Determined Intent: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालत द्वारा आरोपी को दी गई 10 साल की सजा को आधा (5 वर्ष) कर दिया है।
दुष्कर्म और दुष्कर्म के प्रयास के बीच कथित अंतर को विस्तार से समझाया
हाईकोर्ट के जस्टिस संजय परिहार की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि आरोपी का यह घिनौना कृत्य दुष्कर्म करने के उसके पक्के इरादे (Determined Intent) को दर्शाता है, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट में पेनेट्रेशन की पुष्टि न होने के कारण उसे मूल धारा के बजाय प्रयास की विधिक धारा के तहत ही सजा दी जा सकती है। अदालत ने कहा, यदि कोई आरोपी किसी पीड़िता की जांघों के बीच अपने गुप्तांग को रगड़ता है जिसके परिणामस्वरूप वीर्यपात (Ejaculation) भी हो जाता है, लेकिन अगर चिकित्सकीय रूप से कोई ‘पेनेट्रेशन’ (प्रवेश) साबित नहीं होता है, तो इसे कानूनन दुष्कर्म (Rape) का पूरा हुआ अपराध नहीं माना जा सकता। यह कृत्य आईपीसी/आरपीसी के तहत ‘दुष्कर्म के प्रयास’ (Attempt to Rape) की श्रेणी में आएगा।
मामला क्या है?: 2016 की घटना और मेडिकल रिपोर्ट का पेंच
यह मामला जुलाई 2016 का है, जब हंदवाड़ा (Handwara) इलाके में एक नाबालिग पीड़िता अपने खेत में सिंचाई के लिए गई थी।
क्या थे आरोप: आरोपी शौकत अहमद सीर ने कथित तौर पर नाबालिग लड़की को जान से मारने की धमकी दी और जबरन पास के एक जंगल में ले गया। वहां उसने पीड़िता के कपड़े फाड़ दिए और उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। पीड़िता की मां ने चीख-पुकार सुनकर मौके पर पहुंचकर आरोपी को भागते हुए देखा था। हंदवाड़ा की निचली अदालत ने आरोपी को रणबीर दंड संहिता (RPC) की धारा 376 के तहत 10 साल की कड़ी कैद और ₹50,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी।
मेडिकल साक्ष्य (Medical Evidence): अपील के दौरान आरोपी के वकील ने मेडिकल रिपोर्ट को मुख्य आधार बनाया। पीड़िता की जांच करने वाले डॉक्टर ने स्पष्ट राय दी थी कि लड़की के साथ ‘सम्भोग’ (Coitus) नहीं हुआ था; उसका हाइमन (Hymen) सुरक्षित था। हालांकि, पीड़िता के पेरिनेम (Perineum – योनि और गुदा के बीच का हिस्सा) पर एक गहरा जख्म (Laceration) पाया गया था।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: ‘तैयारी’ और ‘प्रयास’ में अंतर
जस्टिस संजय परिहार ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘मदन लाल बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य’ का हवाला देते हुए ‘महिला की लज्जा भंग करने’ (Section 354) और ‘दुष्कर्म के प्रयास’ (Section 376/511) के बीच के बारीक विधिक अंतर को स्पष्ट किया।
तथ्यों से निष्कर्ष: कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने खुद को निर्वस्त्र किया, पीड़िता के कपड़े फाड़े और जांघों के बीच गुप्तांग को रगड़ा जिसके बाद वीर्यपात हुआ। यह केवल लज्जा भंग करने का साधारण मामला नहीं है, बल्कि आरोपी ‘तैयारी की सीमा’ को लांघकर ‘अपराध के प्रयास’ के अंतिम चरण तक पहुंच चुका था।
पेनेट्रेशन का अभाव: अदालत ने माना कि पीड़िता की कम उम्र को देखते हुए या संभावित परिणामों के डर से आरोपी ने पेनेट्रेशन नहीं किया या नहीं कर पाया, जिसके कारण पेरिनेम पर चोट आई। चूंकि दुष्कर्म के कानून में पेनेट्रेशन सबसे अनिवार्य विधिक तत्व है, इसलिए पुख्ता सबूत न होने के कारण दुष्कर्म का मूल अपराध (Completed Offence) सिद्ध नहीं माना जा सकता।
निचली अदालत की गलती: हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों और मेडिकल रिपोर्ट का सही मूल्यांकन नहीं किया और आरोपी को सीधे दुष्कर्म का दोषी मानकर गलती की।
सजा में संशोधन और अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने हंदवाड़ा कोर्ट के फैसले में संशोधन करते हुए निम्नलिखित आदेश पारित किया।
धारा में बदलाव: आरोपी शौकत अहमद सीर की सजा को आरपीसी की धारा 376 से बदलकर धारा 376 सहपठित धारा 511 (दुष्कर्म का प्रयास) के तहत तब्दील किया गया।
सजा में कटौती: घटना के समय आरोपी की उम्र और उसके द्वारा हिरासत में बिताए जा चुके समय को ध्यान में रखते हुए, उसकी 10 साल की जेल की सजा को घटाकर 5 वर्ष की सश्रम कैद कर दिया गया।
जुर्माना: कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा लगाए गए ₹50,000 के जुर्माने को भी घटाकर ₹10,000 कर दिया है।
विधिक केस शीट: जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट यौन अपराध समीक्षा
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस संजय परिहार (Justice Sanjay Parihar) |
| दोषी (Appellant) | शौकत अहमद सीर (Showkat Ahmad Seer) |
| मूल विधिक संहिता | रणबीर दंड संहिता (RPC) – [जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटने से पूर्व लागू] |
| बदली गई धाराएं | धारा 376 RPC (दुष्कर्म) से बदलकर धारा 376/511 RPC (प्रयास) की गई |
| संशोधित सजा | 5 वर्ष की कैद और ₹10,000 का जुर्माना |
हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पेनेट्रेशन के बिना किसी भी मामले को ‘दुष्कर्म’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हालांकि, अदालत ने आरोपी को कोई ढील नहीं दी; बल्कि उसके कृत्य को ‘गंभीर प्रयास’ मानते हुए 5 साल की जेल तय की है, जो यह संदेश देती है कि कानून की तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर अपराधी पूरी तरह बच नहीं सकते।

