Tuesday, October 27, 2026
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BCI Recognising College: गैरेज में चलने वाले कॉलेजों को मान्यता दे रहा BCI, दोषियों को बना रहा वकील…सुप्रीम कोर्ट की सख्त फटकार

BCI Recognising College: एडवोकेट के रूप में नामांकन (Enrolment) के नियमों और वकालत के पेशे के गिरते स्तर पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को तीखी फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी मौखिक टिप्पणियां की हैं।

हमें बड़ी-बड़ी बातें न बताएं, तुरंत कोर्ट से बाहर जाएं, वरना बड़ी मुसीबत में पड़ जाएंगे: अदालत

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस आर. महादेवन की तीन-सदस्यीय पीठ एक 50 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) के. आर. सुदर्शन की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्हें आपराधिक मामला लंबित होने के कारण वकील के रूप में नामांकित करने से मना कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की सबसे बड़ी समस्या और चिंता यह है कि वह ‘गैरेज’ से चलने वाले लॉ कॉलेजों को धड़ल्ले से मान्यता दे रहा है। देशभर में दोषियों (Convicts) को दाएं-बाएं वकीलों के रूप में नामांकित (Enroll) किया जा रहा है, और जहां केवल एक आपराधिक मामला लंबित है, वहां आप किसी के जीवन-यापन के अधिकार को रोक रहे हैं। हमें बड़ी-बड़ी बातें न बताएं, तुरंत कोर्ट से बाहर जाएं, वरना बड़ी मुसीबत में पड़ जाएंगे।

मामला क्या है?: CA की कानून की डिग्री और मद्रास हाई कोर्ट का आदेश

याचिकाकर्ता की स्थिति: 50 वर्षीय के. आर. सुदर्शन एक पेशेवर चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) हैं। उन्होंने हाल ही में अपनी एलएलबी (LL.B) पूरी की। जब उन्होंने वकील के रूप में प्रैक्टिस करने के लिए बार काउंसिल ऑफ तमिल नाडु एंड पुडुचेरी में आवेदन किया, तो उनका आवेदन खारिज कर दिया गया।

अस्वीकृति का कारण: उनके खिलाफ एक आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी (Cheating) का मामला लंबित है। यह मामला उनके सीए (CA) पेशे से जुड़ा है, जहां उन पर वित्तीय अनियमितताओं में शामिल एक कंपनी को सलाह देने का आरोप है।

कानूनी आधार (मद्रास हाई कोर्ट का 2015 का आदेश): बार काउंसिल ने मद्रास हाई कोर्ट के 2015 के एक आदेश (जिसे बाद में फुल बेंच ने बरकरार रखा था) का हवाला दिया। हाई कोर्ट ने अंतरिम उपाय के रूप में निर्देश दिया था कि जब तक संसद कानून में संशोधन नहीं करती, तब तक लंबित आपराधिक मुकदमों वाले कानून स्नातकों का नामांकन न किया जाए।

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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और वकीलों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता निखिल गोयल ने कोर्ट के समक्ष दो बेहद महत्वपूर्ण और चौंकाने वाले तथ्य रखे।

राजीव गांधी हत्याकांड के दोषी का नामांकन (Proportionality Argument)

अधिवक्ता गोयल ने बार काउंसिल के दोहरे रवैये (Double Standards) को उजागर करते हुए कहा, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के एक दोषी, जिसने 31 साल की सजा काटी है, उसे बार काउंसिल ने अप्रैल में ही (2026 में) एक वकील के रूप में नामांकित किया है। दूसरी तरफ, मैं 50 साल का एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हूँ। मुझ पर केवल यह आरोप है कि मैंने एक ऐसी कंपनी को सलाह दी जो वित्तीय गड़बड़ी में शामिल थी। मेरे खिलाफ कोई दोषसिद्धि (Conviction) नहीं हुई है, केवल प्राथमिकी (FIR) है, और वे मेरे नामांकन का एड़ी-चोटी का जोर लगाकर विरोध कर रहे हैं।

मद्रास हाई कोर्ट ने खुद 5-जजों की बड़ी बेंच को भेजा मामला

याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि मद्रास हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने हाल ही में खुद स्वीकार किया है कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act) हाई कोर्ट को धारा 24A के बाहर अपनी तरफ से अयोग्यताएं जोड़ने की शक्ति नहीं देता। इसलिए इस पूरे मामले को मद्रास हाई कोर्ट की 5-जजों की बड़ी बेंच (Larger Bench) को रेफर कर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां और BCI पर प्रहार

जब बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस. गुरु कृष्णकुमार ने तर्क दिया कि लंबित आपराधिक मामलों वाले लोगों को नामांकित करने पर एक “बड़ी चिंता” (Larger Concern) है और धारा 24A के तहत एक ढांचा मौजूद है, तो पीठ भड़क गई।

कानून से परे अयोग्यता: जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 24A (Section 24A) केवल दोषसिद्धि (Conviction) पर रोक लगाती है, न कि केवल मुकदमा (Trial/FIR) लंबित होने पर। कोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल का यह फैसला पूरी तरह से कानून के खिलाफ है।

जस्टिस मेहता ने कहा: गैरेज वाले लॉ कॉलेज असली चिंता हैं

जस्टिस मेहता ने कहा, “अदालत को मत सिखाइए। बार काउंसिल ऑफ इंडिया जो गैरेज में चलने वाले कॉलेजों को धड़ल्ले से मान्यता दे रहा है, वह सबसे बड़ी चिंता का विषय है। आप देशभर में दोषियों को दाएं, बाएं और बीच में नामांकित कर रहे हैं।”

जस्टिस विक्रम नाथ का कड़ा रुख: बहस के दौरान जब BCI के वकील अपनी बात पर अड़े रहे, तो जस्टिस विक्रम नाथ ने चुटकी लेते हुए चेतावनी दी: “आप तुरंत कोर्ट रूम छोड़कर बाहर जाएं, वरना आप और बड़ी मुसीबत में पड़ जाएंगे।”

अदालत का अंतरिम आदेश (Relief Issued)

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल की आपत्तियों को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को बड़ी अंतरिम राहत दी।

अनंतिम नामांकन (Provisional Enrolment): कोर्ट ने तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल को निर्देश दिया कि वह के. आर. सुदर्शन का अनंतिम नामांकन तुरंत स्वीकार करे और 2 सप्ताह के भीतर उन्हें नामांकन प्रमाण पत्र (Enrolment Certificate) जारी करे।

जवाब दाखिल करने का समय: सुप्रीम कोर्ट ने BCI और स्टेट बार काउंसिल को अपना जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) दाखिल करने के लिए 2 महीने का समय दिया है।

केस मैट्रिक्स: सुप्रीम कोर्ट का आदेश (2026)

विधिक और प्रक्रियात्मक बिंदुउच्चतम न्यायालय की कानूनी स्थिति
संबंधित अदालतभारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठ (Bench)जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस आर. महादेवन
मूल विधिक मुद्दाक्या केवल FIR/मुकदमा लंबित होने पर धारा 24A के तहत वकील का नामांकन रोका जा सकता है?
अधिवक्ता अधिनियम की धारा 24Aकेवल ‘नैतिक अधमता’ (Moral Turpitude) में दोषसिद्धि (Conviction) पर रोक लगाती है, ट्रायल पर नहीं।
अदालत का मुख्य निष्कर्षकेवल एफआईआर या लंबित आपराधिक मामले के आधार पर किसी को आजीविका से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत का अंतरिम निर्देशयाचिकाकर्ता को 2 सप्ताह के भीतर अनंतिम नामांकन प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश।
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