Mental Trauma: साल 2014 में स्कूल के भीतर महज 6 साल की मासूम बच्ची के साथ हुए बलात्कार के मामले में 12 साल बाद भी ट्रायल (मुकदमा) पूरा न होने पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने गहरी नाराजगी और हैरानी व्यक्त की है।
अत्यधिक देरी को एक ‘विचलित करने वाली त्रासदी’ करार दिया: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने इस अत्यधिक देरी को एक ‘विचलित करने वाली त्रासदी’ करार दिया। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि ऐसे जघन्य मामलों में न्याय में देरी महज एक प्रक्रियात्मक चूक नहीं, बल्कि एक निरंतर जारी रहने वाला अन्याय है। इसके साथ ही, कोर्ट ने मैजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज होने वाले धारा 164 के बयानों पर हस्ताक्षर की अनिवार्यता को लेकर भी एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की।
यह रही हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा, “यौन उत्पीड़न की पीड़ा झेलने वाली किसी मासूम बच्ची को केवल इसलिए अपने मानसिक आघात (Trauma) को अंतहीन रूप से दोबारा जीने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता क्योंकि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली ने ‘तारीख-पर-तारीख’ (Adjournments) की संस्कृति के आगे घुटने टेक दिए हैं। इस तरह के संवेदनशील मामलों में हर गैर-जरूरी स्थगन (Adjournment) उस मूल घाव को और गहरा करता है और पूरी कानूनी प्रक्रिया को ही उत्पीड़न का एक जरिया बना देता है।”
मामला क्या है?: स्कूल में मासूम से रेप और 12 साल का लंबा इंतजार
यह मामला साल 2014 का है, जब एक स्कूल परिसर के भीतर छह वर्ष की एक बच्ची के साथ दरिंदगी की गई थी। इस मामले में पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।
पिता की चिंता: ट्रायल के दौरान यह बात सामने आई कि जांच के समय पीड़ित बच्ची ने मैजिस्ट्रेट के सामने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 164 के तहत जो बयान दर्ज कराया था, उस पर न तो बच्ची के और न ही संबंधित मैजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर (Signatures) थे।
मैजिस्ट्रेट को बुलाने की मांग: पीड़ित बच्ची के पिता को यह डर सता रहा था कि भविष्य में आरोपी पक्ष हस्ताक्षरों की कमी का फायदा उठाकर इस मुख्य बयान को झूठा या अमान्य साबित करने की कोशिश कर सकता है। इसलिए उन्होंने ट्रायल कोर्ट से उस मैजिस्ट्रेट को गवाह के तौर पर समन करने (बुलाने) की मांग की, जिन्होंने बयान दर्ज किया था। ट्रायल कोर्ट द्वारा यह मांग खारिज किए जाने के बाद पिता ने हाई कोर्ट का रुख किया था।
हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या: क्या धारा 164 के बयान पर हस्ताक्षर जरूरी हैं?
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने पीड़ित पिता की याचिका को बंद करते हुए दो बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट किया।
पॉक्सो एक्ट में पीड़ित बच्चे के हस्ताक्षर अनिवार्य नहीं
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनन ऐसे संवेदनशील मामलों में बच्चे के हस्ताक्षर लेना अनिवार्य नहीं है। पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की वैधानिक रूपरेखा और संहिता की धारा 164 के तहत, किसी पीड़ित बच्चे के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह धारा 164 के तहत दर्ज अपने बयान पर हस्ताक्षर करे। ठीक इसी तरह, मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर का न होना भी इस दर्ज बयान की वैधता को खारिज करने की कोई अपरिहार्य शर्त नहीं है।
मजिस्ट्रेट को रूटीन तौर पर गवाह के रूप में नहीं बुलाया जा सकता
अदालत ने साफ किया कि न्यायिक अधिकारियों को छोटी-मोटी तकनीकी शंकाओं को दूर करने के लिए अदालत में नहीं घसीटा जा सकता। केवल इसलिए कि किसी पक्ष को बयान की प्रामाणिकता को लेकर कोई काल्पनिक डर (Speculative Apprehension) है, मैजिस्ट्रेट को समन नहीं किया जा सकता। धारा 164 के तहत बयान दर्ज करने के न्यायिक कार्य को नियमितता और शुद्धता की कानूनी मान्यता (Presumption of Regularity) प्राप्त होती है। न्यायिक अधिकारियों को रूटीन तौर पर विटनेस बॉक्स (गवाह कटघरे) में आने के लिए मजबूर करके इन कार्यवाहियों की पवित्रता को हल्का नहीं किया जा सकता।
केस शीट: कर्नाटक हाई कोर्ट पॉक्सो ट्रायल एवं प्रक्रियात्मक निष्पक्षता समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और कड़े निर्देश |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एम. नागप्रसन्ना |
| घटना का वर्ष | साल 2014 (स्कूल में 6 वर्षीय बच्ची से बलात्कार का मामला) |
| प्रासंगिक धाराएं | पॉक्सो अधिनियम, 2012 और CrPC/BNSS की धारा 164 |
| याचिकाकर्ता के वकील | अधिवक्ता स्फूर्ति कोथा और हरि ओम तिवारी |
| अदालत का अंतिम निर्देश | मुकदमे को हर हाल में 8 सप्ताह के भीतर पूरा करने का अनिवार्य आदेश। |
तारीख संस्कृति पर कोर्ट का चाबुक और समय सीमा
हाई कोर्ट ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि न्यायपालिका में स्थगन (Adjournments) जो कि एक अपवाद (Exception) होना चाहिए था, वह अब एक नियम (Rule) बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा कि यांत्रिक रूप से तारीखें देना वास्तव में न्याय के हनन का एक मूक साथी (Silent Accomplice) बन जाता है।
8 सप्ताह का कड़ा अल्टीमेटम: हाई कोर्ट ने निचली अदालत (Trial Court) को आदेश की प्रति मिलने के आठ सप्ताह के भीतर इस पूरे मुकदमे की सुनवाई पूरी कर अंतिम फैसला सुनाने का सख्त निर्देश दिया है।
यह समय सीमा बाध्यकारी है: कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा, “यह समय सीमा केवल एक आकांक्षा (Aspirational) या कागजी निर्देश नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से बाध्यकारी (Obligatory) है और इसका पालन इसके अक्षरशः और मूल भावना के साथ किया जाना चाहिए।

