केस मैट्रिक्स: Delhi Sessions Court Ruling on NI Act Defence Evidence
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | साकेत सत्र अदालत, नई दिल्ली (Saket / Delhi Sessions Court) |
| माननीय न्यायाधीश | शेफाली बरनाला टंडन (अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश) |
| संबंधित कानून | NI Act (चेक बाउंस), संविधान का अनुच्छेद 21, BNSS की धारा 346 |
| मूल सिद्धांत | कानून में एक अवसर ‘पर्याप्त अवसर’ नहीं है; आरोपी को बचाव का वाजिब हक मिलना चाहिए। |
| अंतिम आदेश | मैजिस्ट्रेट का आदेश रद्द; आरोपी महिला को बचाव साक्ष्य पेश करने का आखिरी मौका दिया गया। |
NI Act Defence Evidence: चेक बाउंस के एक मामले में निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के अधिकार को रेखांकित करते हुए दिल्ली की एक सत्र अदालत (Sessions Court) ने मैजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत एक महिला का बचाव साक्ष्य (Defence Evidence) पेश करने का अधिकार बंद कर दिया गया था।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) शेफाली बरनाला टंडन ने अपने फैसले में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी देता है, जिसमें अपना बचाव पेश करने का वाजिब अवसर शामिल है।
दिल्ली सत्र अदालत (ASJ शेफाली बरनाला टंडन) की मुख्य टिप्पणियां
अदालत ने मैजिस्ट्रेट अदालत द्वारा एक ही बार में बचाव का अवसर समाप्त करने की जल्दबाजी पर सवाल उठाते हुए सत्र अदालत का निर्णय: यह कानून में भली-भांति स्थापित है कि निष्पक्ष सुनवाई न्याय की नींव है। आरोपी को अपना बचाव प्रस्तुत करने का अवसर दिए बिना, विचारण (Trial) एक न्यायिक प्रक्रिया के बजाय केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। संविधान का अनुच्छेद 21 एक निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी देता है जिसमें आरोपी को अपना बचाव करने का उचित अवसर शामिल है। कानून के तहत एक ‘अकेला अवसर’ (Single Opportunity) को ‘पर्याप्त अवसर’ (Sufficient Opportunity) नहीं माना जा सकता।
मामला क्या था?: मैजिस्ट्रेट कोर्ट का आदेश और रिवीजन पिटीशन
- मूल मामला: सुनीता देवी नामक महिला ने मंजू देवी (याचिकाकर्ता/आरोपी) के खिलाफ पराक्रम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act – NI Act) के तहत चेक बाउंस की शिकायत दर्ज कराई थी।
- मार्च से जुलाई 2025 का घटनाक्रम: मार्च 2025 में शिकायतकर्ता का साक्ष्य पूरा हुआ और मामले को 30 जुलाई 2025 के लिए टाल दिया गया ताकि आरोपी (मंजू देवी) अपने गवाहों की सूची और खुद के बयान की अर्जी दाखिल कर सके।
- एक ही बार में अधिकार बंद: 30 जुलाई 2025 को मैजिस्ट्रेट ने देखा कि आरोपी द्वारा कदम नहीं उठाए गए हैं और बिना कोई अतिरिक्त समय दिए तुरंत उसका बचाव साक्ष्य का अधिकार (Right to lead defence evidence) समाप्त कर दिया। इसके खिलाफ मंजू देवी ने सत्र अदालत में रिवीजन याचिका दायर की।
BNSS धारा 346 और स्थगन (Adjournment) के नियम
अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 346 [जो पुरानी CrPC की धारा 309 के समकक्ष है] का हवाला दिया, जो अदालती कार्यवाही को स्थगित करने या टालने की शक्तियों से संबंधित है।
- 2 तारीखों की अनुमति: BNSS की धारा 346(2) के अनुसार, विधायिका ने किसी पक्षकार के अनुरोध पर अधिकतम दो बार मामला स्थगित (Adjourn) करने की अनुमति दी है, बशर्ते परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर न हों।
- मैजिस्ट्रेट की गलती: सत्र अदालत ने नोट किया कि कानून जब दो अवसरों की अनुमति देता है, तो मैजिस्ट्रेट द्वारा पहली ही बार कदम न उठाने पर अधिकार बंद कर देना प्रक्रियात्मक भूल थी।
अंतिम आदेश
सत्र अदालत ने मैजिस्ट्रेट के अगस्त 2025 के आदेश को रद्द करते हुए आरोपी महिला मंजू देवी को अपना बचाव साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए “एक अंतिम अवसर” (One Last Opportunity) प्रदान किया।

