केस विवरण: HP High Court Criminal Contempt Case against Ex-MP & Advocate
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय (Himachal Pradesh High Court) |
| माननीय पीठ | जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर एवं जस्टिस संदीप शर्मा |
| प्रतिवादी (Respondents) | एडवोकेट धैर्य सुशांत एवं पूर्व सांसद राजन सुशांत |
| केस संख्या/प्रकार | स्वप्रेरित आपराधिक अवमानना (Suo Motu Criminal Contempt – Cr.OPC No. 1/2025) |
| अंतिम आदेश | बिना शर्त माफी स्वीकार; अवमानना कार्यवाही समाप्त व भविष्य के लिए सख्त चेतावनी। |
Case against Ex-MP & Advocate: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक जज और पूरी न्यायपालिका के खिलाफ फेसबुक लाइव (Facebook Live) के माध्यम से आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में वकील धैर्य सुशांत और उनके पिता, पूर्व सांसद/पूर्व मंत्री राजन सुशांत के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक अवमानना कार्यवाही (Criminal Contempt Proceedings) को बंद कर दिया है।
जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस संदीप शर्मा की पीठ ने मामले का निस्तारण करते हुए भविष्य में सोशल मीडिया के माध्यम से न्यायपालिका की छवि धूमिल करने की किसी भी कोशिश पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी। अदालत ने दोनों प्रतिवादियों द्वारा प्रस्तुत बिना शर्त और लिखित माफी (Unconditional Apology) को स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया कि “न्यायिक धैर्य को कभी भी न्यायपालिका की कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए।”
विवाद का कारण: चोरी की जांच में देरी से उपजा आक्रोश
- घटना की पृष्ठभूमि: 2025 में प्रतिवादियों के घर पर ₹11 लाख मूल्य की चोरी/डकैती की वारदात हुई थी।
- फेसबुक लाइव वीडियो: पुलिस जांच की धीमी प्रगति से व्यथित होकर अधिवक्ता धैर्य सुशांत ने फेसबुक पर लाइव आकर न्यायपालिका, वकीलों, न्यायिक अधिकारियों और एक मौजूदा जज पर गंभीर व आपत्तिजनक आरोप लगाए थे।
- स्वतः संज्ञान (Suo Motu Contempt): हाई कोर्ट ने 3 मार्च 2025 को इस वीडियो का स्वतः संज्ञान लेते हुए अवमानना अधिनियम (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 15 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
कागज़ी माफी’ की अस्वीकृति से वास्तविक पश्चाताप तक का सफर
- जून 2025 में पहली माफी खारिज: जून 2025 में प्रतिवादियों ने अदालत के समक्ष माफीनामा पेश किया था, जिसे जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस सुशील कुकरेजा की पीठ ने “कागज़ी माफी” (Paper Apology) करार देकर खारिज कर दिया था। कोर्ट ने तब कहा था कि यह सजा से बचने का एक कानूनी पैंतरा है और आरोप तय करने (Framing of Charges) के निर्देश दिए थे।
- 29 अप्रैल 2026 की नई हलफनामा आधारित माफी: इसके बाद, प्रतिवादियों ने 29 अप्रैल 2026 को हलफनामे के साथ एक नया बिना शर्त माफीनामा दायर किया। दोनों व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित हुए, अपनी गलती स्वीकार की और स्पष्ट किया कि वह बयान ₹11 लाख की चोरी की जांच में हो रही देरी से उपजे भावुक आक्रोश (Emotional Outburst) का परिणाम था।
- गलती का पूर्ण स्वीकार: प्रतिवादियों ने अदालत के सामने माना कि उनके बयान अनुचित, अत्यधिक और वकील व जिम्मेदार नागरिक के आचरण के विपरीत थे। उन्होंने मामले को किसी प्रकार से सही ठहराने या तथ्यों को घुमाने का प्रयास नहीं किया।
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
पीठ ने अवमानना मामला बंद करते हुए संस्थागत गरिमा और न्यायिक उदारता पर महत्वपूर्ण सिद्धांत रेखांकित किए। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी: “न्यायिक धैर्य को कभी कमजोरी मानने की भूल नहीं की जानी चाहिए। अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति, यद्यपि संयम के साथ प्रयोग की जाती है, फिर भी न्यायिक निष्ठा की रक्षा का एक महत्वपूर्ण साधन है। आज जो उदारता बढ़ाई गई है, वह कोई छूट या रियायत नहीं है, बल्कि कानून की सेवा करने वालों के सुधरने की क्षमता में अदालत के अटूट विश्वास का प्रमाण है।”
सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर अंतिम चेतावनी
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट चेतावनी दी कि इस फैसले को नज़ीर बनाकर भविष्य में सोशल मीडिया का इस्तेमाल न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं किया जा सकता।
- भविष्य के लिए सख्त हिदायत: पीठ ने उम्मीद जताई कि प्रतिवादी भविष्य में सोशल मीडिया (एक्स/ट्विटर, फेसबुक आदि) पर कोई ऐसा पोस्ट या सामग्री साझा नहीं करेंगे जो अदालतों के प्राधिकार को कमतर करे।
- त्वरित कार्रवाई की चेतावनी: यदि भविष्य में संस्था की छवि धूमिल करने का कोई पुनः प्रयास किया गया, तो उसके खिलाफ तुरंत और सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

