Wednesday, July 15, 2026
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Hate Speech: लीक हुई प्राइवेट कॉल से नफरती भाषण का केस नहीं बन सकता…व्हाट्सएप बातचीत पर यह मिला जवाब, केस जानिए

Hate Speech: नागरिकों की व्यक्तिगत बातचीत की गोपनीयता और हेट स्पीच के कानूनी मापदंडों को रेखांकित करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

एक स्थानीय मस्जिद के पास से ‘भगवा ध्वज’ हटाने का मामला

अदालत ने एक स्थानीय मस्जिद के पास से ‘भगवा ध्वज’ (Saffron Flag) हटाने की योजना बनाने के आरोपी दो व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) और पूरी आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया है। दो व्यक्तियों के बीच फोन पर हुई निजी बातचीत (Private Telephonic Conversation), जिसे किसी तीसरे पक्ष द्वारा चुपके से रिकॉर्ड करके व्हाट्सएप (WhatsApp) पर लीक किया गया हो, वह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A या 295A के तहत नफरती भाषण (Hate Speech) या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के अपराध के कानूनी दायरे में नहीं आती। ऐसी बातचीत को अपराध मानकर जांच जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग (Abuse of Process of Law) और सरासर अन्याय होगा।

मामला क्या है?: व्हाट्सएप पर वायरल ऑडियो क्लिप और पुलिसिया कार्रवाई

यह पूरा विवाद कर्नाटक के करादगी (Karadagi) गांव से जुड़ा है, जिसकी पृष्ठभूमि इस प्रकार है।

निजी बातचीत का लीक होना: साल 2024 में पुलिस ने दो स्थानीय निवासियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। यह कार्रवाई तब की गई जब दोनों आरोपियों के बीच फोन पर हुई बातचीत का एक कथित ऑडियो क्लिप व्हाट्सएप पर वायरल हो गया।

बातचीत की सामग्री: लीक हुई रिकॉर्डिंग में दोनों कथित तौर पर एक स्थानीय मस्जिद के पास लगे ‘भगवा ध्वज’ को हटाने की रणनीति बना रहे थे। पुलिस शिकायत के अनुसार, इस बातचीत में कानूनी और गैर-कानूनी दोनों तरह की चर्चाएं थीं—जैसे पहले एक औपचारिक याचिका (Petition) सौंपना, 200 लोगों को इकट्ठा करना, सीसीटीवी (CCTV) कैमरे बंद करना और आलंकारिक रूप से ‘तलवारों’ (Swords) का जिक्र करना शामिल था।

सांप्रदायिक संवेदनशीलता: चूंकि साल 2004 में उसी ध्वज को लेकर इलाके में सांप्रदायिक तनाव हो चुका था, इसलिए पुलिस ने इसे बेहद संवेदनशील मानते हुए दोनों के खिलाफ धारा 153A (विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी बढ़ाना), 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना) और 120B (आपराधिक साजिश) के तहत केस दर्ज कर लिया था।

अदालत में कानूनी जिरह: ‘निजी बातचीत’ बनाम ‘सार्वजनिक प्रसार’

हाई कोर्ट के समक्ष दोनों पक्षों ने कानून की तकनीकी परिभाषाओं को लेकर अपने-अपने तर्क रखे।

आरोपियों के वकील का तर्क: इन धाराओं के तहत अपराध तभी बनता है जब सार्वजनिक रूप से लोगों का समूह (Conglomeration of People) इकट्ठा हो या कोई बात सार्वजनिक मंच से कही जाए। दो लोगों के बीच फोन पर हुई व्यक्तिगत बातचीत को हेट स्पीच की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

राज्य सरकार (अभियोजन) का तर्क: सरकार ने माना कि अगर सिर्फ दो लोग आपस में बात कर रहे होते तो यह अपराध नहीं होता। लेकिन इस मामले में वह ऑडियो मैसेज व्हाट्सएप पर प्रसारित (Circulate) हो गया और समाज में फैल गया, इसलिए एफआईआर दर्ज करना पूरी तरह सही था।

हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सुप्रीम कोर्ट के नजीर का हवाला

कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले में शिकायत खुद स्वीकार करती है कि यह दो लोगों की आपसी बातचीत थी जिसे किसी तीसरे व्यक्ति ने रिकॉर्ड और लीक किया। अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘जावेद अहमद हाजम बनाम महाराष्ट्र राज्य’ का हवाला देते हुए टिप्पणी की, शिकायत खुद यह बयां करती है कि दो लोग निजी बातचीत कर रहे थे, जिसे रिकॉर्ड करके ऑडियो संदेश बना दिया गया और बाद में प्रसारित किया गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘जावेद अहमद हाजम’ मामले में प्रतिपादित कानून के अनुसार, यह कृत्य धारा 153A या 295A के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता। ऐसे मामले में पुलिस जांच की अनुमति देना सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था का उल्लंघन होगा और इससे आरोपी के साथ अन्याय होगा।

केस शीट: कर्नाटक हाई कोर्ट हेट स्पीच एवं प्राइवेसी समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
प्रासंगिक कानून धाराएंधारा 153A, 295A और 120B IPC [अब क्रमशः BNS की धारा 196, 299 और 61]
विवाद का विषयमस्जिद के पास से ‘भगवा ध्वज’ हटाने की निजी फोन कॉल योजना का लीक होना।
आधारभूत विधिक नजीरजावेद अहमद हाजम बनाम महाराष्ट्र राज्य (Supreme Court Case)
अदालत का अंतिम निर्णयप्राथमिकी (FIR) और आपराधिक कार्यवाही पूरी तरह रद्द (Quashed)।

आसान शब्दों में समझें: हेट स्पीच के लिए ‘सार्वजनिक इरादा’ (Public Intent) जरूरी

अदालत ने इस फैसले से कानून का एक बहुत बड़ा सिद्धांत साफ किया है। किसी भी बात को ‘हेट स्पीच’ या ‘धार्मिक वैमनस्य फैलाना’ तब माना जाता है जब उसे सार्वजनिक रूप से (Publicly) समाज में नफरत फैलाने के इरादे से कहा या लिखा गया हो।

यदि दो लोग बंद कमरे में या प्राइवेट फोन कॉल पर कोई आपत्तिजनक, विवादास्पद या तीखी बात करते हैं, तो वह कानूनन सही नहीं हो सकती, लेकिन वह धारा 153A या 295A का अपराध भी नहीं है।

अगर कोई तीसरा व्यक्ति उस कॉल को चुपके से टैप करता है, रिकॉर्ड करता है और समाज में तनाव फैलाने के इरादे से व्हाट्सएप ग्रुपों में वायरल कर देता है, तो मूल रूप से बात करने वाले दो लोग इसके दोषी नहीं हैं, बल्कि वह तीसरा व्यक्ति या लीक करने वाला तंत्र दोषी हो सकता है।

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