Saturday, November 7, 2026
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Legal Strike On Politics-II: शिवसेना विवाद…क्या राजनीतिक दलों से संवैधानिक संस्थाओं की तरह लोकतांत्रिक सिद्धांतों के पालन की उम्मीद नहीं की जाती?

केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (अगस्त 2026)
माननीय पीठCJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
याचिकाकर्तासुनील प्रभु एवं उद्धव ठाकरे (शिवसेना – UBT)
प्रतिवादीएकनाथ शिंदे गुट, महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष एवं ECI
मुख्य कानूनी मुद्दे1. 10वीं अनुसूची (दलबदल कानून) के तहत विधायकों की अयोग्यता।
2. ECI द्वारा असली शिवसेना के रूप में शिंदे गुट को मान्यता और ‘धनुष-बाण’ प्रतीक का आवंटन।
अदालत का ध्यानराजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र, पार्टी संविधान की मान्यता और संवैधानिक संस्थाओं (ECI) का अधिकार क्षेत्र।

Legal Strike On Politics-II: सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के चुनाव चिह्न (‘धनुष और बाण’) और महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष द्वारा एकनाथ शिंदे गुट के विधायकों की अयोग्यता याचिकाएं खारिज किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई जारी है।

सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने उद्धव ठाकरे गुट से राजनीतिक दलों की आंतरिक लोकतंत्र व्यवस्था पर तीखे सवाल पूछे।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां और कपिल सिब्बल की दलीलें

आंतरिक लोकतंत्र (Internal Democracy) पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल

  • CJI सूर्यकांत की टिप्पणी:“आपकी पार्टी का संविधान लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित था। फिर आपने अचानक संशोधन किया और एक अलग व्यवस्था बना दी… जब हम संस्थाओं में लोकतांत्रिक सिद्धांतों की बात करते हैं, तो सवाल उठता है — एक राजनीतिक दल होने के नाते, क्या आपसे भी उन सिद्धांतों का पालन करने की उम्मीद नहीं की जाती?”

संवैधानिक बनाम राजनीतिक संस्थाओं में अंतर पर सिब्बल का जवाब

  • वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल (उद्धव गुट की ओर से):
    • राजनीतिक कार्य करने वाली संस्थाओं और संवैधानिक कार्य करने वाली संस्थाओं (जैसे चुनाव आयोग) में अंतर होता है। राजनीतिक गलतियों को सुधारा जा सकता है, लेकिन भारत निर्वाचन आयोग (ECI) जैसी संवैधानिक संस्था का गलत फैसला शायद ही कभी सुधारा जा सके।
    • सिब्बल ने कहा: “संस्थागत अखंडता (Institutional Integrity) लोकतंत्र के केंद्र में है। दलबदल एक संवैधानिक पाप है, लेकिन अब यह सम्मान का तमगा बन गया है।”

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सुनवाई के मुख्य बिंदु (Key Legal Arguments)

  1. 2018 के पार्टी संविधान पर ECI का अधिकार क्षेत्र:
    • सिब्बल ने दलील दी कि ECI के पास किसी राजनीतिक दल के संविधान की वैधता में जाने या आंतरिक लोकतंत्र न होने के आधार पर उसे अनदेखा करने का कोई न्यायिक अधिकार (Adjudicatory Power) नहीं है।
    • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) की धारा 29A का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी को ECI के पास सिर्फ अपना मूल संविधान जमा करना होता है, संशोधनों की केवल सूचना दी जाती है।
  2. विधायक दल (Legislature Party) बनाम मूल राजनीतिक दल (Political Party):
    • न्यायमूर्ति बागची ने सुभाष देसाई मामले के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए याद दिलाया कि राजनीतिक दल का अपने विधायक दल पर नियंत्रण होता है और राजनीतिक दल का निर्णय विधायक दल के बहुमत के फैसले पर प्रभावी रहता है।
    • हालांकि, अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्यता तय करने के मापदंड और ECI द्वारा चुनाव चिह्न तय करने के कानूनी मापदंड अलग-अलग थे।
  3. अयोग्यता याचिकाओं में देरी और सरकार का गठन:
    • कपिल सिब्बल ने अफसोस जताया कि अयोग्यता का मुद्दा पहले तय किए बिना ECI ने सीधे पार्टी का नाम और ‘धनुष-बाण’ चिह्न शिंदे गुट को आवंटित कर दिया।
    • उन्होंने कहा कि सत्ता में बैठे लोग चुंबकीय आकर्षण (Magnet) की तरह होते हैं—शुरुआत में 31 विधायक गए, बाद में यह संख्या बढ़कर 39 हुई और शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के बाद सांसद भी बदल गए। इसलिए अयोग्यता याचिकाओं को लटका कर रखना गलत था।

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