केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Overview Matrix)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (10 अगस्त 2026) |
| माननीय पीठ | CJI सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय) |
| याचिकाकर्ता | TV Today Network |
| संबंधित संवैधानिक प्रावधान | Article 226 (हाई कोर्ट की रिट शक्तियां) एवं Article 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | 1. प्रेस/मीडिया ‘सार्वजनिक कार्य’ (Public Function) करता है; अतः निजता के उल्लंघन जैसे मामलों में उसके विरुद्ध अनुच्छेद 226 के तहत याचिका पोषणीय (Maintainable) है। 2. यौन शोषण पीड़ितों (विशेषकर नाबालिगों) की पहचान उजागर करना गंभीर टॉर्ट/अपराध है। |
| अदालत का निर्णय | टीवी टुडे की याचिका पूरी तरह खारिज; दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा लगाया गया ₹5 लाख का जुर्माना बरकरार। |
TV Today Network: सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया समूह ‘टीवी टुडे नेटवर्क’ (TV Today Network) की उस याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के ₹5 लाख के जुर्माने/हर्जाने (Damages) वाले आदेश को चुनौती दी गई थी।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मीडिया नेटवर्क के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि प्रेस सार्वजनिक कार्य (Public Function) नहीं करता है और इसलिए उस पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका नहीं चलाई जा सकती। यह जुर्माना एक बाल यौन शोषण पीड़िता (Child Sexual Abuse Victim) की पहचान उजागर करने और उसकी निजता/गोपनीयता के अधिकारों का उल्लंघन करने के एवज में लगाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी व महत्वपूर्ण टिप्पणियां
- “मीडिया को सार्वजनिक कर्तव्य निभाने पर गर्व होना चाहिए”
- सुनवाई के दौरान CJI सूर्य कांत ने मीडिया समूह के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा:“आपको (प्रेस को) यह गर्व से कहना चाहिए कि आप अत्यंत महत्वपूर्ण सार्वजनिक कर्तव्य (Public Duty) का पालन करते हैं। केवल मुकदमों में अपने बचाव की ढाल बनाने के लिए इस बात से शर्माना या मुकरना क्यों? आपको तो इस पर गर्व होना चाहिए।”
- अनुच्छेद 19(1)(a) और सार्वजनिक कार्य की भूमिका
- न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने मीडिया समूह के वकील से सवाल किया:“प्रेस और क्या करता है, सिवाय इसके कि वह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) [वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता] में योगदान देता है? जब आपका इंटरनेट रोका जाता है, तो आप अनुच्छेद 19(1)(a) का हवाला देते हैं। अब जब आप पर हर्जाना लगाया गया है, तो आप कहते हैं कि यह सार्वजनिक कार्य नहीं है? संप्रभु कार्य (Sovereign Function) और सार्वजनिक कार्य (Public Function) में अंतर होता है।”
- मुकदमों की बाढ़ आने की दलील पर कोर्ट का जवाब
- जब टीवी टुडे के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि प्रेस को सार्वजनिक कार्य करने वाली संस्था मानने से मीडिया घरानों के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत याचिकाओं की बाढ़ (Floodgates) आ जाएगी, तो सुप्रीम कोर्ट ने दोटूक कहा:“हम इसका स्वागत/प्रोत्साहन करते हैं (We encourage it)।”
- डोनेशन के रूप में देखने की सलाह
- CJI सूर्य कांत ने मीडिया समूह से कहा कि यदि वे चाहें तो ₹5 लाख की इस राशि को पीड़िता के प्रति अपनी ओर से एक “छोटा सा स्वैच्छिक दान” (Small Voluntary Donation) मान सकते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- यौन शोषण पीड़िता की पहचान उजागर करने का मामला:
- टीवी टुडे नेटवर्क के एक समाचार चैनल पर बाल यौन शोषण की शिकार एक बच्ची से जुड़ी ऐसी जानकारियां और विवरण प्रसारित किए गए थे, जिनसे पीड़िता की पहचान उजागर हो सकती थी।
- पीड़िता ने चैनल द्वारा इस घटना के प्रसारण में अपनी असहमति जताई थी और इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की थी।
- दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला:
- दिल्ली उच्च न्यायालय ने पीड़िता के निजता और गोपनीयता के अधिकार के हनन के लिए टीवी टुडे पर ₹5 लाख का जुर्माना/हर्जाना लगाया था।
- हाई कोर्ट ने माना था कि प्रेस सार्वजनिक कार्य (Public Function) करता है, इसलिए पीड़ित नागरिक अपनी निजता के हनन पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और परिणाम:
- टीवी टुडे ने सुप्रीम कोर्ट में मुख्य रूप से यह तर्क दिया था कि एक निजी मीडिया संस्थान होने के नाते वह ‘सार्वजनिक कार्य’ नहीं करता, इसलिए अनुच्छेद 226 उस पर लागू नहीं होना चाहिए।
- सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के ₹5 लाख के हर्जाने के आदेश को बरकरार रखा।

