Monday, August 31, 2026
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Senior Citizens Act: पिता को शांति से जीने दें…सीनियर सिटीजन्स एक्ट के तहत बेदखल बेटे को क्या दी गई सुप्रीम सीख, जानिए

Senior Citizens Act:माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा को कानून से ऊपर मानवीय संवेदनाओं की कसौटी पर परखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अहम सीख दी है।

राजस्थान के एक व्यक्ति द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका

शीर्ष अदालत के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने राजस्थान के एक व्यक्ति द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज करते हुए बेहद तल्ख और सीधी टिप्पणी की। एक बेटे को अपने बुजुर्ग पिता के घर से बेदखल करने के आदेश में हस्तक्षेप करने से पूरी तरह इनकार कर दिया है।
अदालत ने साफ कर दिया कि आप कैसे बेटे हैं जो अपने ही पिता के साथ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं? यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। जाइए और इस उम्र में अपने पिता की देखभाल कीजिए। उनके जीवन के जो भी दिन बचे हैं, कम से कम उन्हें शांति से जीने दें। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007′ (Senior Citizens Act) के तहत बुजुर्गों को मिलने वाली शांति और सुरक्षा के अधिकार के आगे बेटे के कथित संपत्ति अधिकारों (Property Rights) की दलीलें नहीं टिक सकतीं।

मामला क्या है?: राजस्थान का पारिवारिक संपत्ति विवाद

यह मामला राजस्थान के जोधपुर जिले के बिलाड़ा (Bilara) स्थित एक आवासीय संपत्ति से जुड़ा है।

ट्रिब्यूनल का आदेश (2024): एक बुजुर्ग पिता ने सीनियर सिटीजन्स एक्ट के तहत बने मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल (एसडीओ कोर्ट, बिलाड़ा) में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि उनका बेटा उन्हें प्रताड़ित कर रहा है। उन्होंने खुद को शांति से रहने देने और बेटे को घर से बेदखल करने की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने फरवरी 2024 में पिता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बेटे को घर खाली करने का आदेश दिया।

हाईकोर्ट की मुहर: बेटे ने इस आदेश को राजस्थान हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाई कोर्ट के सिंगल जज और फिर डिवीजन बेंच (खंडपीठ) दोनों ने ट्रिब्यूनल के बेदखली (Eviction) के आदेश को सही ठहराया। इसके बाद बेटा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

कोर्ट रूम जिरह: ‘पैतृक संपत्ति का अधिकार’ बनाम ‘बुजुर्ग की शांति’

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता (बेटे) के वकील वरुण भाटी (AoR अर्जुन सिंह भाटी के माध्यम से) ने कानून और संपत्ति के अधिकारों को लेकर कई तर्क रखे, जिन्हें कोर्ट ने खारिज कर दिया।

पैतृक और सह-स्वामित्व (Coparcenary Rights) का दावा

बेटे का तर्क था कि यह विवादित मकान उसके पिता की खुद की कमाई से खरीदी गई संपत्ति नहीं है। इसे साल 1986 में उसकी दादी के नाम पर खरीदा गया था। दादी की मृत्यु के बाद इस पर कई कानूनी वारिसों का अधिकार है, इसलिए पिता इसे अपनी विशेष और एकमात्र संपत्ति मानकर उसे बाहर नहीं निकाल सकते। वह अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ सालों से वहां रह रहा है और उसका इस पर सह-स्वामित्व (Co-ownership) का अधिकार है।

“सीनियर सिटीजन्स एक्ट सिविल कोर्ट का विकल्प नहीं”

बचाव पक्ष ने दलील दी कि सीनियर सिटीजन्स एक्ट के तहत होने वाली संक्षिप्त सुनवाई (Summary Proceedings) का इस्तेमाल किसी संपत्ति के मालिकाना हक (Title), वसीयत या उत्तराधिकार के पेचीदा विवादों को तय करने के लिए नहीं किया जा सकता। इसके लिए सिविल कोर्ट (दीवानी अदालत) में बकायदा मुकदमा चलना चाहिए। बेदखली के इस आदेश से उसका पूरा परिवार बेघर हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा और संक्षिप्त रुख

जब वकील ने कोर्ट से कहा कि याचिकाकर्ता पर उसकी पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी भी है, तो जस्टिस विक्रम नाथ बिल्कुल प्रभावित नहीं हुए। संपत्ति के अधिकार के दावों पर जस्टिस नाथ ने सिर्फ दो शब्दों में बात खत्म कर दी— “नहीं। अगला केस।” और याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।

केस शीट: सुप्रीम कोर्ट सीनियर सिटीजन्स एक्ट एवं बेदखली आदेश समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना
प्रासंगिक कानूनमाता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007
मूल ट्रिब्यूनलउप-प्रभागीय अधिकारी-सह-भरणपोषण अधिकरण, बिलाड़ा (राजस्थान)
बेटे का मुख्य तर्कमकान दादी के नाम पर था, इसलिए यह पैतृक संपत्ति (Ancestral Property) है।
अदालत का अंतिम निर्णयविशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज; बेटे को घर खाली करने का आदेश बरकरार।

इस फैसले का सामाजिक और कानूनी महत्व

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख देश की विभिन्न अदालतों द्वारा पूर्व में दिए गए उन फैसलों की कड़ी को आगे बढ़ाता है, जहां वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोपरि माना गया है।

उत्पीड़न से मुक्ति का अधिकार: कानूनन, भले ही कोई संपत्ति पूरी तरह से पिता के नाम पर न हो या उसमें बेटे का कोई तकनीकी हिस्सा बनता हो, लेकिन अगर बेटा अपने माता-पिता को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता है, तो वरिष्ठ नागरिकों को अपने ही घर में शांति से रहने का अधिकार देने के लिए ट्रिब्यूनल बच्चों को बेदखल कर सकता है।

सिविल मुकदमेबाजी की आड़ नहीं: बच्चे अक्सर पैतृक संपत्ति (Joint Family Property) का हवाला देकर सिविल कोर्ट के मुकदमों को सालों-साल खींचते हैं ताकि बुजुर्ग माता-पिता तंग आकर सरेंडर कर दें। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ऐसी कानूनी तकनीकीताओं की आड़ लेकर बुजुर्गों का उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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