधिकारिक वेबसाइट पर अदालती आदेश या याचिका की पीडीएफ (PDF) अपलोड कर देना, या उम्मीदवारों के व्यक्तिगत प्रोफाइल डैशबोर्ड में उसका लिंक डाल देना ‘वैध कानूनी नोटिस’ (Valid Service of Notice) नहीं माना जा सकता। डिजिटल माध्यम प्रशासनिक सहूलियत के लिए हो सकते हैं, लेकिन वे अदालती नोटिस तामील करने के स्थापित वैधानिक नियमों की जगह नहीं ले सकते।

मामला क्या है?: एग्रीकल्चर असिस्टेंट भर्ती और एक्सपायर होती रैंक लिस्ट का विवाद

यह पूरा मामला कृषि विकास और किसान कल्याण विभाग में कृषि सहायक (ग्रेड II) – Agricultural Assistant (Grade II) के पद के लिए जारी पीएससी (PSC) रैंक लिस्ट से जुड़ा है।

योग्यता को चुनौती: याचिकाकर्ता उम्मीदवारों ने केरल प्रशासनिक न्यायाधिकरण (KAT) में एक मूल आवेदन दायर कर भर्ती अधिसूचना और रैंक लिस्ट को इस आधार पर चुनौती दी थी कि इस पद के लिए केवल कृषि में डिप्लोमा या जैविक कृषि में डिप्लोमा धारक ही पात्र होने चाहिए।

अदालत का अंतरिम आदेश: ट्रिब्यूनल ने अंतरिम आदेश जारी कर कहा कि इस रैंक लिस्ट से होने वाली सभी नियुक्तियां इस अदालती मामले के अंतिम फैसले के अधीन (Subject to final outcome) होंगी।

समय की कमी और 79 प्रभावित उम्मीदवार: मुकदमेबाजी के दौरान पीएससी ने कोर्ट को बताया कि इस मामले के फैसले से 79 अन्य उम्मीदवार सीधे तौर पर प्रभावित होंगे (जिन्हें केस में पक्षकार बनाया जाना जरूरी था)। याचिकाकर्ताओं के सामने संकट यह था कि इस पीएससी रैंक लिस्ट की अवधि सितंबर 2026 में समाप्त होने वाली थी।

याचिकाकर्ताओं की गुहार: ’79 लोगों को नोटिस भेजने में रैंक लिस्ट ही खत्म हो जाएगी’

याचिकाकर्ताओं ने ट्रिब्यूनल के सामने एक व्यावहारिक समस्या रखी। उन्होंने कहा कि सभी 79 उम्मीदवारों को व्यक्तिगत रूप से पारंपरिक तरीके (पंजीकृत डाक या स्पीड पोस्ट) से नोटिस भेजने में बहुत अधिक समय लगेगा, जिससे समय-सीमा समाप्त हो जाएगी और उनकी याचिका ही निष्प्रभावी (Infructuous) हो जाएगी। उन्होंने यह भी दलील दी कि इनमें से 45 उम्मीदवारों को पहले ही नियुक्ति मिल चुकी है या वे कहीं और ज्वाइन कर चुके हैं, इसलिए उन्हें नोटिस भेजने का कोई खास फायदा नहीं है। उन्होंने ट्रिब्यूनल से दो वैकल्पिक मांगें की थीं- इसमें या तो सभी प्रभावित उम्मीदवारों को नोटिस दिए बिना ही मामले की सीधी सुनवाई की जाए या फिर केरल पीएससी (KPSC) को निर्देश दिया जाए कि वह मूल याचिका और कोर्ट के अंतरिम आदेश की पीडीएफ अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दे और सभी उम्मीदवारों के लॉगिन डैशबोर्ड के भीतर इसका एक हाइपरलिंक (Intra-site Hyperlink) डाल दे। इसे ही ‘नोटिस की सफल तामील’ मान लिया जाए। ट्रिब्यूनल (KAT) ने इन दोनों मांगों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसके बाद उम्मीदवार हाई कोर्ट पहुंचे।

हाई कोर्ट का फैसला: ‘शॉर्टकट’ के लिए नियमों को नहीं बदला जा सकता

हाई कोर्ट की खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों और केरल प्रशासनिक न्यायाधिकरण (प्रक्रिया) नियम, 2010 (2010 Rules) का बारीकी से अध्ययन करने के बाद ट्रिब्यूनल के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया।

वैधानिक नियमों में पीएससी वेबसाइट का कोई प्रावधान नहीं

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2010 के नियमों का नियम 10 नोटिस तामील करने के तरीके तय करता है, जिसमें व्यक्तिगत रूप से हाथ से देना (Hand Delivery),
पंजीकृत डाक (Registered Post), विभाग के प्रमुख के माध्यम से भेजना, या असाधारण मामलों में ट्रिब्यूनल के निर्देशानुसार समाचार पत्रों में सार्वजनिक विज्ञापन (Substituted Service) शामिल हैं। नियमों में कहीं भी पीएससी की वेबसाइट या कैंडिडेट प्रोफाइल पर पीडीएफ डालना नोटिस तामील करने का वैध माध्यम स्वीकार नहीं किया गया है।

रिप्रेजेंटेटिव कपैसिटी (Representative Capacity) का सही रास्ता मौजूद था

जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन ने आदेश में रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता शॉर्टकट अपनाने के बजाय कानून के सही रास्ते का इस्तेमाल कर सकते थे। याचिकाकर्ता चाहते तो 2010 के नियमों के नियम 4B का सहारा लेकर अदालत से ‘प्रतिनिधि क्षमता’ (Representative Capacity) में मुकदमा चलाने की अनुमति मांग सकते थे। इसके तहत वे कुछ प्रमुख प्रभावित उम्मीदवारों को सीधे पक्षकार बनाते और बाकी सभी के लिए समाचार पत्र में एक सार्वजनिक विज्ञापन (Public Advertisement) जारी करवाकर नोटिस की तामील पूरी कर सकते थे। अदालत ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ताओं ने सही कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया, इसलिए ट्रिब्यूनल का आदेश बिल्कुल वैध था। हाई कोर्ट ने उम्मीदवारों की याचिका को खारिज कर दिया। इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता एस. सबरीनाथ और इंदुलेखा जोसेफ पेश हुए। राज्य सरकार का पक्ष सरकारी वकील पार्वती के. ने, केरल कृषि विश्वविद्यालय का पक्ष स्थायी वकील रॉबसन पॉल ने और केरल पीएससी का पक्ष स्थायी वकील पी.सी. शशिधरन ने रखा।

केस शीट: केरल उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय, एर्नाकुलम
माननीय न्यायाधीशजस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्ण एस.
मामले का शीर्षकहेन्ना पी.के. व अन्य बनाम केरल राज्य व अन्य
मूल विधिक कानूनकेरल प्रशासनिक न्यायाधिकरण (प्रक्रिया) नियम, 2010 (नियम 10 और 4B)
मुख्य कानूनी विषयक्या प्रशासनिक वेबसाइट या कैंडिडेट डैशबोर्ड पर अदालती दस्तावेज अपलोड करना ‘सफल नोटिस तामील’ है?
अदालत का अंतिम आदेशयाचिका खारिज; डिजिटल पोर्टल पर अपलोडिंग को कानूनी नोटिस नहीं माना जा सकता, तय विधिक प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य है।
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