मामला सारांश (At a Glance)
| विधिक बिंदु | विवरण |
| मामले का नाम | कंवल चौधरी बनाम इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (Kanwal Chaudhary v. IBBI) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह एवं न्यायमूर्ति शैल जैन |
| मुख्य निर्णय | इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल के रूप में काम करने वाले वकीलों पर फॉरवर्ड चार्ज (FCM) लागू होगा। |
| कानूनी सेवाओं पर प्रभाव | वकीलों द्वारा दी जाने वाली सामान्य लीगल सर्विसेज पर रिवर्स चार्ज (RCM) यथावत लागू रहेगा। |
| सर्विस कोड | इंसॉल्वेंसी सेवाएं Service Code 998241 के तहत वर्गीकृत हैं। |
Advocate Deposit GST: दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल (Insolvency Professional – IP) के रूप में सेवाएं देने वाले वकीलों (Advocates) पर फॉरवर्ड चार्ज मैकेनिज्म (Forward Charge Mechanism) लागू होगा। ऐसे वकीलों को अपनी फीस पर जीएसटी एकत्र कर सरकार के पास जमा कराना होगा और इसके लिए जीएसटी पंजीकरण लेना अनिवार्य होगा।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति शैल जैन की पीठ ने एडवोकेट कंवल चौधरी की याचिका को खारिज करते हुए इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) के निर्णय को सही ठहराया।
⚖️ रिवर्स चार्ज और फॉरवर्ड चार्ज का अंतर
- सामान्य वकीलों के लिए (Reverse Charge): अदालत ने स्पष्ट किया कि जब वकील अपनी सामान्य कानूनी सेवाएं (Legal Services) प्रदान करते हैं, तो उस पर रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म (RCM) ही लागू रहेगा, यानी जीएसटी जमा करने की जिम्मेदारी सेवा प्राप्त करने वाले (मवक्किल/क्लाइंट) की होती है।
- इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल के रूप में (Forward Charge): जब कोई वकील इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल के रूप में कार्य करता है, तो वह एक इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल की श्रेणी में आता है। इसलिए उस पर फॉरवर्ड चार्ज मैकेनिज्म (FCM) लागू होगा, जिसके तहत वकील को खुद बिल में जीएसटी जोड़कर क्लाइंट से वसूलना और सरकार को जमा करना होगा।
🏛️ उच्च न्यायालय के मुख्य तर्क और अवलोकन
- कार्यों का भिन्न होना:
- कोर्ट ने कहा कि एक इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल का काम केवल कानूनी सलाह देना नहीं है, बल्कि कॉरपोरेट देणदार (Corporate Debtor) के मामलों का प्रबंधन करना, लेनदारों के दावों को प्राप्त करना और सीओसी (Committee of Creditors) की बैठकें आयोजित करना है। यह सामान्य वकालत से बिल्कुल अलग है।
- सेवाओं का वर्गीकरण (Classification of Services):
- जीएसटी वर्गीकरण के तहत कानूनी सेवाओं को एक अलग श्रेणी में रखा गया है, जबकि “इंसॉल्वेंसी एंड रिसीवरशिप सर्विसेज” को सर्विस कोड 998241 के तहत एक विशिष्ट श्रेणी दी गई है। विशिष्ट वर्गीकरण हमेशा सामान्य श्रेणी पर लागू होता है।
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का रुख:
- सुनवाई के दौरान बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी हलफनामा दायर कर माना कि इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल के रूप में वकीलों द्वारा दी जाने वाली सेवाएं पारंपरिक कानूनी सेवाओं से अलग हैं और उन पर फॉरवर्ड चार्ज के तहत जीएसटी लागू होता है।
मामले की पृष्ठभूमि
- एडवोकेट कंवल चौधरी 2017 से इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल के रूप में पंजीकृत हैं। 2018 में NCLT ने उन्हें एक कंपनी का अंतरिम संकल्प पेशेवर (IRP) नियुक्त किया था।
- चौधरी का तर्क था कि चूंकि वह एक वकील हैं, इसलिए उनके द्वारा ली जाने वाली फीस पर कॉर्पोरेट देणदार को रिवर्स चार्ज के तहत जीएसटी जमा करना चाहिए।
- मार्च 2021 में IBBI ने इस तर्क को खारिज कर दिया और उन्हें जीएसटी अनुपालन वाले चालान (GST-compliant invoices) जमा करने का निर्देश दिया था, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने IBBI के फैसले को सही बरकरार रखा।

