Cross-examination: विदेशी वकीलों के भारत में प्रैक्टिस करने के अधिकार क्षेत्र को लेकर केरल हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट विधिक फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस मोहम्मद नियास सी.पी. की एकल पीठ ने ‘शेयरस्टेट्स, इंक बनाम प्रसाद चोराकूझियिल गोपालन और अन्य’ (Sharestates, Inc v Prasad Choorakuzhiyil Gopalan & ors) मामले की सुनवाई करते हुए साफ किया कि विदेशी वकील भारतीय कोर्ट कमिश्नर के सामने गवाहों की मुख्य परीक्षा (Examination-in-chief) या प्रति-परीक्षा (Cross-examination) नहीं कर सकते। हालांकि, अदालत ने उन्हें कार्यवाही में उपस्थित रहने और उसे केवल देखने (Observe) की अनुमति दी है।
यह रही हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा, किसी भी भारतीय अदालत द्वारा नियुक्त एडवोकेट कमिश्नर (Advocate Commissioner) के समक्ष गवाहों के बयान दर्ज करना या उनसे जिरह (Cross-examination) करना न्यायिक प्रक्रिया और मुकदमेबाजी (Litigation) का ही एक हिस्सा है। भारत के क्षेत्र में केवल वही वकील गवाहों की जांच या जिरह कर सकते हैं जो ‘अधिवक्ता अधिनियम, 1961’ के तहत भारत में कानून का अभ्यास (Practice Law) करने के पात्र हैं। विदेशी वकीलों को इसकी अनुमति देना देश के संप्रभु कानूनी ढांचे का उल्लंघन होगा।
मामला क्या है?: अमेरिकी कोर्ट का अनुरोध और केरल में गवाही का पेंच
यह पूरा मामला अंतरराष्ट्रीय कानूनी सहयोग और हेग कन्वेंशन (Hague Convention) से जुड़ा हुआ है।
अमेरिकी कंपनी की याचिका: ‘शेयरस्टेट्स इंक’ (Sharestates Inc) नामक एक अमेरिकी कंपनी ने अमेरिका की एक जिला अदालत द्वारा जारी ‘लेटर ऑफ रिक्वेस्ट’ (Letter of Request) के निष्पादन के लिए केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। अमेरिका में चल रहे एक सिविल सूट के लिए केरल हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में रहने वाले एक भारतीय गवाह के मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य (Evidence) दर्ज किए जाने थे।
कमिश्नर की नियुक्ति: केरल हाई कोर्ट ने गवाह के बयान दर्ज करने के लिए एक ‘एडवोकेट कमिश्नर’ (M Shajna) की नियुक्ति कर दी।
विदेशी वकीलों की मांग: इस पर मामले के प्रतिवादियों (जो अमेरिका में चल रहे मुकदमे में प्रतिवादी हैं) ने कोर्ट से गुहार लगाई कि अमेरिका में उनके मुकदमों की पैरवी कर रहे अमेरिकी वकीलों (US Counsel) को भारत आकर कोर्ट कमिश्नर के सामने इस भारतीय गवाह से जिरह करने की अनुमति दी जाए।
विरोध: याचिकाकर्ता कंपनी ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह विदेशी वकीलों को पिछले दरवाजे से भारत में ‘लॉ प्रैक्टिस’ करने की अनुमति देने जैसा होगा, जो कि गैर-कानूनी है।
हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या: कोर्ट कमिश्नर अदालत का ही ‘विस्तारित हाथ’ है
जस्टिस मोहम्मद नियास सी.पी. ने हेग कन्वेंशन, सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का गहन विश्लेषण करने के बाद निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक बिंदु तय किए।
हेग कन्वेंशन और भारतीय कानून की अनुकूलता
अदालत ने कहा कि हालांकि हेग कन्वेंशन का अनुच्छेद 9 विदेशी अदालतों को साक्ष्य दर्ज करने के लिए किसी विशेष प्रक्रिया का अनुरोध करने की अनुमति देता है, लेकिन वह प्रक्रिया तभी अपनाई जा सकती है जब वह उस देश के कानून के अनुकूल (Compatible) हो जहां साक्ष्य दर्ज किए जा रहे हैं। खुद अमेरिकी अदालत के ‘लेटर ऑफ रिक्वेस्ट’ में लिखा था कि यह परीक्षा तब तक अमेरिकी नियमों के तहत होगी जब तक वह भारतीय कानून के विपरीत न हो।
सुप्रीम कोर्ट का ‘ए.के. बालाजी’ फैसला और BCI नियम 2022
केरल हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम ए.के. बालाजी और बीसीआई के ‘विदेशी वकीलों के पंजीकरण और विनियमन नियम, 2022’ का हवाला दिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि विदेशी वकीलों को भारत में केवल सीमित गैर-मुकदमेबाजी क्षेत्रों (Non-litigious areas) में ही काम करने की अनुमति है, जैसे विदेशी कानून पर सलाह देना या कुछ अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता (Arbitration) में भाग लेना। बीसीआई के नियम स्पष्ट रूप से विदेशी वकीलों को किसी भी ऐसी अदालत, न्यायाधिकरण या प्राधिकारी के समक्ष पेश होने से प्रतिबंधित करते हैं जो शपथ पर साक्ष्य (Evidence on oath) दर्ज करने के लिए अधिकृत हैं।
कोर्ट कमिश्नर ‘अदालत की आंख और कान’ है
अदालत ने प्रतिवादियों के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि कमिश्नर के सामने गवाही दर्ज करना कोई अदालती कार्यवाही नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया, “सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XXVI के तहत अदालत द्वारा नियुक्त कमिश्नर के समक्ष साक्ष्य दर्ज करना पूरी तरह से न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। कमिश्नर अदालत की आंख और कान के रूप में कार्य करता है और साक्ष्य दर्ज करते समय वह अदालत के एक ‘विस्तारित हाथ’ (Extended arm) के रूप में काम करता है। चूंकि कमिश्नर की रिपोर्ट न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनती है, इसलिए उसके सामने होने वाली जिरह को गैर-मुकदमेबाजी वाला कानूनी काम नहीं माना जा सकता।”
केस शीट: केरल हाई कोर्ट विदेशी वकील क्षेत्राधिकार समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और मुख्य बिंदु |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस मोहम्मद नियास सी.पी. |
| मुख्य पक्षकार | शेयरस्टेट्स, इंक बनाम प्रसाद चोराकूझियिल गोपालन व अन्य |
| प्रासंगिक अंतरराष्ट्रीय संधि | हेग कन्वेंशन (सिविल या वाणिज्यिक मामलों में विदेश में साक्ष्य लेना) |
| लागू घरेलू नियम | बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) विदेशी वकील नियम, 2022 |
| अदालत का अंतिम निर्णय | विदेशी वकीलों द्वारा जिरह पर पूर्ण रोक; केवल मूक दर्शक (Observer) के रूप में रहने की अनुमति। |
| अगली तिथि | मामले को आगे के विचार के लिए 13 अगस्त 2026 को सूचीबद्ध किया गया है। |

