Sources of Income: तमिलनाडु राज्य न्यायिक सेवा (Tamil Nadu State Judicial Service) में सिविल जज की भर्ती से जुड़े एक बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने चयन सूची में नाम होने के बावजूद एक वकील को जज पद पर नियुक्त न किए जाने और उनकी निजी वकालत की कमाई की दोबारा जांच करने पर मद्रास हाई कोर्ट और प्रशासन को आड़े हाथों लिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में उस वक्त सब हैरान रह गए जब जस्टिस नागरत्ना ने वकीलों की आय की व्यावहारिक स्थिति पर एक बेहद बेबाक और स्पष्ट टिप्पणी की।
सिविल जज पद के लिए पेशेवर वकील का पैमाना
शीर्ष अदालत ने कहा, एक बार जब वरिष्ठ न्यायाधीशों की चयन समिति किसी वकील को सिविल जज (Civil Judge) के पद के लिए योग्य और उपयुक्त पाकर चयन सूची में शामिल कर लेती है, तो उसके बाद उसकी कमाई या वित्तीय मामलों की दोबारा जांच (Second Scrutiny) करने का कोई कानूनी आधार नहीं रह जाता। एक वकालत कर रहे पेशेवर के रूप में किसी व्यक्ति की आय, न्यायिक सेवा के लिए उसकी उपयुक्तता तय करने का पैमाना नहीं हो सकती।
मामला क्या है?: चयन सूची में नाम, फिर भी नियुक्ति से इनकार और वित्तीय जांच
यह कानूनी विवाद तमिलनाडु के एक वकील की याचिका से जुड़ा है, जिसका चयन सिविल जज के पद पर हो चुका था।
चयन के बाद दोबारा जांच: याचिकाकर्ता वकील का नाम तमिलनाडु सिविल जज भर्ती की अंतिम चयन सूची (Selection List) में आ गया था। इसके बावजूद, मद्रास हाई कोर्ट प्रशासन ने उनकी नियमित नियुक्ति को रोक दिया और उनकी वकालत के दौरान की गई कुछ वित्तीय और अचल संपत्ति की बिक्री (Sale Transactions) के लेन-देन को लेकर आंतरिक जांच शुरू कर दी।
हाईकोर्ट की दलील: हाई कोर्ट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस. गुरुकृष्णकुमार ने दलील दी कि यह जांच मुख्य रूप से उम्मीदवार की ईमानदारी (Integrity) को परखने के लिए थी। उम्मीदवार के आपराधिक इतिहास (Criminal Antecedents) की सामान्य जांच के दौरान कुछ ऐसी वित्तीय संपत्तियों के लेन-देन सामने आए, जिनके स्रोतों (Sources of Income) पर संदेह पैदा हुआ। जब उम्मीदवार से विवरण मांगा गया, तो उनके जवाब संतोषजनक नहीं थे।
अनंतिम नियुक्ति का तर्क: प्रशासन ने यह भी कहा कि उम्मीदवार को दी गई पेशकश केवल ‘अनंतिम’ (Provisional) थी, स्थायी या नियमित नियुक्ति नहीं।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियां: न्यायाधीश बनने पर मेरी आय भी वेतन से कहीं अधिक थी
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने हाई कोर्ट द्वारा चयन प्रक्रिया खत्म होने के बाद की जा रही इस ‘दूसरी जांच’ (Second Scrutiny) की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल उठाए।
कौन सा वकील अपनी असली आय घोषित करता है?
सुनवाई के दौरान जब उम्मीदवार के टैक्स और आय के ब्योरे को लेकर दलीलें दी जा रही थीं, तो जस्टिस नागरत्ना ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा, “वास्तव में, कौन सा वकील अपने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) में अपनी वास्तविक आय का खुलासा करता है? मैं स्पष्ट रूप से पूछ रही हूं।”
निजी प्रैक्टिस और जज बनने के बाद के नियमों में अंतर
कोर्ट ने राज्य और हाई कोर्ट प्रशासन को याद दिलाया कि एक वकील जब तक स्वतंत्र प्रैक्टिस में है, वह एक निजी पेशेवर है। “एक वकील के रूप में जब वह अभ्यास कर रहा था, तब उसकी आय कैसे प्रासंगिक हो सकती है? न्यायिक सेवा में शामिल होने के बाद तो एक दोपहिया वाहन (Two-Wheeler) खरीदने के लिए भी आपको हाई कोर्ट की अनुमति लेनी पड़ती है। लेकिन जब वह एक वकील था, तो आप उसकी आय पर फैसला सुनाने वाले (Sitting in Judgment) कौन होते हैं?”
चयन समिति के फैसले पर दोबारा सवाल उठाना गलत
जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि क्या यह कृत्य वरिष्ठ न्यायाधीशों की उस मूल चयन समिति के फैसले को खारिज करने जैसा नहीं है जिसने उसे योग्य माना था? एक बार जब वरिष्ठ न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की समिति ने उसे उपयुक्त पा लिया, तो दूसरी संवीक्षा (Second Scrutiny) का सवाल ही कहां उठता है? इसका मतलब है कि आप पूर्व में तय की गई योग्यता पर खुद जज बनकर बैठ रहे हैं। जब याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने बार से बेंच में आने वाले वकीलों के त्याग और पुराने जजों का उदाहरण दिया, तो जस्टिस नागरत्ना ने अपनी व्यक्तिगत यात्रा साझा करते हुए कहा—”जब मैं जज के रूप में शामिल हुई थी, तब एक वकील के रूप में मेरी आय मिलने वाले वेतन से कहीं अधिक थी।
केस शीट: सुप्रीम कोर्ट न्यायिक भर्ती एवं वित्तीय संवीक्षा समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और कोर्ट रूम टिप्पणियां |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन |
| याचिकाकर्ता | चयनित अधिवक्ता (तमिलनाडु सिविल जज उम्मीदवार) |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या चयन के बाद उम्मीदवार की वकालत के समय की निजी आय की जांच की जा सकती है? |
| कोर्ट का प्राथमिक रुख | क्रिमिनल रिकॉर्ड छिपाने या धोखाधड़ी पर जांच सही है, लेकिन निजी आय की संवीक्षा अनुचित है। |
| मामले की स्थिति | मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित (Pending) है और अगली सुनवाइयों में इस पर विस्तृत आदेश आएगा। |
इस विधिक बहस के दूरगामी निहितार्थ
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि अगर इस तरह हर न्यायिक अधिकारी के पुराने वित्तीय लेन-देन और वकालत की आय की बाल की खाल निकाली जाने लगी, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।
कोर्ट का सवाल: “क्या आप भविष्य में हर न्यायिक अधिकारी से उनके पुराने लेन-देन के बारे में पूछताछ करने जा रहे हैं? एक बार नियुक्त होने के बाद वे नियमबद्ध हो जाते हैं, लेकिन उससे पहले की उनकी निजी प्रैक्टिस की कमाई को जजशिप रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता।”
अदालत ने साफ किया कि यदि किसी उम्मीदवार ने अपना कोई अपराधिक इतिहास (Criminal Antecedents) छुपाया हो या चयन प्रक्रिया में कोई बड़ी धोखाधड़ी (Suppression of Facts) की हो, तो उसकी नियुक्ति को निश्चित रूप से रद्द किया जा सकता है। लेकिन, एक स्वतंत्र वकील के रूप में उसने कितना कमाया या उसके संपत्ति सौदे क्या थे, इसे योग्यता का पुनर्मूल्यांकन करने का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।

