Tuesday, August 4, 2026
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Access to Justice: बुजुर्ग महिला गवाह को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से गवाही की अदालत ने क्यों दी अनुमति…यहां जानिए इसका उद्देश्य

Access to Justice: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा, अदालतों में आधुनिक तकनीक और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Video Conferencing) के विधिक इस्तेमाल पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रगतिशील निर्णय सुनाया।

हाई कोर्ट के जस्टिस विरिंदर अग्रवाल की एकल पीठ ने निचली अदालत (Trial Court) के उस आदेश को पूरी तरह से खारिज (Set Aside) कर दिया, जिसने एक महत्वपूर्ण गवाह की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए गवाही दर्ज करने की याचिका को नामंजूर कर दिया था। अदालत ने कहा, अदालती प्रक्रियाओं के नियमों को इस तरह लागू किया जाना चाहिए जिससे आम आदमी के लिए ‘न्याय तक पहुंच’ (Access to Justice) आसान हो, न कि उसमें बाधा उत्पन्न हो।

डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के महत्व को रेखांकित किया

अदालत ने देश की न्यायिक प्रणाली में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, सभी अदालतों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की तकनीकी सुविधाएं इस उद्देश्य से दी गई हैं ताकि मामलों का त्वरित निपटारा (Expeditious Adjudication) हो सके। इस हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 225 और 227 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए ‘वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूल्स’ (VC Rules) इसीलिए बनाए हैं ताकि इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से न्यायिक कार्यवाही को सुगम बनाया जा सके। इन नियमों का उद्देश्य न्याय को सुलभ बनाना है, उसे रोकना नहीं।

मामला क्या था? (वसीयत की 78 वर्षीय बुजुर्ग गवाह और निचली अदालत की कठोरता)

यह विधिक विवाद चंडीगढ़ के सिविल जज (Civil Judge, Chandigarh) के एक आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) से जुड़ा है।

मुख्य विधिक विवाद: एक वसीयत (Will) के निष्पादन से जुड़ा सिविल मामला कोर्ट में लंबित था। याचिकाकर्ता ने वसीयत की तस्दीक करने वाली एक मुख्य गवाह (Attesting Witness), जो कि लगभग 78 वर्ष की बुजुर्ग महिला हैं, की गवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दर्ज कराने की अनुमति मांगी थी।

पारिवारिक परिस्थितियां: बुजुर्ग महिला अपने बीमार पति की देखभाल में व्यस्त होने के कारण व्यक्तिगत रूप से अदालत आने में असमर्थ थीं। बाद में, लंबी बीमारी के बाद उनके पति का निधन भी हो गया।

निचली अदालत का असंवेदनशील रुख: चंडीगढ़ की ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि ‘बिना किसी गंभीर बीमारी के केवल अधिक उम्र होना’ अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित न होने का कोई कानूनी आधार नहीं है, और यात्रा की असुविधा की भरपाई हर्जाना (Costs) देकर की जा सकती है।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: ‘नियमों की सार्थकता और व्यावहारिक दृष्टिकोण’

जस्टिस विरिंदर अग्रवाल ने निचली अदालत के संकीर्ण और कठोर दृष्टिकोण की कड़ी आलोचना की और निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक बिंदु तय किए।

परिस्थितियां पूरी तरह से उचित और बाध्यकारी

हाई कोर्ट ने कहा कि एक 78 वर्षीय बुजुर्ग महिला, जिसने हाल ही में अपने लंबे समय से बीमार पति को खोया हो, उससे यह उम्मीद करना कि वह भौतिक रूप से अदालत में पेश हो, पूरी तरह से अनुचित है। यह परिस्थितियां ‘वर्चुअल मोड’ (Virtual Mode) के जरिए साक्ष्य दर्ज करने के लिए पूरी तरह से वैध और ठोस आधार (Compelling Grounds) बनाती हैं।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम 8′ का उल्लंघन

न्यायालय ने पाया कि निचली अदालत हाई कोर्ट द्वारा अधिसूचित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियमों (विशेष रूप से रूल 8) को समझने और लागू करने में पूरी तरह विफल रही। यह नियम गवाह की पहचान के सत्यापन (Identity Verification), दस्तावेजों के इलेक्ट्रॉनिक प्रेषण, गवाह के हाव-भाव (Demeanour) को रिकॉर्ड करने और ऑडियो-विजुअल रिकॉर्ड के सुरक्षित संरक्षण की एक बेहद सुरक्षित और व्यापक विधिक प्रक्रिया प्रदान करता है।

दस्तावेजों के सत्यापन में कोई विधिक अड़चन नहीं

अदालत ने स्पष्ट किया कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान हस्ताक्षरों या दस्तावेजों की पहचान करने में कोई व्यावहारिक या विधिक कठिनाई नहीं आएगी। नियमों के तहत संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां गवाह को पहले से भेजी जा सकती हैं और लाइव स्क्रीन पर जिरह के दौरान उनके सामने रखी जा सकती हैं।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुपंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (जून 2026)
याचिकाकर्तामुकदमे का मुख्य पक्षकार (अनुच्छेद 227 के तहत)।
मूल विधिक मंचसिविल जज (Senior Division), चंडीगढ़।
सुनवाई करने वाले जजजस्टिस विरिंदर अग्रवाल।
मुख्य विधिक विषयवसीयत की 78 वर्षीय गवाह का वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से परीक्षण।
संवैधानिक प्रावधानभारत के संविधान का अनुच्छेद 225 और 227 (उच्च न्यायालय की नियम बनाने और अधीक्षण की शक्ति)।
अदालत का अंतिम आदेशयाचिका मंजूर; निचली अदालत को तुरंत वीसी (VC) के जरिए कड़ाई से नियमों का पालन करते हुए गवाही दर्ज करने का निर्देश।
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