Ancestral Property: हिंदू संयुक्त परिवार कानून (Hindu Joint Family Law) के तहत ‘पैतृक संपत्ति’ (Ancestral Property) और ‘स्व-अर्जित संपत्ति’ (Self-Acquired Property) की विधिक सीमाओं को स्पष्ट किया गया।
जन्म से सहदायिक अधिकार का विधिक दावा
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि कोई संपत्ति दादा (Grandfather) की अपनी कमाई (स्व-अर्जित) से खरीदी गई थी और बाद में उसका विभाजन (Partition) पिताओं/भाइयों के बीच हो जाता है, तो पिता को विभाजन में मिला वह हिस्सा उसकी व्यक्तिगत और अलग संपत्ति (Absolute and Separate Property) माना जाएगा। ऐसी संपत्ति पर उसकी बेटी हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (संशोधन) की धारा 6 के तहत ‘जन्म से सहदायिक अधिकार’ (Coparcenary Right by Birth) का विधिक दावा नहीं कर सकती।
अमेरिका निवासी उषा एन. स्वामी ने दायर की थी अपील
हाई कोर्ट के जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस टी.एम. नदाफ की खंडपीठ (Division Bench) ने अमेरिका (US) निवासी उषा एन. स्वामी द्वारा दायर नियमित प्रथम अपील (RFA No. 1568 of 2018) को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने बेंगलुरु की सिविल कोर्ट द्वारा वर्ष 2018 में याचिकाकर्ता के विभाजन वाद (Partition Suit) को खारिज करने के फैसले को विधिक रूप से सही ठहराया।
फैसले का मुख्य कानूनी आधार किया तय
न्यायालय ने फैसले का मुख्य कानूनी आधार तय करते हुए अपने विधिक निष्कर्ष में कहा, “हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की संशोधित धारा 6 (वर्ष 2005) निस्संदेह एक बेटी को जन्म से कॉपर्सनर (सहदायिक) बनाती है, लेकिन यह अधिकार केवल तभी लागू हो सकता है जब विवादित संपत्ति ‘कॉपर्सनरी/संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति’ (Joint Family Property) हो। यह संशोधन पिता या परिवार के किसी सदस्य की स्व-अर्जित या व्यक्तिगत रूप से धारित संपत्ति को जबरन संयुक्त परिवार की संपत्ति में परिवर्तित नहीं करता।”
मामला क्या था? (अमेरिका से बेंगलुरु तक 4 संपत्तियों का विधिक विवाद)
यह विधिक विवाद एक एनआरआई (NRI) बेटी और उसके बुजुर्ग पिता व भाई-बहनों के बीच चार कीमती अचल संपत्तियों (Schedule A, B, C, D) के बंटवारे को लेकर था।
बेटी का दावा: उषा एन. स्वामी ने 2014 में मूल मुकदमा (O.S. No. 703 of 2014) दायर कर अपने पिता एम. वेंकटस्वामी और अपनी बहनों से बेंगलुरु की चार प्राइम संपत्तियों (जिगनी, जयनगर और केंगेरी स्थित कृषि भूमि और मकान) में $1/4$ हिस्से की मांग की थी। उसका दावा था कि ये संपत्तियां उसके दादा मुनियप्पा के समय से आ रही हैं, इसलिए ये पैतृक हैं और ‘विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020)’ के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार उसे जन्म से हिस्सा मिलना चाहिए।
खुद के गवाह से हुआ ‘विधिक आत्मघाती हमला’: इस केस का सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब याचिकाकर्ता (बेटी) ने अपने पक्ष को साबित करने के लिए अपने सगे फूफा/चाचा (पिता के भाई – PW2) को गवाह के तौर पर अदालत में पेश किया। लेकिन PW2 ने जिरह (Cross-examination) में साफ स्वीकार कर लिया कि मूल जमीन (सर्वे नंबर 16/2) को उनके पिता (याचिकाकर्ता के दादा) मुनियप्पा ने खुद के पैसों से खरीदा था। बाद में मुनियप्पा के बच्चों के बीच आपसी पारिवारिक बंटवारा हुआ, जिसमें ‘Schedule A’ और ‘C’ पिता वेंकटस्वामी के हिस्से में आए।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण और सुप्रीम कोर्ट की नजीरें
कर्नाटक हाई कोर्ट की खंडपीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता एस. श्रीवत्स (याचिकाकर्ता के वकील) की दलीलों को खारिज करते हुए निम्नलिखित स्थापित विधिक सिद्धांतों को प्रतिपादित किया।
अरुणचला मुदलियार (1953) का ऐतिहासिक सिद्धांत
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले सी.एल. अरुणचला मुदलियार बनाम सी.ए. मुरुगथना मुदलियार (1953) और गोविंदभाई छोटूभाई पटेल (2020) का हवाला दिया। इन फैसलों के अनुसार, एक मिताक्षरा पिता को अपनी स्व-अर्जित संपत्ति को किसी को भी देने या बेचने का पूर्ण विधिक अधिकार है। यदि कोई पुत्र अपने पिता से वसीयत, उपहार या किसी विभाजन के माध्यम से ऐसी स्व-अर्जित संपत्ति प्राप्त करता है, तो वह संपत्ति पुत्र के हाथ में ‘पैतृक’ नहीं बनती, बल्कि उसकी ‘अलग संपत्ति’ बन जाती है।
कमाई से खरीदी गई संपत्ति (Schedule B) का विधिक चरित्र
याचिकाकर्ता का दावा था कि ‘Schedule B’ (जयनगर का साइट) कॉपर्सनरी फंड से खरीदा गया था। अदालत ने पाया कि यह साइट पिता ने ‘Schedule A’ की जमीन पर उत्खनन (Quarrying Licence) से हुई कमाई से खरीदी थी। चूंकि ‘Schedule A’ पिता की अपनी अलग विधिक संपत्ति थी, इसलिए उससे होने वाली कमाई और उस कमाई से खरीदी गई नई संपत्ति (Schedule B) भी पूरी तरह से पिता की स्व-अर्जित संपत्ति ही मानी जाएगी।
प्रतिवादी द्वारा सबूत न देने पर प्रतिकूल अनुमान (Adverse Inference) नहीं
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया था कि चूंकि पिता और प्रतिवादियों ने लिखित बयान दिया था लेकिन कोर्ट में कोई मौखिक या दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया, इसलिए विद्याधर बनाम मणिकराव (1999) के तहत उनके खिलाफ फैसला होना चाहिए। हाई कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सबूत का बोझ (Burden of Proof) हमेशा वादी (Plaintiff) पर होता है। यदि वादी खुद अपना केस साबित करने में नाकाम रहता है, तो भले ही प्रतिवादी कोई सबूत न दे, मुकदमा खारिज कर दिया जाएगा।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक बिंदु | कर्नाटक उच्च न्यायालय का अंतिम विधिक निर्णय (16 जून 2026) |
| अपीलकर्ता (वादी) | श्रीमती उषा एन. स्वामी (निवासी: संयुक्त राज्य अमेरिका)। |
| प्रतिवादी (विपक्षी पक्ष) | श्री एम. वेंकटस्वामी (पिता) एवं अन्य परिजन। |
| पीठ (Coram) | जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस टी.एम. नदाफ। |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या दादा की स्व-अर्जित संपत्ति पारिवारिक बंटवारे के बाद अगली पीढ़ी (पोती) के लिए पैतृक हो जाएगी? |
| अदालत का विधिक उत्तर | नहीं। विभाजन के बाद वह पिता की पूर्ण व्यक्तिगत संपत्ति (Absolute Property) बन जाती है। |
| अंतिम परिणाम | नियमित प्रथम अपील (RFA) खारिज; ट्रायल कोर्ट का 2018 का फैसला बरकरार। |

