Full Court: हाई कोर्ट प्रशासन के इस प्रशासनिक फैसले के विरोध में दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) ने 14 जुलाई 2026 (मंगलवार) को पूर्ण रूप से कार्य निलंबन (Work Suspension/Abstention) किया।
हाई कोर्ट के वकीलों की आजीविका और प्रैक्टिस पर बेहद गंभीर असर
बार एसोसिएशन का दावा है कि इस ऐतिहासिक बदलाव से हाई कोर्ट के मूल दीवानी पक्ष (Original Civil Side) के लगभग 70 प्रतिशत मुकदमे जिला अदालतों में ट्रांसफर हो जाएंगे, जिससे हाई कोर्ट के वकीलों की आजीविका और प्रैक्टिस पर बेहद गंभीर असर पड़ेगा। दिल्ली हाई कोर्ट के ‘फुल कोर्ट’ (Full Court) द्वारा राजधानी की जिला अदालतों (District Courts) के आर्थिक/वित्तीय क्षेत्राधिकार (Pecuniary Jurisdiction) की सीमा को ₹2 करोड़ से बढ़ाकर सीधे ₹10 करोड़ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने के बाद, दिल्ली विधिक बिरादरी में एक बड़ा गतिरोध पैदा हो गया है।
विवाद की जड़: क्या है पूरा मामला?
दिल्ली में हाई कोर्ट और जिला अदालतों के बीच मुकदमों के बंटवारे की वित्तीय सीमा को लेकर लंबे समय से खींचतान चल रही है।
शुरुआती मांग: मई 2025 में दिल्ली की सभी जिला अदालतों की समन्वय समिति (All District Courts Bar Association) ने केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और विधि आयोग को पत्र लिखकर मांग की थी कि जिला अदालतों की वित्तीय सीमा को ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹20 करोड़ किया जाए।
जजों की समिति का गठन: इस मांग पर विचार करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने सात न्यायाधीशों की एक विशेष समिति का गठन किया। हाई कोर्ट बार (DHCBA) ने इस समिति के गठन को ही अदालत में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट की हरी झंडी: पिछले हफ्ते हाई कोर्ट की एक खंडपीठ (जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस तेजस कारिया) ने इस रिपोर्ट को फुल कोर्ट के सामने पेश करने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। इसके तुरंत बाद, हाई कोर्ट के फुल कोर्ट ने जिला अदालतों की वित्तीय सीमा को ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करने के प्रस्ताव पर अपनी प्रशासनिक मोहर लगा दी।
दोनों पक्षों के कानूनी और व्यावहारिक तर्क
इस बड़े प्रशासनिक बदलाव को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट बार और हाई कोर्ट बेंच/जिला अदालतों के बीच तर्कों का टकराव स्पष्ट है।
दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) का रुख
वकीलों की आजीविका पर संकट: डीएचसीबीए की कार्यकारी समिति (मानद सचिव विक्रम सिंह पंवार के हस्ताक्षर से जारी प्रस्ताव) के अनुसार, इस फैसले के दूरगामी और प्रतिकूल परिणाम होंगे। ₹10 करोड़ तक के मामले जिला अदालत जाने से हाई कोर्ट के ओरिजिनल साइड के 70% केस कम हो जाएंगे, जिससे बड़ी संख्या में वकीलों की प्रैक्टिस और आजीविका प्रभावित होगी।
संवैधानिकता पर सवाल: बार का तर्क है कि दिल्ली हाई कोर्ट की वित्तीय अधिकारिता ‘दिल्ली हाई कोर्ट अधिनियम, 1966’ के प्रावधानों से संचालित होती है। इसमें किसी भी प्रकार का बदलाव या संशोधन करने का विशेष अधिकार केवल संसद (Parliament) के पास है, हाई कोर्ट प्रशासनिक आदेश से ऐसा नहीं कर सकता।
दिल्ली हाई कोर्ट बेंच (जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ) का तर्क
प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतें: कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में नोट किया कि दिल्ली में अचल संपत्तियों के दाम आसमान छू रहे हैं। बेहद मामूली या मध्यम आवासीय संपत्तियों के विवाद (जैसे विभाजन, कब्जा या निषेधाज्ञा) भी आसानी से ₹2 करोड़ की सीमा को पार कर जाते हैं, जिससे छोटे मुकदमों के लिए भी पूरी दिल्ली के नागरिकों को हाई कोर्ट आना पड़ता है।
नागरिकों की सहूलियत (Access to Justice): कोर्ट ने कहा, “अदालतें नागरिकों के फायदे के लिए हैं। दिल्ली में 11 न्यायिक जिले हैं जहां पर्याप्त बुनियादी ढांचा और जिला जज मौजूद हैं। न्याय को नागरिकों के जितना संभव हो सके करीब और प्रभावी बनाना हमारा उद्देश्य होना चाहिए।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही अंतिम संशोधन संसद करे, लेकिन हाई कोर्ट को न्याय प्रशासन के हित में राय व्यक्त करने और सिफारिश करने का पूरा अधिकार है।
केस शीट: दिल्ली न्यायिक वित्तीय क्षेत्राधिकार विवाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | वर्तमान विधिक स्थिति और विवाद के मुख्य बिंदु |
| प्रस्तावित प्रशासनिक बदलाव | जिला अदालतों का वित्तीय क्षेत्राधिकार ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करना। |
| सिफारिशकर्ता संस्था | दिल्ली हाई कोर्ट का फुल कोर्ट (Full Court of Delhi HC) |
| विरोध करने वाली संस्था | दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) |
| समर्थन करने वाली संस्था | ऑल जिला कोर्ट बार एसोसिएशन की समन्वय समिति |
| प्रासंगिक कानून | दिल्ली हाई कोर्ट अधिनियम, 1966 (Delhi High Court Act, 1966) |
| बार का तात्कालिक कदम | 14 जुलाई 2026 को पूर्ण कार्य बहिष्कार; कैफेटेरिया, बार रूम सब बंद रहेंगे। |
आगे क्या होगा?: मुकदमों का बड़े पैमाने पर स्थानांतरण (Transfer of Cases)
यदि यह प्रस्ताव अंतिम रूप से लागू हो जाता है (संसदीय संशोधन या अधिसूचना के माध्यम से), तो दिल्ली की न्याय प्रणाली का ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा।
मुकदमों का ट्रांसफर: वर्तमान में हाई कोर्ट में लंबित ₹2 करोड़ से ₹10 करोड़ के बीच के सभी दीवानी सूट (Civil Suits), वाणिज्यिक विवाद (Commercial Disputes) और संपत्ति से जुड़े मामले सीधे दिल्ली की 11 जिला अदालतों (जैसे तीस हजारी, पटियाला हाउस, साकेत, द्वारका आदि) में ट्रांसफर कर दिए जाएंगे।
हाईकोर्ट पर बोझ कम: इससे हाई कोर्ट पर मुकदमों का भारी बोझ कम होगा और वह संवैधानिक व अपीलीय मामलों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेगा, लेकिन हाई कोर्ट के वकीलों का एक बड़ा वर्कलोड जिला अदालतों के वकीलों के पास चला जाएगा।

