Sunday, November 1, 2026
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Sentence Reduction for Elderly Convict: 40 साल बाद 82 वर्षीय बुजुर्ग को वापस जेल क्यों जाना पड़ा?…बाबू लाल की कहानी सभी जरूर पढ़ें

केस मैट्रिक्स: Allahabad HC Ruling on Sentence Reduction for Elderly Convict

पहलूविवरण
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
माननीय पीठजस्टिस अतुल श्रीधरण एवं जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय
केस का नामबाबू लाल बनाम राज्य (Babu Lal v. State)
मूल अपराधIPC धारा 302 (हत्या) व 323 (चोट पहुँचाना)
मुख्य कानूनी सिद्धांतकेवल बढ़ती उम्र/मानवीय आधार पर आजीवन कारावास की सजा घटाई नहीं जा सकती; अनुच्छेद 142 का प्रयोग केवल सुप्रीम कोर्ट कर सकता है।
अंतिम निर्णयसजा बरकरार; 82 वर्षीय आरोपी को तुरंत जेल में आत्मसमर्पण करने के आदेश।

Sentence Reduction for Elderly Convict: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के 40 साल पुराने एक मामले में 82 वर्षीय बुजुर्ग अभियुक्त बाबू लाल (Babu Lal) की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए उन्हें तुरंत जेल में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

जस्टिस अतुल श्रीधरण और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने बाबू लाल की याचिका खारिज करते हुए अपील के दौरान उन्हें मिली जमानत रद्द कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल वृद्धावस्था या मानवीय संवेदनाओं के आधार पर कानून द्वारा तय आजीवन कारावास की सजा को कम नहीं किया जा सकता।

मामला क्या था?: 1984 में भाई की हत्या का मामला

  • घटना: 25 मार्च 1984 को बाबू लाल ने पीछे से आकर अपने भाई गंगा पर लोहे की ‘सबरी’ (खेती में खुदाई के लिए इस्तेमाल होने वाला औजार) से सिर पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। बीच-बचाव करने आई मृतक की पत्नी पर भी हमला किया गया था।
  • सजा (1984): सत्र अदालत (Sessions Court) ने अक्टूबर 1984 में बाबू लाल को IPC की धारा 302 (हत्या) के तहत आजीवन कारावास और धारा 323 के तहत 1 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
  • अपील व जमानत: अपील लंबित रहने के दौरान अभियुक्त को जमानत मिल गई थी। उसने लगभग 5 वर्ष जेल में बिताए थे।

हाई कोर्ट ने सजा कम करने से इनकार क्यों किया?

अभियुक्त के वकील ने दलील दी थी कि बाबू लाल की उम्र अब 82 वर्ष हो चुकी है और मामला 40 साल पुराना (1984 का) है, इसलिए उनकी सजा को उनके द्वारा पहले ही जेल में बिताई गई अवधि (~5 वर्ष) तक सीमित कर दिया जाए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस मांग को खारिज कर दिया:

अनुच्छेद 142 (Article 142) की शक्ति केवल सुप्रीम कोर्ट के पास

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत मानवीय आधार पर पूर्ण न्याय (Complete Justice) करने की विशेष शक्ति सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी: “यह तथ्य कि अपीलकर्ता को 40 साल बाद वापस जेल जाना होगा, निस्संदेह इस अदालत को परेशान करता है। लेकिन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय जैसी शक्तियाँ प्राप्त न होने के कारण यह अदालत मजबूर है और अपीलकर्ता को उसकी आजीवन कारावास की शेष सजा पूरी करने के लिए वापस जेल भेजने के अलावा कुछ नहीं कर सकती।”

हत्या (Sec 302) से गैर-इरादतन हत्या (Sec 304 II) में ढालने के आधार नहीं

हाई कोर्ट ने कहा कि जब तक अपराध की प्रकृति धारा 302 से बदलकर 304 पार्ट II (Culpable Homicide) में न आ जाए, तब तक आजीवन कारावास की सजा घटाना कानूनी रूप से असंभव है। मामले में कोई ऐसा गंभीर या अचानक उकसावा (Grave and Sudden Provocation) या अचानक लड़ाई नहीं हुई थी जिससे धारा बदली जा सके।

खेती के औजार’ से हत्या के इरादे का निर्धारण

बचाव पक्ष का तर्क था कि सबरी कोई पारंपरिक हथियार नहीं है, इसलिए हत्या का इरादा नहीं था। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि जिस क्रूरता और तरीके से सिर पर बार-बार हमला किया गया, वह सीधे तौर पर हत्या करने के इरादे को साबित करता है।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

  1. अपील खारिज व जमानत रद्द: अभियुक्त बाबू लाल की अपील खारिज कर दी गई और उनकी जमानत रद्द कर दी गई।
  2. आत्मसमर्पण का आदेश: कोर्ट ने बाबू लाल को तुरंत सरेंडर करने का निर्देश दिया और कहा कि यदि वे आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, तो संबंधित अदालत उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट (Non-Bailable Warrant) जारी करे।
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