Criminal Justice: आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) में न्यायिक अनुशासन, शिष्टाचार और ‘थर्ड जज’ की शक्तियों के दायरे पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कानूनी सवाल उठाया है।
आपराधिक अपीलों के निपटारे के भविष्य के नियमों को तय करने का मामला
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने साल 1999 के एक पुराने न्यायिक नजीर (सज्जन सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य) की सत्यता और व्याख्या पर असहमति जताते हुए, इस कानूनी प्रश्न को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा गठित की जाने वाली एक बड़ी पीठ (Larger Bench) के पास भेज (Refer) दिया है। यह फैसला आपराधिक अपीलों के निपटारे के भविष्य के नियमों को तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। शीर्ष अदालत ने कहा, जब किसी आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रही दो न्यायाधीशों की खंडपीठ (Division Bench) के बीच मतभेद होता है, और मामला तीसरे ‘रेफरी जज’ (Third Referee Judge) के पास भेजा जाता है, तो क्या वह तीसरा जज उन मुद्दों को भी दोबारा खोल सकता है जिन पर मूल पीठ के दोनों जज पहले ही सर्वसम्मति (Unanimously) से एक राय थे? क्या धारा 392 CrPC तीसरे जज को पूरी अपील पर नए सिरे से फैसला सुनाने का असीमित अधिकार देती है?
विवाद की पृष्ठभूमि: 1991 का मर्डर केस और इलाहाबाद हाई कोर्ट का उलझा हुआ फैसला
यह पूरा कानूनी विवाद उत्तर प्रदेश सरकार और शिकायतकर्ता डॉ. राकेश कुमार गुप्ता द्वारा दायर अपीलों से उपजा है, जो 1991 के एक हत्या के मामले से जुड़ा है।
निचली अदालत का फैसला: लखनऊ की एक निचली अदालत ने तीन सगे भाइयों—अनिल रस्तोगी, अजय रस्तोगी और अतुल रस्तोगी को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट के दो जजों में मतभेद (Division of Opinion): तीनों भाइयों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक संयुक्त अपील दायर की। इस अपील पर सुनवाई कर रहे दो जजों की राय अलग हो गई। जस्टिस भंवर सिंह ने अनिल और अजय की सजा को बरकरार रखा, लेकिन तीसरे भाई अतुल को बरी कर दिया। जस्टिस देवी प्रसाद सिंह ने निचली अदालत के फैसले से सहमति जताई और तीनों भाइयों की सजा को बरकरार रखा।
तीसरे जज का चौंकाने वाला फैसला: चूंकि केवल ‘अतुल’ की दोषसिद्धि को लेकर दोनों जजों में मतभेद था, इसलिए नियम के मुताबिक मामला तीसरे रेफरी जज (तत्कालीन इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश, जस्टिस विक्रम नाथ) के पास भेजा गया। लेकिन तीसरे जज ने न केवल अतुल को बरी किया, बल्कि उन दोनों भाइयों (अनिल और अजय) की सजा को भी पलटकर बरी कर दिया, जिन पर मूल पीठ के दोनों जज पहले ही सर्वसम्मति से सजा बरकरार रखने का फैसला दे चुके थे। इसके खिलाफ यूपी सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सुप्रीम कोर्ट के सामने कानूनी सवाल: धारा 392 CrPC बनाम सज्जन सिंह (1999) नजीर
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य जिरह इस बात पर केंद्रित थी कि क्या तीसरे जज ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया?
धारा 392 CrPC [अब BNSS की धारा 433] क्या कहती है?
इस धारा के तहत यदि किसी आपराधिक अपील की सुनवाई कर रही पीठ के जजों की राय बराबर बंटी हुई हो, तो मामला उनके मतभेदों के साथ तीसरे न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा। वह जज मामले की दोबारा सुनवाई करेगा और अपना फैसला देगा, जिसके बाद उसी राय के अनुसार अंतिम निर्णय सुनाया जाएगा।
‘सज्जन सिंह’ (1999) का पुराना फैसला क्या था?
आरोपियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि तीसरे जज का फैसला पूरी तरह सही था। उन्होंने 1999 के सज्जन सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि रेफरी जज पूरे मामले की स्वतंत्र रूप से जांच करने के लिए सक्षम है और वह केवल दोनों जजों के बीच मतभेद वाले विशिष्ट बिंदु तक ही सीमित नहीं है।
बड़ी बेंच को भेजने का कारण (Why Referred?)
जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ उत्तर प्रदेश सरकार के इस तर्क से सहमत दिखी कि ‘सज्जन सिंह’ के फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया:
सीमित संदर्भ: रिकॉर्ड को देखने से साफ है कि केवल अतुल की अपील को ही तीसरे जज के पास भेजा जाना चाहिए था, अनिल और अजय की अपीलों को नहीं, क्योंकि उनकी सजा पर दोनों मूल जजों में कोई मतभेद नहीं था।
विपरीत परिणाम (Anomalous Consequences): कोर्ट ने कहा कि अगर ‘सज्जन सिंह’ के तर्क को बिना सोचे-समझे या यांत्रिक रूप से स्वीकार कर लिया जाए, तो इसके तर्कहीन, विसंगतिपूर्ण और अवांछनीय परिणाम हो सकते हैं। यह न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) और आपराधिक न्याय प्रणाली की निष्पक्षता को कमजोर करेगा।
केस शीट: सुप्रीम कोर्ट धारा 392 CrPC / थर्ड जज अधिकार क्षेत्र समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और संदर्भ |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा |
| प्रासंगिक कानून धारा | धारा 392 CrPC [अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 433] |
| चुनौतीपूर्ण विधिक नजीर | सज्जन सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1999) |
| मूल विवादित मामला | 1991 का रस्तोगी ब्रदर्स मर्डर केस (इलाहाबाद हाई कोर्ट, 2018) |
| अदालत का अंतरिम निर्देश | कानून के इस बिंदु को बड़ी बेंच (Larger Bench) के पास भेजा गया; अंतिम फैसला बड़ी बेंच के निर्णय के बाद होगा। |
कानूनी व्यवस्था पर इस फैसले का प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक बड़ी बेंच इस विधिक प्रश्न पर अपना अंतिम और आधिकारिक फैसला नहीं दे देती, तब तक इस मूल मर्डर केस की अपीलों को स्थगित रखा जाएगा।
कोर्ट का प्राथमिक रुख: यदि दो जजों की पीठ किसी आरोपी ‘ए’ और ‘बी’ को दोषी मानने पर सहमत है और केवल ‘सी’ की भूमिका पर असहमत है, तो रेफरी जज को केवल ‘सी’ के भाग्य का फैसला करना चाहिए। यदि वह ‘ए’ और ‘बी’ के सर्वसम्मत फैसले को भी पलटने लगेगा, तो यह बड़ी पीठ (Division Bench) के ऊपर एक एकल न्यायाधीश (Single Judge) को अपीलीय प्राधिकारी (Appellate Authority) बनाने जैसा हो जाएगा, जो न्यायिक पदानुक्रम के सिद्धांतों के विपरीत है।

