Divorce Case: वैवाहिक विवादों में पतियों द्वारा अपनी वास्तविक वित्तीय स्थिति छुपाने और गुजारा भत्ता देने में आनाकानी करने के रवैये पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बेहद कड़ा और तार्किक फैसला सुनाया है।
12 वर्ष के बच्चे के लिए 20 हजार रुपए की राशि बहुत ज्यादा अधिक नहीं
हाईकोर्ट के जस्टिस जयंत बनर्जी और जस्टिस टी.एम. नदाफ की खंडपीठ ने न केवल पति की तलाक (Divorce) की याचिका को खारिज कर दिया, बल्कि ₹20,000 मासिक भरण-पोषण के आदेश को पूरी तरह जायज ठहराया। जो व्यक्ति खुद मर्सिडीज-बेंज (Mercedes-Benz) जैसी लग्जरी कार की किस्तें चुका रहा हो और उसे मेंटेन कर रहा हो, वह अदालत में यह दलील बिल्कुल नहीं दे सकता कि उसकी पत्नी और 12 साल के बच्चे के लिए ₹20,000 प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) बहुत ज्यादा या अत्यधिक है।
मामला क्या है?: क्रूरता का झूठा आरोप और मर्सिडीज का खुलासा
यह कानूनी विवाद बेंगलुरु के एक दंपति से जुड़ा हुआ है, जिनकी शादी साल 2009 में हुई थी और उनका एक 12 साल का बेटा है।
पति का दावा: पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर पत्नी पर क्रूरता (Cruelty) और परित्याग (Desertion) का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की थी। उसका कहना था कि पत्नी बिना किसी ठोस वजह के उसका घर छोड़कर अलग रह रही है।
पत्नी का पलटवार: पत्नी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अदालत को बताया कि पति ने उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया है। इसके अलावा, पत्नी ने पति के किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंधों (Extramarital Relationship) का आरोप लगाया और सबूत के तौर पर 14 महत्वपूर्ण दस्तावेज और तस्वीरें अदालत के सामने पेश कीं।
पारिवारिक न्यायालय का रुख: फैमिली कोर्ट ने पाया कि तस्वीरों में पति एक अन्य महिला और बच्चे के साथ पारिवारिक कार्यक्रमों और जन्मदिन मनाते हुए साफ दिख रहा है। कोर्ट में जिरह के दौरान पहले तो पति ने महिला को जानने की बात कबूली, लेकिन बाद में मुकर गया। फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी और ₹20,000 महीना गुजारा भत्ता तय किया था। पति ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: गलती करने वाले को इनाम नहीं दे सकते
जस्टिस जयंत बनर्जी और जस्टिस टी.एम. नदाफ की बेंच ने पति की अपीलों पर सुनवाई करते हुए उसकी दोनों दलीलों (तलाक और भरण-पोषण में कमी) को पूरी तरह खारिज कर दिया।
क्रूरता साबित करने में पूरी तरह नाकाम: हाई कोर्ट ने नोट किया कि पति ने अपनी पत्नी के खिलाफ क्रूरता साबित करने के लिए सिर्फ दो दस्तावेज— एक शादी का कार्ड और एक तस्वीर पेश की, जो कि कानूनी तौर पर बेहद कमजोर थे। कोर्ट ने कहा कि वह “पत्नी के खिलाफ क्रूरता के आरोपों को साबित करने में बुरी तरह विफल रहा।”
अलग रहने की वाजिब वजह: कोर्ट ने माना कि पति के विवाहेतर संबंधों के कारण पत्नी के पास अलग रहने का वैध और उचित कारण (Reasonable Cause) था। अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया, ऐसी परिस्थितियों में पति को तलाक की राहत देना ‘गलती करने वाले को इनाम देने’ (Rewarding premium to the wrong doer) जैसा होगा, जो कि कानून की मंशा कतई नहीं है।”
मर्सिडीज का गणित: पति ने रिट याचिका में तर्क दिया था कि ₹20,000 की राशि बहुत ज्यादा है। हालांकि, जिरह के दौरान उसने खुद कबूल किया था कि उसके पास एक मर्सिडीज-बेंज कार है, जिसकी वह किस्तें (EMI) भर रहा है। इस पर हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जो मर्सिडीज मेंटेन कर सकता है, उसके लिए अपने ही बच्चे और पत्नी को ₹20,000 देना किसी भी तरह से अत्यधिक नहीं कहा जा सकता।
अदालत का अंतिम आदेश
उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के फैसले में किसी भी तरह के हस्तक्षेप से इनकार करते हुए निर्देश दिए।
तलाक की अपील खारिज: पति की तलाक की याचिका और अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया है।
भरण-पोषण बरकरार: ₹20,000 प्रति माह के अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को बहाल रखा गया है।
वसूली की छूट: हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट को मुख्य भरण-पोषण मामले को जल्द से जल्द निपटाने का निर्देश दिया और स्पष्ट किया कि यदि पति पैसे देने में कोताही बरतता है, तो पत्नी उसके खिलाफ एग्जीक्यूशन प्रोसीडिंग्स (Execution Proceedings – डिक्री का निष्पादन) शुरू कर सकती है।
विधिक केस शीट: कर्नाटक हाई कोर्ट लाइफस्टाइल बनाम भरण-पोषण समीक्षा
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय, बेंगलुरु |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जयंत बनर्जी और जस्टिस टी.एम. नदाफ |
| मुख्य कानूनी विसंगति | मर्सिडीज कार मालिक द्वारा ₹20,000 के भरण-पोषण को अत्यधिक बताना |
| पत्नी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य | 14 दस्तावेज और तस्वीरें (विवाहेतर संबंध साबित करने के लिए) |
| न्यायालय का विधिक निष्कर्ष | जीवनसाथी की जीवनशैली (Lifestyle) के आधार पर भरण-पोषण की तर्कसंगतता तय होगी |
| अंतिम विधिक परिणाम | तलाक की याचिका खारिज; गुजारा भत्ता आदेश पूरी तरह बरकरार |
अदालत ने बहुत ही व्यावहारिक विधिक सिद्धांत को दोहराया है— भरण-पोषण की राशि हमेशा पति के वास्तविक जीवन स्तर (Standard of Living) और उसकी खर्च करने की क्षमता के अनुपात में होनी चाहिए। खुद मर्सिडीज की ईएमआई भरना और परिवार को ₹20,000 के लिए तरसाना किसी भी सभ्य समाज और विधिक प्रणाली में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

