Wednesday, July 15, 2026
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Criminal History: अब आप महिला नहीं, लेडी डॉन हैं…NDPS केस में 60 वर्षीय बुजुर्ग महिला को अगर आप नहीं जानते हैं तो इस केस को जरूर पढ़िए

Criminal History: नशीले पदार्थों की तस्करी के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश की एक 60 वर्षीय बुजुर्ग महिला की नियमित जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में बेहद कड़े और सीधे शब्दों का इस्तेमाल किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी आरोपी का पुराना आपराधिक इतिहास (Criminal History) आदतन अपराधी होने का संकेत देता है, तो केवल उसकी उम्र, महिला होने का हवाला या बीमारी (जैसे डायबिटीज और हाइपरटेंशन) उसे जेल से बाहर लाने का आसान रास्ता नहीं बन सकते।

लगातार मादक पदार्थों की तस्करी के गंभीर अपराधों में लिप्त है आरोपी

अदालत ने कहा, इस उम्र में तो आपको एक बेहद सभ्य और शालीन जीवन जीना चाहिए था, लेकिन आप लगातार मादक पदार्थों (Drugs) की तस्करी के गंभीर अपराधों में लिप्त हैं। बार-बार अपराध दोहराने के कारण आपने एक ‘महिला’ होने की विश्वसनीयता खो दी है। अब आप केवल एक महिला नहीं, बल्कि एक ‘लेडी डॉन’ (Lady Don) बन चुकी हैं। ऐसे में आपकी उम्र या बीमारी के आधार पर आपको जमानत (Bail) का लाभ नहीं दिया जा सकता।

मामला क्या है?: मध्य प्रदेश का शाहडोल ड्रग्स केस

यह मामला मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के धनपुरी थाने में दर्ज एनडीपीएस (NDPS) कानून के तहत एक आपराधिक मामले से जुड़ा है।

गिरफ्तारी और बरामदगी: याचिकाकर्ता महिला को 28 मई 2025 को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उसके पास से नशीला पदार्थ बरामद हुआ था। पुलिस ने उसके खिलाफ एनडीपीएस अधिनियम की धारा 8/20 के तहत अपराध संख्या 186/2025 दर्ज किया था।

बार-बार खारिज हुई जमानत: महिला ने इससे पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में तीन बार जमानत के लिए गुहार लगाई थी, जो खारिज हो गई थी। 26 मार्च 2026 को हाई कोर्ट ने उसकी चौथी जमानत याचिका भी ठुकरा दी, जिसके खिलाफ उसने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की थी।

धीमी सुनवाई की दलील: महिला की वकील सी. अंकिता अपर्णा ने अदालत में दलील दी कि पिछले एक साल में 14 गवाहों में से केवल 2 गवाहों से ही पूछताछ हो सकी है, और मुकदमा बहुत धीमी गति से चल रहा है। चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी है और अब पुलिस को हिरासत में लेकर पूछताछ की भी जरूरत नहीं है।

कोर्ट रूम जिरह: प्लांटेड केस बनाम लेडी डॉन का इतिहास

सुनवाई के दौरान जब बचाव पक्ष और अदालत के बीच तीखी बहस हुई, तो कानून के कई तकनीकी और व्यावहारिक पहलू सामने आए।

“व्यावसायिक मात्रा” (Commercial Quantity) की दलील खारिज

बचाव पक्ष के वकील (AoR आशुतोष दुबे के माध्यम से दायर याचिका) ने तर्क दिया कि महिला से बरामद किया गया नशीला पदार्थ ‘कमर्शियल क्वांटिटी’ (व्यावसायिक मात्रा) की सीमा से नीचे था। इसलिए, एनडीपीएस की धारा 37 के तहत लागू होने वाली बेहद सख्त जमानत शर्तें इस मामले में बाधा नहीं बननी चाहिए। उन्होंने पूरनमल जाट बनाम राजस्थान राज्य जैसे सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला भी दिया कि केवल पुराने रिकॉर्ड के आधार पर जमानत नहीं रोकी जा सकती।

‘केस प्लांट’ करने का आरोप

जब कोर्ट ने महिला के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड पर उंगली उठाई, तो वकील ने दलील दी, “सरकारी तंत्र ऐसा है कि यदि मैं एक बार किसी मामले में जेल चली जाती हूं, तो पुलिस मेरे खिलाफ आसानी से दूसरे नए फर्जी मामले भी प्लांट (लगा) सकती है।”

सुप्रीम कोर्ट की दो टूक टिप्पणी

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा इस तर्क से बिल्कुल सहमत नहीं हुए। उन्होंने महिला के पुराने इतिहास को देखते हुए कहा कि वह पहली बार अपराध नहीं कर रही हैं, बल्कि वे आदतन ऐसा कर रही हैं। उन्होंने टिप्पणी की, आपने एक महिला होने की साख खो दी है… आप अब एक साधारण महिला नहीं हैं, आप एक लेडी डॉन हैं। अदालत ने पुलिस के उस मेमोरेडम बयान को भी संज्ञान में लिया, जिसमें महिला ने कथित तौर पर स्वीकार किया था कि वह अतीत में भी नशीले पदार्थ बेचती थी और गिरफ्तारी से कुछ महीने पहले ही उसने दोबारा इस धंधे को शुरू किया था।

केस शीट: सुप्रीम कोर्ट NDPS जमानत एवं आपराधिक इतिहास समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
याचिकाकर्ता60 वर्षीय महिला आरोपी (निवासी: शहडोल, मध्य प्रदेश)
प्रासंगिक कानून धाराधारा 8/20, स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS Act), 1985
मूल पुलिस स्टेशनधनपुरी पुलिस स्टेशन, जिला शहडोल (MP)
हिरासत की अवधि28 मई 2025 से लगातार जेल में बंद
अदालत का अंतिम निर्णयविशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज; नियमित जमानत देने से पूरी तरह इनकार।

इस फैसले का कानूनी संदेश

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एनडीपीएस मामलों में जमानत के सिद्धांतों को लेकर एक कड़ा संदेश देता है।

  • उम्र और लिंग असीमित छूट नहीं: कानून में महिलाओं और बुजुर्गों को कुछ मोर्चों पर मानवीय आधार पर राहत देने का प्रावधान जरूर है, लेकिन समाज को खोखला करने वाले ड्रग्स जैसे संगठित अपराधों (Organized Crimes) में अगर कोई महिला रीढ़ की हड्डी बनकर काम कर रही है, तो अदालतें उसके प्रति कोई ढिलाई नहीं बरतेंगी।
  • साख (Credibility) का महत्व: जमानत देते समय अदालतें आरोपी के समाज में आचरण और उसके दोबारा अपराध में संलिप्त होने की आशंका को गहराई से देखती हैं। यदि पुराना रिकॉर्ड बार-बार कानून तोड़ने की गवाही देता है, तो मुकदमे की धीमी गति का लाभ उठाकर जेल से बाहर आने का मौका नहीं दिया जाएगा।
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