केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (अगस्त 2026) |
| माननीय पीठ | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| विवादित कानून | DPDP एक्ट द्वारा RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) में किया गया संशोधन |
| मुख्य संवैधानिक मुद्दा | RTI के तहत सूचना का अधिकार बनाम DPDP के तहत निजता का अधिकार (Right to Privacy) |
| मुख्य चिंता | ‘जनहित’ (Public Interest) क्लॉज के हटने से लोक सेवकों की जवाबदेही और खोजी पत्रकारिता पर प्रभाव |
| वर्तमान स्थिति | केंद्र सरकार (MeitY) को 2 सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश। |
RTI ACT-II: सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट के माध्यम से सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम में किए गए संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) में किए गए उस संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसके तहत व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा करने वाले ‘जनहित’ (Public Interest) के अपवाद/खंड को हटा दिया गया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि नागरिकों के ‘सूचना पाने के अधिकार’ (Right to Information) और ‘निजता के मौलिक अधिकार’ (Right to Privacy) के बीच एक बारीक और उचित संतुलन (Careful Balance) बनाना अनिवार्य है।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- क्या व्यक्तिगत जानकारी पर पूर्ण प्रतिबंध उचित है?
- न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की टिप्पणी:“मुख्य संवैधानिक मुद्दा यह है कि क्या सभी डिजिटल व्यक्तिगत जानकारियों के प्रकटीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Prohibition) लगाया जा सकता है, या फिर विधायिका को आनुपातिकता का दृष्टिकोण (Proportionate Approach) अपनाना चाहिए?”
- RTI और DPDP एक्ट का दायरा और सामंजस्य:
- अदालत ने स्पष्ट किया कि आरटीआई कानून का दायरा काफी बड़ा है जो हर प्रकार की जानकारी को कवर करता है, जबकि DPDP कानून एक संकीर्ण दायरा (Narrower Sliver) रखता है।
- पीठ ने कहा: “RTI और डेटा संरक्षण कानून दोनों केंद्रीय कानून हैं। कोर्ट को इन दोनों कानूनों के बीच सामंजस्य (Harmonise) स्थापित करना होगा।”
- पत्रकारों के लिए विशेषाधिकार पर स्थिति: अदालत ने स्पष्ट किया कि सुभाष चंद्र अग्रवाल निर्णय या एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स मामला, अथवा आरटीआई अधिनियम स्वयं पत्रकारों के लिए अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के तहत उपलब्ध सुरक्षा के अलावा कोई अलग या विशेष छूट नहीं बनाता है।
क्या था संशोधन और क्यों हो रहा है विरोध?
- पुराना नियम (Section 8(1)(j)): पहले आरटीआई की धारा 8(1)(j) के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authorities) केवल सीमित मामलों में व्यक्तिगत जानकारी देने से इनकार कर सकते थे। लेकिन यदि उसमें बड़ा जनहित (Larger Public Interest) शामिल होता था, तो अधिकारी वह जानकारी देने के लिए बाध्य थे।
- नया संशोधन (DPDP एक्ट द्वारा): नए संशोधन के तहत ‘जनहित’ वाले क्लॉज को हटा दिया गया है। अब कोई भी जानकारी जो किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित है, उसे देने से पूरी तरह से छूट प्राप्त है।
याचिकाकर्ताओं और वकीलों की दलीलें
- वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण:
- प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि सुभाष चंद्र अग्रवाल केस में सुप्रीम कोर्ट ने आरटीआई और निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाया था, जिसे इस संशोधन ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।
- उन्होंने चेतावनी दी: “अब स्थिति यह होगी कि भ्रष्टाचार में लिप्त किसी लोक सेवक (Public Official) के खिलाफ लंबित चार्जशीट, राशन कार्ड या कल्याणकारी योजनाओं के विवरण को भी केवल यह कहकर देने से मना किया जा सकता है कि यह ‘व्यक्तिगत जानकारी’ है।”
- अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर:
- उन्होंने कहा कि पहले कानून में निजता की सुरक्षा के साथ-साथ जनहित में खुलासे के लिए अंतर्निहित सुरक्षा उपाय (Inbuilt Safeguards) थे, जिन्हें अब हटा दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप अनुच्छेद 19 और 21 के तहत संरक्षित जानकारी का एक बड़ा हिस्सा बाहर हो गया है।
- अधिवक्ता निशा भंभानी:
- इन्होंने खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) पर पड़ने वाले असर को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पत्रकार भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग को उजागर करने के लिए आरटीआई का सहारा लेते हैं। यदि हर बार ‘डेटा प्रिंसिपल’ की सहमति लेनी पड़े, तो खोजी पत्रकारिता पूरी तरह ठप हो जाएगी।
केंद्र सरकार का पक्ष और कोर्ट का अगला कदम
- सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता (केंद्र की ओर से): उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार अपने हलफनामे (Affidavit) के जरिए इस संशोधन की आवश्यकता और औचित्य को न्यायोचित ठहराएगी। उन्होंने जवाब दाखिल करने के लिए 2 सप्ताह का समय मांगा।
- कोर्ट का आदेश: पीठ ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को मामले में एक पक्षकार (Party) के रूप में शामिल किया और कहा कि केंद्र के जवाब दाखिल करने के बाद मामले को गैर-विविध (Non-miscellaneous) दिन पर अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।

