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विशेषज्ञ समिति की प्रमुख सिफारिशें
1. खाली सीटों (Vacant Seats) को भरने के लिए वित्तीय व सेवा प्रोत्साहन:
- कम फीस संरचना: राज्य स्तरीय फीस निर्धारण समितियों को सलाह दी गई है कि वे क्लिनिकल की तुलना में नॉन-क्लिनिकल (Pre-clinical & Para-clinical) शाखाओं के लिए कम फीस तय करें ताकि छात्र इन विषयों की ओर आकर्षित हों।
- सर्विस बॉन्ड से मुक्ति: नॉन-क्लिनिकल विषयों में दाखिला लेने वाले डॉक्टरों को अनिवार्य सर्विस बॉन्ड (Service Bond) से छूट देने की सिफारिश की गई है।
- सीट ब्लॉकिंग पर रोक: केवल सीट ब्लॉक करने के उद्देश्य से परीक्षा में बैठने वाले अभ्यर्थियों को रोकने के लिए NTA और NBEMS द्वारा KYC तथा बायोमेट्रिक सत्यापन कराने का प्रस्ताव है।
- लगातार खाली सीटों को बंद करना: डेंटल (Nursing & Dental) की जिन सीटों पर लगातार 2-3 वर्षों तक कोई दाखिला न हो, उन्हें बंद करने या उनकी फीस घटाने पर विचार करने को कहा गया है।
2. काउंसलिंग में देरी रोकने के लिए डिजिटल प्रक्रिया (2026-27 सत्र सुधार):
- Freeze & Float मॉडल: सीट अपग्रेडेशन चाहने वाले छात्र भौतिक रूप से (Physically) उपस्थित हुए बिना ऑनलाइन ही ‘Float’ विकल्प चुन सकेंगे।
- एकल फीस भुगतान: अपग्रेडेशन के बाद अभ्यर्थी को केवल उसी संस्थान में फीस जमा करनी होगी जहां वह अंतिम प्रवेश लेता है।
- NMC और MCC पोर्टल का एकीकरण: कॉलेजों द्वारा सीटों की फर्जी या दोहरी प्रविष्टि (Duplication of Seats) रोकने के लिए NMC का डेटा सीधे MCC काउंसलिंग पोर्टल से जोड़ा गया है।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग अधिनियम, 2019 (NMC Act, 2019) की धारा 10 व 57 (चिकित्सा शिक्षा के न्यूनतम मानकों का विनियमन), संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य का अधिकार एवं योग्य विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता), स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा विनियम (Postgraduate Medical Education Regulations – PGMER), तथा मेडिकल सीटों की रिक्तियों को भरने के नाम पर योग्यता मानकों में भारी गिरावट के विधिक-नीतिगत संतुलन पर केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एक अत्यंत युगांतरकारी हलफनामा प्रस्तुत किया है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित 12-सदस्यीय उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति ने नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट फॉर पोस्टग्रेजुएट्स (NEET-PG) और सुपर स्पेशियलिटी (NEET-SS) के मौजूदा ‘परसेंटाइल-आधारित’ (Percentile-based System) क्वालीफाइंग तंत्र को समाप्त कर ‘रैंक-आधारित’ (Rank-based Merit System) मेरिट प्रणाली लागू करने की औपचारिक सिफारिश की है।
केंद्र सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे के अनुसार, राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (National Medical Commission – NMC) ने इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है और हितधारकों के परामर्श हेतु जल्द ही मसौदा विनियम (Draft Regulation) जारी किए जाएंगे। इसके अलावा, समिति ने गैर-क्लिनिकल स्नातकोत्तर सीटों (यथा एनाटॉमी, बायोकेमिस्ट्री, फिजियोलॉजी आदि) के हर साल खाली रह जाने के संकट से निपटने के लिए इनकी ट्यूशन फीस कम करने और इन पाठ्यक्रमों को चुनने वाले छात्रों को अनिवार्य सर्विस बॉन्ड (Service Bond) से पूर्ण छूट देने की सिफारिश की है।
विशेषज्ञ समिति के मुख्य निष्कर्ष एवं प्रमुख नीतिगत सिफारिशें
1. परसेंटाइल से रैंक-आधारित मेरिट प्रणाली में बदलाव:
- समिति ने पाया कि रिक्त सीटें भरने के नाम पर परसेंटाइल घटाने की प्रक्रिया ने प्रतियोगी परीक्षा की गरिमा को केवल एक ‘प्रशासनिक औपचारिकता’ (Administrative Formality) बना दिया था।
- नई प्रणाली में सीटों के अनुपात में निश्चित मेरिट रैंक तय की जाएगी, जिससे परीक्षा के न्यूनतम शैक्षणिक और प्रतिस्पर्धी मानक सुरक्षित रहेंगे और नेगेटिव मार्किंग वाले अयोग्य अभ्यर्थियों के चयन पर विराम लगेगा।
2. गैर-क्लिनिकल (Pre & Para-Clinical) पाठ्यक्रमों हेतु प्रोत्साहन:
- फीस में कमी: राज्य शुल्क निर्धारण समितियों (State Fee Regulatory Committees) को निर्देश दिया जाएगा कि वे क्लिनिकल और नॉन-क्लिनिकल ब्रांचों के लिए अलग-अलग शुल्क ढांचा तय करें, जिसमें गैर-क्लिनिकल सीटों की फीस काफी कम रखी जाए।
- सर्विस बॉन्ड से मुक्ति: एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, फार्माकोलॉजी और कम्युनिटी मेडिसिन जैसे विषयों में प्रवेश लेने वाले डॉक्टरों को राज्य सरकारों के अनिवार्य अनिवार्य सेवा बॉन्ड (Compulsory Service Bonds) से मुक्त रखा जाए।
- स्टाइपेंड समानता: राज्यों को क्लिनिकल और गैर-क्लिनिकल रेजिडेंट डॉक्टरों के स्टाइपेंड में मौजूद विसंगतियों को दूर करने और ग्रामीण सेवा हेतु अतिरिक्त वित्तीय प्रोत्साहन देने की सिफारिश की गई।
3. सीट ब्लॉकिंग और फर्जीवाड़े पर तकनीकी नकेल:
- नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) और नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) को KYC और बायोमेट्रिक सत्यापन लागू करने को कहा गया है ताकि ऐसे उम्मीदवार परीक्षा में न बैठ सकें जो केवल सीट ब्लॉक (Seat Blocking Scam) करने या बिचौलियों के लिए उपस्थित होते हैं।
4. दंत चिकित्सा (MDS) व नर्सिंग की लगातार रिक्त सीटों की समाप्ति:
- जो पीजी डेंटल या नर्सिंग सीटें लगातार दो से तीन वर्षों तक खाली रह जाती हैं, उन्हें स्थायी रूप से समाप्त/बंद (Discontinuation of Seats) करने का प्रस्ताव दिया गया है, साथ ही रोजगार के नए अवसर सृजित करने पर बल दिया गया है।
काउंसलिंग सुधार: मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) का 2026-27 मॉडल
काउंसलिंग में होने वाली अंतहीन देरी और शैक्षणिक सत्रों के पिछड़ने को रोकने के लिए एमसीसी ने अदालत को सूचित किया कि प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटाइज किया गया है:
| काउंसलिंग सुधार पैरामीटर | पूर्व व्यवस्था | लागू / प्रस्तावित नई व्यवस्था (2026-27) |
| सीट अपग्रेडेशन प्रक्रिया | आवंटित कॉलेज में भौतिक उपस्थिति (Physical Reporting) अनिवार्य थी। | ऑनलाइन फ्रीज (Freeze) व फ्लोट (Float) विकल्प; बिना कॉलेज गए घर बैठे अपग्रेडेशन। |
| कॉलेज रिलीविंग प्रक्रिया | पिछले कॉलेज जाकर हाथ से रिलीविंग लेटर लेना पड़ता था। | पूर्णतः ऑटोमेटेड ऑनलाइन रिलीविंग पोर्टल द्वारा स्वतः निष्पादित। |
| फीस भुगतान प्रणाली | हर राउंड में अपग्रेड होने पर अलग-अलग कॉलेजों में फीस भरनी और रिफंड मांगनी पड़ती थी। | एकमुश्त केंद्रीय भुगतान; छात्र केवल उस अंतिम संस्थान में फीस देगा जहाँ प्रवेश पक्का होगा। |
| सीट मैट्रिक्स सत्यापन | कॉलेज सीधे एमसीसी को सीटें भेजते थे; एनएमसी से मैन्युअल मिलान में हफ्तों लगते थे। | NMC सीधे MCC पोर्टल में एकीकृत; डुप्लीकेशन खत्म, सीट मैट्रिक्स का स्वतः सत्यापन। |
| काउंसलिंग कैलेंडर | अनिश्चित तारीखें; अदालती अर्जियों के चलते कई-कई महीने की देरी। | निश्चित वार्षिक कैलेंडर, जिसे लागू करने से पूर्व सुप्रीम कोर्ट से अनुमोदित कराया जाएगा। |
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2025–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक अपीलीय/रिट क्षेत्राधिकार) |
| संबद्ध पूर्व पीठ | न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा (Justice PS Narasimha) एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे (Justice Alok Aradhe) |
| विवाद का मूल उद्भव (NEET-PG 2025) | केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने मेडिकल कॉलेजों में खाली पड़ी हजारों पीजी सीटों को भरने के लिए कट-ऑफ परसेंटाइल में भारी कटौती कर दी थी: • सामान्य श्रेणी का कट-ऑफ 276 अंक से घटाकर 103 अंक कर दिया गया। • एससी/एसटी/ओबीसी श्रेणियों के लिए कट-ऑफ 235 अंक से घटाकर ‘माइनस 40’ (-40) कर दिया गया था। |
| न्यायिक हस्तक्षेप | सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा था कि भले ही यह कार्यपालिका का नीतिगत मामला है, किंतु देश के नागरिकों के स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। अदालत ने केंद्र सरकार को पूरे प्रवेश तंत्र का व्यापक ऑडिट करने और व्यावहारिक समाधान सुझाने हेतु विशेषज्ञ समिति बनाने का आदेश दिया था। |
| याचिकाकर्ताओं की वर्तमान आपत्ति | याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत (Advocate Satyam Singh Rajput) ने सुनवाई के दौरान दलील दी कि: • सरकार ने पिछली बार कट-ऑफ को ‘माइनस 40’ तक गिराने के अपने असंवैधानिक फैसले को उचित ठहराने के बजाय पूरी मूल्यांकन प्रणाली (मार्किंग सिस्टम) को ही बदलने का प्रस्ताव रख दिया है। • केवल ‘परसेंटाइल’ से ‘रैंक’ में बदल देने से क्या अंतर आएगा, यदि बुनियादी गुणवत्ता मानकों को नीचे गिराया जाता रहा? |
| शीर्ष अदालत की कार्यवाही | अदालत ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लिया और सभी याचिकाकर्ताओं व हितधारकों को रिपोर्ट पर अपना औपचारिक प्रत्युत्तर/आपत्तियां दाखिल करने का समय देते हुए मामले की सुनवाई स्थगित कर दी। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता बनाम नीतिगत हस्तक्षेप’
- ‘डॉ. प्रीति श्रीवास्तव बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ [(1999) 7 SCC 120] का संविधान पीठ सिद्धांत:
- सर्वोच्च न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी थी कि स्नातकोत्तर (पीजी) और सुपर स्पेशियलिटी चिकित्सा शिक्षा में योग्यता और मेधा (Merit) से किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जा सकता।
- समाज को एक सामान्य एमबीबीएस डॉक्टर के बजाय एक विशेषज्ञ सर्जन, रेडियोलॉजिस्ट या पैथोलॉजिस्ट पर अधिक भरोसा करना पड़ता है। यदि ‘माइनस 40’ अंक लाने वाले व्यक्ति को विशेषज्ञता की डिग्री दी जाएगी, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिलने वाले ‘गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा के अधिकार’ पर सीधा कुठाराघात होगा।
- परसेंटाइल प्रणाली की विधिक खामी और रैंक आधारित विकल्प:
- परसेंटाइल केवल यह दर्शाता है कि किसी अभ्यर्थी ने अन्य परीक्षार्थियों की तुलना में कैसा प्रदर्शन किया (सापेक्षिक स्थिति / Relative Performance)। जब कट-ऑफ ‘शून्य परसेंटाइल’ कर दिया जाता है, तो इसका अर्थ यह होता है कि परीक्षा में उपस्थित होने वाला और निगेटिव अंक लाने वाला प्रत्येक व्यक्ति योग्य घोषित हो जाता है।
- रैंक आधारित प्रणाली में एक वैज्ञानिक कट-ऑफ रैंक (Fixed Merit Benchmark) तय की जा सकेगी, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि एक निश्चित न्यूनतम शैक्षणिक क्षमता के नीचे के अभ्यर्थियों को सीटें आवंटित न हों।
- सर्विस बॉन्ड की अनिवार्यता और गैर-क्लिनिकल सीटों का संकट:
- देश भर में मेडिकल कॉलेजों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि क्लिनिकल सीटें (यथा मेडिसिन, पीडियाट्रिक्स, डर्मेटोलॉजी) करोड़ों रुपये में बिकती हैं या पहली काउंसलिंग में भर जाती हैं, जबकि बुनियादी चिकित्सा विज्ञान (Non-clinical / Para-clinical) की सीटें खाली रह जाती हैं क्योंकि डॉक्टर 3 साल की पढ़ाई के बाद 2 से 5 साल का अनिवार्य ग्रामीण सरकारी बॉन्ड नहीं भरना चाहते।
- इन सीटों पर फीस घटाना और बॉन्ड की बाध्यता समाप्त करना प्रशासनिक रूप से एक अत्यधिक व्यावहारिक और तार्किक समाधान है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट/अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: नीट-पीजी कट-ऑफ एवं काउंसलिंग सुधार संदर्भ [Writ Petition (Civil) No. … / 2025-2026]
- संबद्ध पीठ: न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा (Justice PS Narasimha) एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे (Justice Alok Aradhe)
- दस्तावेज़: केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय व 12-सदस्यीय विशेषज्ञ समिति की अनुपालन रिपोर्ट एवं हलफनामा
- कार्यवाही का स्वरूप: विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत; याचिकाकर्ताओं को जवाब दाखिल करने का अवसर; सुनवाई स्थगित।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- केंद्र सरकार, MoHFW एवं NMC की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एवं स्थायी विधिक टीम।
- याचिकाकर्ताओं (डॉक्टरों/अभ्यर्थियों) की ओर से: अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत (Advocate Satyam Singh Rajput) व अन्य।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन और लोक स्वास्थ्य का अधिकार) एवं अनुच्छेद 14 (समानता व मनमानेपन के विरुद्ध संरक्षण)
- राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग अधिनियम, 2019 (NMC Act, 2019) — धारा 10, 14 एवं 57 (NEET का आयोजन और स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा के मानक)
- स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा विनियम (PGMER, 2023) — परीक्षा योग्यता, प्रवेश अर्हता एवं काउंसलिंग दिशानिर्देश
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और योग्यता के न्यूनतम मानकों का विधिक मानक: ‘स्नातकोत्तर और सुपर-स्पेशियलिटी चिकित्सा शिक्षा में न्यूनतम योग्यता मानक बनाए रखना एक गैर-परक्राम्य (Non-negotiable) संवैधानिक अनिवार्यता है; मेडिकल कॉलेजों में सीटों का खाली रह जाना अथवा राजस्व का नुकसान, नियामक संस्थाओं को योग्यता कट-ऑफ को ‘शून्य’ या ‘ऋणात्मक अंकों’ तक गिराने का विधिक अधिकार नहीं देता; नीतिगत मामलों में भी अदालतें तब हस्तक्षेप कर सकती हैं जब कार्यपालिका का निर्णय चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और अनुच्छेद 21 के तहत लोक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से खतरे में डालता हो; अतः परसेंटाइल के मनमाने घटाव को रोककर पारदर्शी रैंक-आधारित मेरिट प्रणाली लागू करना और गैर-क्लिनिकल सीटों के लिए वित्तीय/बॉन्ड छूट जैसे संरचनात्मक प्रोत्साहन देना विधि सम्मत और जनहितैषी है।’
- वर्तमान स्थिति व आगामी प्रक्रिया: एनएमसी बहुत जल्द विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के अनुरूप पीजी मेडिकल एडमिशन हेतु नए मसौदा नियम (Draft Regulations for Rank-based Admissions) सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी करेगा; सर्वोच्च न्यायालय इस मामले की अगली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों और केंद्र के अंतिम परामर्श मसौदे पर विचार कर देशव्यापी काउंसलिंग कैलेंडर को अंतिम रूप प्रदान करेगा।
NEET-PG: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे |
| मूल विषय | NEET-PG/NEET-SS प्रवेश प्रणाली, कट-ऑफ पर्सेंटाइल विवाद तथा खाली सीटों की समस्या। |
| समिति का मुख्य प्रस्ताव | रैंक-आधारित मेरिट सिस्टम: पर्सेंटाइल व्यवस्था खत्म कर रैंक के आधार पर अर्हता तय करना। |
| खाली सीटें भरने के उपाय | 1. नॉन-क्लिनिकल (Non-Clinical) विषयों के लिए फीस कम करना। 2. प्री-क्लिनिकल व पैरा-क्लिनिकल सीटों के लिए सर्विस बॉन्ड (Service Bond) से छूट देना। 3. सीट ब्लॉकिंग रोकने के लिए KYC और बायोमेट्रिक सत्यापन लागू करना। |
| काउंसलिंग में सुधार | ‘Freeze’ और ‘Float’ विकल्प; ऑनलाइन दस्तावेज सत्यापन; फीस का एक ही बार भुगतान। |

