Sunday, August 30, 2026
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Big Controversy: क्या न्यायिक सेवा परीक्षा के इंटरव्यू में न्यूनतम कट-ऑफ मार्क्स तय करना वैध है या नहीं?…अब तुलनात्मक चार्ट होगा तैयार, यहां जानिए

Big Controversy: सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में न्यायिक सेवाओं की भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण रुख अपनाया है।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता अजय कुमार श्यामकिशोर की याचिका पर सुनवाई करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण को निर्देश दिया है कि वे इस संबंध में सभी राज्यों में अपनाई जाने वाली प्रथाओं का एक तुलनात्मक चार्ट (State-wise Comparative Chart) तैयार कर अदालत की मदद करें। अदालत ने इस कानूनी सवाल की समीक्षा करने पर सहमति जताई है कि क्या न्यायिक सेवा परीक्षा के इंटरव्यू (viva voce) राउंड में ‘न्यूनतम कट-ऑफ मार्क्स’ (Minimum Qualifying Threshold) तय करना वैध है या नहीं?

मामला क्या है? (What is the Controversy?)

  • यह याचिका अजय कुमार श्यामकिशोर नामक एक अभ्यर्थी ने दायर की है, जिन्होंने न्यायिक सेवा परीक्षा की मुख्य (लिखित) परीक्षा में तीसरा सबसे उच्चतम अंक (Third Highest Marks) हासिल किया था।
  • इंटरव्यू में कम अंक: लिखित परीक्षा में शानदार प्रदर्शन के बावजूद, उन्हें 50 अंकों के इंटरव्यू राउंड में केवल 18 अंक दिए गए।
  • कट-ऑफ से चूके: चूंकि उस राज्य में इंटरव्यू पास करने के लिए न्यूनतम 20 अंक (40% क्वालीफाइंग थ्रेशोल्ड) लाना अनिवार्य था, इसलिए वे महज 2 अंकों से अंतिम चयन से बाहर हो गए।
  • अधिवक्ता प्रशांत भूषण का तर्क: याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि इंटरव्यू का कुल भारांश (Weightage) परीक्षा के कुल अंकों का 20 प्रतिशत था। उन्होंने ऐतिहासिक कोठारी आयोग (Kothari Commission) की सिफारिशों का हवाला दिया, जिसमें सुझाव दिया गया था कि इंटरव्यू के अंक आमतौर पर कुल अंकों के 12.5% से अधिक नहीं होने चाहिए, और जहां लिखित परीक्षा के अंक बहुत अधिक हों, वहां तो इसे और भी कम रखा जाना चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट की चिंताएं: पब्लिक फंडिंग का हो रहा नुकसान

  • सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा न्यायिक चयन प्रक्रिया की दक्षता और तार्किकता पर कई गंभीर सवाल उठाए।
  • खाली रह जाते हैं पद (Systemic Problem): प्रशांत भूषण ने कोर्ट को बताया कि न्यायिक भर्तियों में बेहद कम उम्मीदवारों का अंतिम रूप से चयन हो पाना ही इस बात का सबूत है कि पूरी चयन व्यवस्था में कोई अंतर्निहित समस्या है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ही पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब विज्ञापित पदों (Vacancies) में से केवल एक-चौथाई (25%) सीटें ही भरी जा पाती हैं, तो यह दर्शाता है कि चयन प्रक्रिया दोषपूर्ण है।
  • पब्लिक फंडिंग का खर्च: चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा, इन परीक्षाओं को आयोजित करने में भारी मात्रा में सार्वजनिक धन (Public Funding) खर्च होता है। अगर इसके बावजूद अंत में परिणाम न्यूनतम (Minimal Outcome) निकलता है और सीटें खाली रह जाती हैं, तो इस वित्तीय और प्रशासनिक पहलू पर भी विचार करना होगा।
  • भाषा की बाधा (Language Barrier): सीजेआई सूर्य कांत ने यह भी रेखांकित किया कि कुछ हाई कोर्ट्स में देश के अन्य हिस्सों से आने वाले अभ्यर्थी केवल इसलिए इंटरव्यू में पिछड़ जाते हैं क्योंकि उनके सामने भाषा की बाधा होती है (हालांकि वर्तमान मामला इससे अलग था)।
  • गुणवत्ता बनाम रोजगार: दूसरी तरफ, जस्टिस जोयमाल्या बागची ने व्यावहारिक पक्ष रखते हुए कहा कि हर साल भारी संख्या में लॉ ग्रेजुएट्स इस परीक्षा में बैठते हैं। ऐसे में बिना एक न्यूनतम मानक (Minimum Standard) सुनिश्चित किए न्यायिक पदों पर सीधी भर्ती नहीं की जा सकती।

आगे की राह और सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट इस विषय की गंभीरता से जांच करने के लिए पूरी तरह तैयार है। हालांकि, चूंकि न्यायिक सेवा भर्ती से जुड़े बड़े मुद्दों पर पहले से ही एक तीन-जजों की बड़ी पीठ (Three-Judge Bench) के समक्ष मामला लंबित है, इसलिए इस याचिका को भी उसी व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। कोर्ट ने फिलहाल मामले को आगे बढ़ाते हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण से देश के विभिन्न राज्यों के हाई कोर्ट्स द्वारा इंटरव्यू कट-ऑफ को लेकर अपनाए जा रहे अलग-अलग नियमों की जानकारी जुटाने और एक विस्तृत तुलनात्मक डेटा चार्ट पेश करने को कहा है।

केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)

कानूनी पैरामीटरविवरण
सुप्रीम कोर्ट बेंचचीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची
याचिकाकर्ताअजय कुमार श्यामकिशोर (प्रतिनिधित्व: एडवोकेट प्रशांत भूषण)
मूल विवादलिखित परीक्षा में टॉप करने के बावजूद इंटरव्यू में न्यूनतम 40% कट-ऑफ (20/50) न ला पाने के कारण चयन से बाहर होना।
कोठारी आयोग की सिफारिशइंटरव्यू का वेटेज कुल अंकों का अधिकतम 12.5% ही होना चाहिए।
अदालत का अंतरिम निर्देशसभी राज्यों की इंटरव्यू कट-ऑफ प्रथाओं का तुलनात्मक चार्ट (State-wise Chart) जमा करने का आदेश।

निष्कर्ष (Takeaway)

न्यायिक परीक्षाओं के इंटरव्यू राउंड में न्यूनतम कट-ऑफ का होना हमेशा से एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। आलोचकों का मानना है कि इंटरव्यू में न्यूनतम अंक तय करने से चयनकर्ताओं (Panelists) को किसी भी योग्य उम्मीदवार को मनमाने ढंग से बाहर करने की ‘विशेषाधिकार’ शक्ति मिल जाती है, भले ही उसने लिखित परीक्षा में कितना भी उत्कृष्ट प्रदर्शन क्यों न किया हो। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में राज्य-वार डेटा मांगने से देश भर की न्यायिक चयन प्रक्रियाओं में एकरूपता (Uniformity) और निष्पक्षता लाने का रास्ता साफ हो सकता है।

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