Wednesday, September 2, 2026
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Sexual Assault: थैंक यू बोल दिया तो… यौन उत्पीड़न का अपराध क्या कम होगा, झंडोत्तोलन के बाद लौट रही छात्रा संग ड्राइवर का घिनौना अपराध पढ़ें

Sexual Assault: बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों में पीड़ित के मानसिक सदमे और उनके व्यवहार को समझने की दिशा में सिक्किम हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

पॉक्सो एक्ट के दोषी की सजा रखी बरकरार

हाईकोर्ट के जस्टिस भास्कर राज प्रधान की एकल पीठ ने एक टैक्सी ड्राइवर की याचिका को खारिज करते हुए, पोक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत उसकी दोषसिद्धि और 5 साल की जेल की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है। कहा, यौन उत्पीड़न जैसी दर्दनाक और भयानक स्थिति पर हर बच्चे की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है। कोई बच्चा शोर मचा सकता है, तो कोई सदमे (Shock) के कारण पूरी तरह खामोश हो सकता है। किसी 13 साल की बच्ची द्वारा टैक्सी से उतरते समय शिष्टाचार में ‘थैंक यू’ (Thank You) कह देने को यह साबित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता कि उसके साथ कोई गलत हरकत नहीं हुई थी। बच्चों के व्यवहार को वयस्कों के नजरिए से नहीं आंका जा सकता।

मामला क्या है?: टैक्सी यात्रा के दौरान हुआ उत्पीड़न

यह मामला स्वतंत्रता दिवस (Independence Day) की रिहर्सल से घर लौट रही एक 13 वर्षीय स्कूली छात्रा के साथ हुई दरिंदगी से जुड़ा है।

घटना: छात्रा स्कूल से लौटते समय एक शेयरिंग टैक्सी में सवार हुई थी। जब रास्ते में अन्य सभी यात्री उतर गए, तो ड्राइवर ने बच्ची को जबरन आगे की सीट पर बैठने को कहा। इसके बाद ड्राइवर ने उसके करीब आकर उसकी शर्ट के बटन और उसके स्तनों (Breasts) को गलत नीयत से छुआ।

पीड़िता की बहादुरी: बच्ची ने तुरंत ड्राइवर को पीछे धकेला और उसे जल्दी घर छोड़ने को कहा। टैक्सी से उतरते ही उसने अपनी मां को पूरी बात बताई।

आरोपी का पीछा: मां ने तुरंत फैसला लेते हुए एक दूसरी गाड़ी से उस टैक्सी का पीछा किया और ट्रैफिक जाम में ड्राइवर को पकड़ लिया। मां ने बहस के दौरान उसकी टैक्सी की चाबी तक निकाल ली थी, लेकिन आरोपी चाबी वापस छीनकर वहां से भाग खड़ा हुआ। बाद में पीड़िता के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

निचली अदालत का फैसला: ट्रायल कोर्ट ने आरोपी ड्राइवर को पोक्सो अधिनियम (POCSO Act) के तहत ‘गंभीर यौन उत्पीड़न’ (Aggravated Sexual Assault) का दोषी मानते हुए 5 वर्ष के कठोर कारावास और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

सिक्किम हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: थैंक यू बनाम पोक्सो की धारा 29

बचाव पक्ष की वकील नेहा गुप्ता ने अदालत में यह दलील दी थी कि यदि लड़की के साथ ऐसा कोई वाकया हुआ होता, तो वह टैक्सी से उतरते समय ड्राइवर को शिष्टाचार वश “थैंक यू” नहीं कहती। कोर्ट ने इस कुतर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।

बच्चों का मनोविज्ञान अलग: जस्टिस भास्कर राज प्रधान ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा, 13 वर्ष का बच्चा ऐसी घटना पर कैसी प्रतिक्रिया देगा, यह हर बच्चे पर निर्भर करता है। एक बच्चा इस पर आसमान सिर पर उठा सकता है, वहीं दूसरा बच्चा इस घटना से इतना स्तब्ध (Stunned) हो सकता है कि वह चुप रहना चुन ले। तीसरा बच्चा उसी परिस्थिति में ऐसा व्यवहार कर सकता है जो हमारे वयस्कों के नजरिए से शायद उपयुक्त न लगे। इसलिए ‘थैंक यू’ कहने पर जरूरत से ज्यादा जोर देकर बच्ची के बयानों की सत्यता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

पॉक्सो एक्ट की धारा 29 (Presumption of Guilt): कोर्ट ने याद दिलाया कि पोक्सो कानून की धारा 29 के तहत, एक बार जब अभियोजन प्राथमिक तौर पर मामला साबित कर देता है, तो यह मान लिया जाता है कि आरोपी ने अपराध किया है (जब तक कि वह खुद को बेगुनाह साबित न कर दे)। बचाव पक्ष केवल पीड़िता के बयानों में थोड़ा संदेह पैदा करके बरी नहीं हो सकता, उसे अपनी बेगुनाही का पुख्ता सबूत देना होगा।

‘स्टर्लिंग विटनेस’ (Sterling Witness) का दर्जा: हाई कोर्ट ने माना कि आक्रामक जिरह (Cross-examination) के बावजूद 13 वर्षीय पीड़िता अपने बयानों पर पूरी तरह अडिग रही। उसकी गवाही एक ‘अचूक गवाह’ की तरह थी। अदालत ने कहा कि कोई भी 13 साल की बच्ची बिना किसी वजह के किसी निर्दोष ड्राइवर पर इतना घिनौना आरोप नहीं लगाएगी और न ही शाम को अपनी मां के साथ उसकी गाड़ी का पीछा करेगी।

कोर्ट का अंतिम आदेश: न्यूनतम सजा और भारी मुआवजा बरकरार

अपर लोक अभियोजक (Additional Public Prosecutor) यादव शर्मा की दलीलों को स्वीकार करते हुए सिक्किम उच्च न्यायालय ने टैक्सी ड्राइवर की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया।

दोषसिद्धि बरकरार: कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी संदेह के मामले को साबित किया है।

न्यूनतम सजा: अदालत ने नोट किया कि पोक्सो अधिनियम के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न (Aggravated Sexual Assault) के लिए 5 साल की कैद कानूनन न्यूनतम सजा है, इसलिए इसमें कोई कटौती नहीं की जा सकती।

₹50,000 का मुआवजा: हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा पीड़िता को दिए जाने वाले 50,000 रुपये के वित्तीय मुआवजे के आदेश को भी सही ठहराया।

विधिक केस शीट: सिक्किम हाई कोर्ट बनाम पोक्सो यौन उत्पीड़न वाद (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतसिक्किम उच्च न्यायालय, गंगटोक
माननीय न्यायाधीशजस्टिस भास्कर राज प्रधान
मुख्य कानूनी सिद्धांतपीड़ित बच्चे की प्रतिक्रिया को वयस्कों के नजरिए से नहीं मापा जा सकता
पीड़िता की विधिक स्थिति‘स्टर्लिंग विटनेस’ (अचूक गवाह) जिसके बयानों को झुठलाया नहीं जा सकता
संबद्ध कानूनी धारापोक्सो अधिनियम की धारा 29 (आरोपी पर बेगुनाही साबित करने का भार)
अंतिम विधिक सजा5 वर्ष का कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) और ₹50,000 मुआवजा

जस्टिस भास्कर राज प्रधान ने इस फैसले के जरिए यह साफ कर दिया है कि एक 13 साल की बच्ची से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह हमले के तुरंत बाद एक परिपक्व वयस्क की तरह कानूनी साक्ष्य जुटाने या विरोध प्रदर्शन करने की मानसिक स्थिति में होगी। ‘थैंक यू’ जैसे सामाजिक शिष्टाचार के शब्दों के पीछे छिपे हुए बाल सुलभ डर और स्तब्धता को कोर्ट ने बखूबी समझा है। यह फैसला पोक्सो मामलों में बच्चों की गवाही को और अधिक मजबूती और संवेदनशीलता प्रदान करेगा।

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