UP Bulldozer Action: किसी आपराधिक मामले में आरोपी बनाए जाने के तुरंत बाद उसके घर या संपत्ति पर बुलडोजर चलाने की कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो जजों की खंडपीठ ने अलग-अलग राय दी है।
खंडपीठ में शामिल जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन के विचारों में असहमति के बाद, इस कानूनी मुद्दे को अब अंतिम फैसले के लिए मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) द्वारा नामित तीसरे जज (Third Judge) के पास भेज दिया गया है।
मामला क्या है?: POCSO और धर्मांतरण मामले में आरोपी का घर ढाने की कोशिश
मूल मामला: यह याचिका एक ही परिवार के तीन सदस्यों द्वारा दायर की गई थी। उनका आरोप था कि उनके एक रिश्तेदार के खिलाफ POCSO एक्ट और यूपी गैर-कानूनी धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज होते ही पुलिस की साठगांठ से उनके घर को निशाना बनाने की कोशिश की गई।
बुलडोजर कार्रवाई पर कोर्ट की निगरानी: फरवरी में हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद आरोपियों के घरों को गिराने की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई पर उत्तर प्रदेश सरकार से तीखे सवाल पूछे थे।
दोनों जजों के अलग-अलग कानूनी निष्कर्ष (Judicial Dissent)
जस्टिस अतुल श्रीधरन का पक्ष: 2 साल की रोक जरूरी
जस्टिस अतुल श्रीधरन ने 20 जुलाई के अपने आदेश में कहा कि नगर निगम कानूनों की आड़ में आरोपी के मकान को गिराना पूरी तरह से अवैध और कार्यकारी शक्तियों का गलत इस्तेमाल है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन की टिप्पणी: एफआईआर दर्ज होने की तारीख से 2 साल की अवधि तक किसी भी आरोपी व्यक्ति के रहने के स्थान (घर) को ध्वस्त करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद ऐसी बुलडोजर कार्रवाइयां जारी हैं, जो कार्यपालिका के विवेकाधिकार के दुरुपयोग की पराकाष्ठा है।
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन का पक्ष: निश्चित समय-सीमा तय नहीं हो सकती
दूसरी ओर, जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने इस प्रस्ताव से असहमति जताते हुए कहा कि यह मानकर चलना चाहिए कि सरकार कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार ही काम करेगी।
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की टिप्पणी: संविधान के तहत कोई निश्चित समय-सीमा (जैसे 2 साल) तय नहीं की जा सकती। ऐसा करने से किसी वैधानिक कानून (Enactment) के संचालन को निलंबित (Keep in Abeyance) करने जैसी स्थिति बन जाएगी। पीड़ित व्यक्ति के पास हमेशा हाई कोर्ट आने का अधिकार मौजूद है।
अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग: हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि अवैध निर्माण का नोटिस दिया जाता है, तो उन लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ भी 6 महीने के भीतर कार्रवाई होनी चाहिए जिनकी देखरेख में अवैध निर्माण हुआ।
तीसरे जज को भेजे गए 2 मुख्य कानूनी प्रश्न (Issues Referred to 3rd Judge)
क्या अनुच्छेद 226 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए हाई कोर्ट 2 साल या किसी निश्चित अवधि के लिए पूरे राज्य पर लागू (In Rem) ऐसा आदेश जारी कर सकता है, जो U.P. Urban Planning and Development Act, 1973 के तहत कार्रवाई को रोके?
क्या नगर निगम/विकास प्राधिकरण कानूनों के तहत कार्रवाई शुरू करने से पहले अधिकारियों को कथित उल्लंघन के लिए 1 साल पहले ‘आशय का नोटिस’ (Notice of Intent) जारी करने का निर्देश दिया जा सकता है?
केस मैट्रिक्स: इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश
| कानूनी और प्रक्रियात्मक बिंदु | अदालत द्वारा तय की गई स्थिति |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अतुल श्रीधरन एवं जस्टिस सिद्धार्थ नंदन |
| मूल विधिक मुद्दा | क्या FIR के बाद आरोपी के मकान पर बुलडोजर चलाने पर 2 साल की रोक लगानी चाहिए? |
| अदालत का फैसला | खंडित निर्णय (Split Verdict); मामला तीसरे जज को संदर्भित। |
| याचिकाकर्ताओं के वकील | एडवोकेट शमसुद्दीन खान, सैयद अहमद फैजान, जहीर असगर |
| राज्य सरकार के वकील | अपर महाधिवक्ता (AAG) अनूप त्रिवेदी |

