Tuesday, October 27, 2026
HomeHigh CourtPenalty on Advocate: हितों के टकराव और निजी हित छिपाने पर एडवोकेट...

Penalty on Advocate: हितों के टकराव और निजी हित छिपाने पर एडवोकेट पर क्यों लगाया ₹75,000 का जुर्माना…जवाब इस फैसले से मिलेगा

Penalty on Advocate: अपने ही मवक्किल के इशारे पर जनहित के नाम पर याचिका दायर करने के एक गंभीर मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।

आयोग अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति को चुनौती दी थी

अदालत ने मध्य प्रदेश निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग (MP PURC) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति को चुनौती देने वाले एक वकील (जो खुद को एलएलएम छात्र बताकर याचिका दायर कर रहे थे) पर ₹75,000 का भारी जुर्माना (Cost) लगाया है। कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश (Acting CJ) विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने तीन अलग-अलग याचिकाओं को खारिज करते हुए प्रत्येक याचिका पर ₹25-25 हजार का जुर्माना लगाया। इस तरह जनहित याचिका का दुरुपयोग करने पर अदालत ने सख्ती दिखाई। मामले में याचिकाकर्ता व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए, जबकि राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता एस. एस. चौहान ने पैरवी की।

मामला क्या है?: जनहित याचिका के नाम पर ‘निजी हित’

याचिकाकर्ता की दलील: याचिका दायर करने वाले वकील ने खुद को कानून का छात्र (LL.M. Student) बताते हुए जनहित याचिका (PIL) दाखिल की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति नियमों के खिलाफ हुई है और इसमें सरकारी धन व पद का भारी दुरुपयोग किया गया है। याचिका में लोकायुक्त और सीबीआई (CBI) से जांच कराने की मांग की गई थी ताकि 1 लाख से अधिक छात्रों का भविष्य सुरक्षित हो सके।

सच्चाई आई सामने: सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता वकील ने यह तथ्य छिपाया था कि वह बाद की अन्य रिट याचिकाओं में प्रतिवादियों में से एक, डॉ. विश्वास चौहान के वकील (Counsel) के रूप में पेश हो रहे थे।

हाई कोर्ट के 3 मुख्य कानूनी आधार (Key Findings)

हाई कोर्ट की खंडपीठ ने याचिकाओं को खारिज करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत रेखांकित किए।

सक्षम प्राधिकारी द्वारा जांच बंद होने के बाद PIL पोषणीय नहीं

अदालत ने नोट किया कि याचिकाकर्ता ने कोर्ट आने से पहले ही लोकायुक्त के पास विस्तृत शिकायत दर्ज कराई थी और लोकायुक्त ने मामले की जांच पूरी करके उसे बंद (Dispose of/Closed) कर दिया था।

कोर्ट का रुख: जब सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) पहले ही शिकायत की जांच कर मामले को समाप्त कर चुका हो, तो उसके बाद उसी विषय पर जनहित याचिका (PIL) पोषणीय (Entertainable) नहीं होती।

मवक्किल से मिली जानकारी को PIL का रूप देना और तथ्य छिपाना

अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता अपने मुवक्किल (डॉ. विश्वास चौहान) के लिए केस लड़ रहे थे और पूरी संभावना है कि जनहित याचिका में शामिल सभी तथ्य और सामग्रियां उन्हीं से ली गई थीं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से यह महत्वपूर्ण तथ्य छिपाया (Suppression of Material Facts) कि उनका इस मामले में निजी हित जुड़ा हुआ था।

कार्यकाल पूरा होना और याचिका का औचित्य खत्म होना

अदालत ने कहा कि जिन अधिकारियों की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी, वे 2020 में नियुक्त हुए थे और अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। इसके अलावा, 4 नवंबर 2025 के नोटिफिकेशन के तहत नए अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति पहले ही की जा चुकी है, जिससे इन याचिकाओं का औचित्य ही खत्म हो गया था।

कोर्ट का अंतिम आदेश

  • मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने तीनों जनहित याचिकाओं (W.P. No. 11341/2025, 18974/2025 और 24052/2025) को खारिज करते हुए आदेश दिया।
  • याचिकाकर्ता वकील पर प्रत्येक याचिका के लिए ₹25,000 का जुर्माना लगाया जाता है (कुल ₹75,000)।
  • जनहित याचिकाओं का उपयोग निजी या व्यावसायिक हित साधने के लिए नहीं किया जा सकता।

केस मैट्रिक्स: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश

कानूनी और प्रक्रियात्मक बिंदुअदालत का निर्णय / स्थिति
संबंधित अदालतमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Division Bench)
माननीय पीठएक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल
विषयMP निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति पर विवाद
मुख्य कानूनी उल्लंघनतथ्य छिपाना (Suppression of facts) और हितों का टकराव (Conflict of interest)
अदालत का फैसलातीनों याचिकाएं खारिज; ₹75,000 का जुर्माना लगाया गया।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
scattered clouds
21.2 ° C
21.2 °
21.2 °
75 %
1.5kmh
37 %
Tue
32 °
Wed
30 °
Thu
22 °
Fri
22 °
Sat
27 °

Recent Comments