केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | राजस्थान उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | राजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अशोक कुमार जैन |
| संबंधित कानून | POCSO Act एवं किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act), 2015 की धारा 94 |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | पीड़ित/आरोपी की उम्र का निर्धारण कैसे किया जाना चाहिए? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | 1. सबसे पहले दस्तावेजी प्रमाण। 2. अंतिम विकल्प के रूप में मेडिकल टेस्ट। 3. मेडिकल टेस्ट अकेले डॉक्टर द्वारा नहीं, बल्कि मेडिकल बोर्ड द्वारा होना चाहिए। |
| डीजीपी राजस्थान को निर्देश | जांच अधिकारियों (IOs) को POCSO और JJ एक्ट के कानूनी प्रावधानों की व्यापक ट्रेनिंग दी जाए। |
Legal Training Needed: यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम और किशोर न्याय (Juvenile Justice – JJ) मामलों में उम्र निर्धारण के विधिक प्रावधानों की पुलिस द्वारा की जा रही अनदेखी पर राजस्थान हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता व्यक्त की है।
अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी (IO) उम्र तय करने की वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं कर रहे हैं। इस स्थिति को देखते हुए जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकल पीठ ने राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (DGP) को यह विचार करने का निर्देश दिया है कि POCSO और किशोर मामलों से जुड़े जांच अधिकारियों को व्यापक कानूनी प्रशिक्षण (Legal Training) दिया जाए।
विधिक पृष्ठभूमि: उम्र को लेकर विवाद और पुलिस की लापरवाही
- यह टिप्पणी अदालत ने एक POCSO मामले में आरोपी को जमानत (Bail) देते हुए की। मामले में पीड़िता की उम्र विवादित थी और पुलिस की जांच में कई विधिक खामियां सामने आईं।
- दस्तावेज़ बनाम मेडिकल रिपोर्ट: पीड़िता के जनाधार (Jan Aadhaar) कार्ड में उसकी उम्र 18 वर्ष दर्ज थी। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि डॉक्टर ने उसकी उम्र 15-16 वर्ष आंकी है, जबकि खुद पीड़िता ने गवाही में कहा कि डॉक्टर ने उसकी उम्र 18-19 वर्ष सुझाई थी।
- पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल: पुलिस के पास उम्र साबित करने वाला कोई भी स्कूल या नगर निगम का दस्तावेजी रिकॉर्ड नहीं था। पुलिस ने केवल Bikaner के एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CSC) के चिकित्सा अधिकारी द्वारा किए गए अस्थिकरण परीक्षण (Ossification Test) पर भरोसा किया, जिसमें पीड़िता की उम्र 15 से 18 वर्ष के बीच आंकी गई थी।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “उम्र का निर्धारण मेडिकल बोर्ड से होना चाहिए, न कि अकेले डॉक्टर से”
जस्टिस अशोक कुमार जैन की पीठ ने पुलिस की जांच प्रक्रिया को सीधे तौर पर किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) 2015 की धारा 94 का उल्लंघन माना।
धारा 94 और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लंघन
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के रजनी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और शाह नवाज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया। कहा, उम्र के निर्धारण के लिए सबसे पहले JJ Act की धारा 94 में निर्दिष्ट दस्तावेज़ (जैसे जन्म प्रमाण पत्र या मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट) देखे जाने चाहिए। अस्थिकरण परीक्षण (Ossification Test) का सहारा केवल अंतिम विकल्प के रूप में लिया जाना चाहिए जब कोई दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध न हो।
मेडिकल बोर्ड की अनिवार्यता
अदालत ने पाया कि कानून के अनुसार, जब मेडिकल राय की आवश्यकता होती है, तो यह राय चिकित्सा बोर्ड (Medical Board) द्वारा दी जानी चाहिए। प्रस्तुत मामले में पुलिस ने केवल CSC के एक चिकित्सा अधिकारी (Medical Officer) की राय ली, जो POCSO या JJ Act के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
निचली अदालत की भूमिका पर टिप्पणी
पीठ ने यह भी कहा, “इसका सीधा सा मतलब है कि पुलिस को कानूनी प्रावधानों की जानकारी नहीं है और कानूनी अनुपालन के मामले में पुलिस को वास्तव में व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता है। यह ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) का भी कर्तव्य है कि वह शुरुआती चरण में ही इस दोष को इंगित करे, क्योंकि इसे जांच के दौरान ठीक किया जा सकता है, लेकिन ट्रायल शुरू होने के बाद इसे सुधारा नहीं जा सकता।”
जमानत आदेश और DGP को निर्देश
पीड़िता की उम्र पर स्पष्टता न होने और इसे ट्रायल के दौरान विचारणीय मुद्दा मानते हुए अदालत ने आरोपी को जमानत (Bail) दे दी। साथ ही, अदालत ने आदेश की एक प्रति राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजते हुए निर्देश दिया कि जांच अधिकारियों के लिए इस विषय पर व्यापक कानूनी प्रशिक्षण (Legal Training) सुनिश्चित किया जाए।

